दीपक प्रकाश को विधान परिषद का सदस्य नामित किया गया, मंत्री बने रहने पर कोई रोक नहीं: बिहार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा

Update: 2026-08-07 10:59 GMT

बिहार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश को बिहार विधान परिषद का सदस्य नामित कर दिया गया है। इसलिए अब उनके मंत्री पद पर बने रहने में कोई संवैधानिक बाधा नहीं है।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहन की पीठ उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें दीपक प्रकाश को मंत्री पद से हटाने की मांग की गई। याचिका में कहा गया कि वे मंत्री नियुक्त होने के छह महीने के भीतर विधानमंडल के सदस्य नहीं बने थे, इसलिए उनका पद पर बने रहना असंवैधानिक है।

बिहार सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि दीपक प्रकाश को विधान परिषद का सदस्य नामित किए जाने के बाद उनकी कथित अयोग्यता समाप्त हो गई। पीठ ने राज्य सरकार से इस संबंध में अधिसूचना पेश करने को कहा और सामाजिक कार्यकर्ता राकेश कुमार सिंह द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई स्थगित की।

याचिका के अनुसार दीपक प्रकाश को 20 नवंबर 2025 को तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पंचायती राज मंत्री बनाया था। उस समय वे विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं थे।

इसके बाद 15 अप्रैल 2026 को नीतीश कुमार के इस्तीफे के कारण मंत्रिपरिषद भंग हो गई। करीब 22 दिन बाद 7 मई 2026 को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली नई सरकार में दीपक प्रकाश को फिर से मंत्री बनाया गया। याचिकाकर्ता का कहना है कि मंत्री बनने के बाद विधानमंडल का सदस्य बनने के लिए निर्धारित छह महीने की अवधि 20 मई 2026 को समाप्त हो गई।

याचिका में दलील दी गई कि दोबारा नियुक्ति के जरिए संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत गैर-विधायक को मिलने वाली छह महीने की अवधि को फिर से शुरू नहीं किया जा सकता। याचिकाकर्ता ने एस.आर. चौधरी बनाम पंजाब राज्य (2001) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि यह अवधि एक बार की संवैधानिक छूट है, जिसे मुख्यमंत्री बदलने, मंत्रिपरिषद भंग होने या पुनर्नियुक्ति के आधार पर दोबारा लागू नहीं किया जा सकता।

याचिकाकर्ता के अनुसार गैर-निर्वाचित व्यक्ति को बार-बार मंत्री बनाए जाने की अनुमति देने से संसदीय लोकतंत्र, जनप्रतिनिधित्व और मंत्रियों की जवाबदेही के सिद्धांत प्रभावित होंगे।

याचिका में सुप्रीम कोर्ट से अधिकार-पृच्छा (क्वो वारंटो) जारी करने की मांग की गई ताकि दीपक प्रकाश से पूछा जा सके कि वे किस संवैधानिक अधिकार के तहत मंत्री पद पर बने हुए हैं। साथ ही उनकी पुनर्नियुक्ति को असंवैधानिक घोषित करने का अनुरोध किया गया।

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