राज्य, अंतिम आदेश के तहत मिलने वाले लाभों से सिर्फ इसलिए इनकार नहीं कर सकता कि कर्मचारियों ने इसे लागू करवाने में देरी की: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-05-16 13:30 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि राज्य किसी ऐसे न्यायिक आदेश को लागू करने से इनकार नहीं कर सकता, जो अंतिम रूप ले चुका हो, सिर्फ इसलिए कि लाभार्थियों ने इसे लागू करवाने के लिए अदालतों का दरवाज़ा देर से खटखटाया। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि सरकार 'आदर्श नियोक्ता' (model employer) के तौर पर कानून का पालन करने में अपनी ही नाकामी का फायदा नहीं उठा सकती।

जस्टिस अहसानुद्दीन अमनुल्लाह और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने ग्रेड-IV कर्मचारियों के एक समूह द्वारा आंध्र प्रदेश राज्य और विशाखापत्तनम नगर निगम के खिलाफ दायर अपील को मंज़ूरी दी। बेंच ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे 2012 के आंध्र प्रदेश प्रशासनिक ट्रिब्यूनल के उस आदेश को चार महीने के भीतर इन कर्मचारियों के पक्ष में लागू करें।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता-कर्मचारी विशाखापत्तनम नगर निगम में ग्रेड-IV कर्मचारी थे। 2012 में आंध्र प्रदेश प्रशासनिक ट्रिब्यूनल ने सरकार को आदेश दिया कि वह इन कर्मचारियों को उनकी लंबी सेवा अवधि को देखते हुए न्यूनतम नियमित वेतनमान (regular pay scale) दें।

सरकार ने उस आदेश को कभी चुनौती नहीं दी, इसलिए वह आदेश अंतिम रूप ले चुका था। हालांकि, इसके बाद भी सरकार ने न तो उस आदेश को लागू किया और न ही कर्मचारियों को उसके तहत मिलने वाले लाभों का भुगतान किया।

इसके बाद कर्मचारियों ने सरकार को ट्रिब्यूनल के आदेश का पालन करने के लिए मजबूर करने हेतु अलग-अलग मामले और याचिकाएं दायर करना जारी रखा। इन बाद की कार्यवाहियों के दौरान, कर्मचारी अपने द्वारा पहले दायर किए गए कुछ अन्य मामलों के बारे में जानकारी देने में विफल रहे। इस वजह से हाईकोर्ट ने उनकी रिट याचिका खारिज की। हाईकोर्ट ने कहा कि कर्मचारियों ने महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया और वे "साफ हाथों" (clean hands) के साथ कोर्ट नहीं आए।

हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ कर्मचारियों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।

फैसला

अपील को मंज़ूरी देते हुए जस्टिस अमनुल्लाह द्वारा लिखे गए फैसले में यह टिप्पणी की गई कि भले ही अपीलकर्ता अन्य मुकदमों से जुड़े तथ्यों को छिपाने के दोषी हो सकते हैं, लेकिन यह बात अपने आप में उन्हें राहत देने से इनकार करने का आधार नहीं बन सकती—खासकर तब, जब उनके पक्ष में एक ऐसा आदेश मौजूद हो जिसे कभी चुनौती ही न दी गई हो।

कोर्ट ने कहा,

"राज्य किसी अंतिम और अ-चुनौतीपूर्ण (Uncontested) ट्रिब्यूनल आदेश को लागू करने से सिर्फ इसलिए इनकार नहीं कर सकता कि कर्मचारी अपने अधिकारों को लागू करवाने की मांग कर रहे हैं। उनके खिलाफ देरी, प्रक्रियागत खामियों या तकनीकी आपत्तियों का सहारा लिया जा रहा है।"

संक्षेप में कहें तो कोर्ट ने पाया कि प्रतिवादी-राज्य (सरकार) अपनी ही गलती का फायदा उठाने की कोशिश कर रहा था। वह तकनीकी आपत्तियां उठाकर, एक 'आदर्श नियोक्ता' के तौर पर काम करने और अपनी ज़िम्मेदारी निभाने से बचने का प्रयास कर रहा था।

न्यायालय ने निर्णय दिया,

“उपर्युक्त कारणों से यह न्यायालय प्रतिवादी नंबर 1 और 2 को इस बात की अनुमति नहीं दे सकता और न ही देगा कि वे अपीलकर्ताओं को उनके पक्ष में पारित उस आदेश का लाभ देने से मना कर दें, जिसे उक्त प्रतिवादियों द्वारा कभी चुनौती नहीं दी गई। ऐसा वे केवल इस आधार पर नहीं कर सकते कि आदेश के कार्यान्वयन के लिए निर्देश मांगने हेतु उचित न्यायिक प्रक्रिया का सहारा लेने में विलंब हुआ है। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि यह नहीं माना जा सकता कि 20.07.2012 का ट्रिब्यूनल का आदेश समय बीतने के साथ अपना प्रभाव खो देगा। अपीलकर्ताओं के आचरण में कमियों के बावजूद, अंततः, हम इसके द्वारा विवादित आदेश रद्द करते हैं।”

उपर्युक्त के आधार पर अपील स्वीकार की गई।

Cause Title: B. YERRAJI & ORS. VERUS THE STATE OF ANDHRA PRADESH & ORS.

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