मोटर दुर्घटना मुआवज़े से मेडिक्लेम रीइम्बर्समेंट नहीं काटा जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-05-16 13:26 GMT

एक अहम फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी दुर्घटना पीड़ित को मेडिक्लेम या मेडिकल इंश्योरेंस पॉलिसी के तहत मिली रकम को मोटर वाहन अधिनियम के तहत दिए गए मुआवज़े से नहीं काटा जा सकता। कोर्ट ने कहा कि ये दोनों फ़ायदे अलग-अलग कानूनी दायरे में आते हैं।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड की अपील खारिज की। इस अपील में बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फ़ैसले को चुनौती दी गई थी, जिसमें कहा गया था कि मोटर दुर्घटना दावा अधिकरणों (MACTs) द्वारा दिए गए मुआवज़े से मेडिक्लेम रीइम्बर्समेंट की रकम नहीं काटी जा सकती।

कोर्ट के सामने मुख्य कानूनी मुद्दा यह था कि क्या कोई दावा करने वाला व्यक्ति, जिसे पहले ही अपनी निजी मेडिक्लेम पॉलिसी के तहत मेडिकल खर्चों का रीइम्बर्समेंट मिल चुका है, मोटर दुर्घटना की कार्यवाही में उन खर्चों के लिए दोबारा मुआवज़े का दावा कर सकता है? या फिर क्या ऐसा करना एक "दोहरा फ़ायदा" माना जाएगा, जिसकी इजाज़त नहीं है?

इंश्योरेंस कंपनी की दलील खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि मेडिक्लेम पॉलिसी ऐसा अनुबंध-आधारित फ़ायदा है, जिसे कोई व्यक्ति प्रीमियम देकर खरीदता है; जबकि मोटर वाहन अधिनियम के तहत मिलने वाला मुआवज़ा एक कानूनी अधिकार है, जो दुर्घटना का कारण बनने वाले गलत काम के चलते मिलता है।

कोर्ट ने कहा,

"मेडिक्लेम पॉलिसी एक ऐसी पॉलिसी है, जिसे कोई व्यक्ति जीवन की अनिश्चितताओं को ध्यान में रखते हुए खरीदता है, ताकि किसी दुर्भाग्यपूर्ण घटना की स्थिति में उसके पास एक आर्थिक सहारा मौजूद हो।"

कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी दावा करने वाले व्यक्ति को सिर्फ़ इसलिए MACT का मुआवज़ा न देना कि उसने समझदारी दिखाते हुए मेडिकल इंश्योरेंस ले रखा था, उसके साथ अन्याय होगा। ऐसा करके उसे उन प्रीमियमों के लिए सज़ा दी जाएगी, जिनका भुगतान वह सालों से करता आ रहा है।

बेंच ने तर्क दिया कि अगर इंश्योरेंस कंपनी की दलील मान ली जाती है तो एक अजीबोगरीब स्थिति पैदा हो जाएगी। ऐसी स्थिति में या तो मेडिक्लेम इंश्योरेंस कंपनी, या फिर दुर्घटना करने वाले वाहन की इंश्योरेंस कंपनी को दावा करने वाले व्यक्ति की कीमत पर गलत फ़ायदा मिल जाएगा।

कोर्ट ने कहा,

"सिर्फ़ इसलिए कि ये दोनों चीज़ें एक जैसी या मिलती-जुलती लगती हैं, उन्हें 'दोहरा फ़ायदा' नहीं कहा जा सकता।"

कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि मेडिक्लेम रीइम्बर्समेंट तो सिर्फ़ उन प्रीमियमों का ही नतीजा है, जिनका भुगतान पहले ही किया जा चुका है; जबकि मोटर वाहन अधिनियम के तहत मिलने वाला मुआवज़ा एक कल्याणकारी कानून के तहत दिया जाने वाला "उचित मुआवज़ा" है।

कोर्ट ने इस मुद्दे पर अलग-अलग हाईकोर्ट्स के विरोधाभासी न्यायिक फ़ैसलों की भी समीक्षा की। जहां कुछ कोर्टों ने दोहरे भुगतान से बचने के लिए मेडिक्लेम रीइम्बर्समेंट की रकम काटने की इजाज़त दी थी, वहीं कुछ अन्य कोर्टों ने कहा था कि इस तरह की कटौती की इजाज़त नहीं दी जा सकती, क्योंकि ये दोनों दावे अलग-अलग कानूनी स्रोतों से पैदा होते हैं।

विवाद सुलझाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दिया:

"संक्षेप में, हम यह मानते हैं कि मेडिक्लेम/मेडिकल इंश्योरेंस के हिस्से के तौर पर मिली रकम को संबंधित ट्रिब्यूनल द्वारा तय किए गए मुआवज़े में से नहीं घटाया जा सकता। यह ट्रिब्यूनल MVA के तहत मुआवज़े के दावे पर फैसला सुनाता है, जिसमें अगर दावा किया गया हो तो मेडिकल खर्चों के मद में मिलने वाला मुआवज़ा भी शामिल हो सकता है। ये दोनों अलग-अलग आधारों पर टिके हैं - एक कानूनी है, जबकि दूसरा अनुबंध पर आधारित है। दूसरा वाला तो सिर्फ़ इसलिए मिलता है, क्योंकि अतीत में प्रीमियम चुकाए गए, जबकि पहला वाला किसी मोटर वाहन दुर्घटना में चोट लगने या मृत्यु होने के परिणामस्वरूप मिलने वाला एक अधिकार है।"

कोर्ट ने एक ही हाईकोर्ट की अलग-अलग बेंचों द्वारा एक जैसे कानूनी सवालों पर दिए गए विरोधाभासी फैसलों पर भी चिंता जताई और इस स्थिति को "अस्थिर करने वाली" बताया।

कोर्ट ने कहा कि इस तरह की विसंगतियां न्यायिक अनिश्चितता पैदा करती हैं, मुकदमों की रणनीति को जटिल बनाती हैं और न्याय वितरण प्रणाली की कार्यक्षमता को कमज़ोर करती हैं।

बार (वकीलों) और बेंच (जजों) दोनों की ज़िम्मेदारी पर ज़ोर देते हुए कोर्ट ने कहा कि वकीलों का यह फ़र्ज़ है कि वे कोर्ट के संज्ञान में अपने पक्ष में और अपने पक्ष के विपरीत दोनों तरह के पिछले फैसलों (Precedents) को लाएं; वहीं जजों को भी स्वतंत्र रूप से यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके फैसले स्थापित कानूनों के अनुरूप हों और वे ऐसी गलतियां (Per Incuriam Rulings) करने से बचें जो कानून की अनदेखी करती हों।

दावेदारों के पक्ष में कानूनी स्थिति की पुष्टि करते हुए कोर्ट ने इस मामले को हाई कोर्ट को वापस भेज दिया, ताकि उसके इस फैसले की रोशनी में इस पर आगे निर्णय लिया जा सके।

Case : New India Assurance Company v Dolly Satish Gandhi and another

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