तेज़ सुनवाई पीड़ित का भी अधिकार, आरोपी 'गैंगस्टर्स एक्ट' के लंबित मामले का इस्तेमाल दूसरे मुकदमों को रोकने के लिए नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (17 अगस्त) को कहा कि तेज़ी से सुनवाई का अधिकार सिर्फ़ आरोपी का ही नहीं, बल्कि पीड़ित का भी एक अहम अधिकार है। कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द किया, जिसमें एक आरोपी के ख़िलाफ़ हत्या के मुकदमे की सुनवाई को सिर्फ़ इसलिए रोक दिया गया, क्योंकि उसके ख़िलाफ़ यूपी गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्यवाही लंबित है।
शिकायतकर्ता की अपील मंज़ूरी करते हुए जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ली की बेंच ने प्रतिवादी-आरोपी की उस दलील को खारिज किया, जिसमें कहा गया कि उत्तर प्रदेश गैंगस्टर और असामाजिक गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम, 1986 (Gangsters Act) के तहत लंबित कार्यवाही को अन्य सामान्य आपराधिक कार्यवाहियों पर प्राथमिकता दी जानी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि अगर आरोपी की दलील मान ली जाती है तो इससे पीड़ित के तेज़ी से सुनवाई के अधिकार पर बुरा असर पड़ेगा।
आरोपी ने उत्तर प्रदेश गैंगस्टर और असामाजिक गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम, 1986 की धारा 12 का हवाला दिया, जो गैंगस्टर एक्ट के तहत लंबित मामलों को सामान्य आपराधिक मामलों पर प्राथमिकता देती है। उसने तर्क दिया कि चूंकि उसके ख़िलाफ़ गैंगस्टर एक्ट के तहत मामला लंबित है, इसलिए जब तक उसका फ़ैसला नहीं हो जाता, हत्या के मामले में सामान्य आपराधिक सुनवाई आगे नहीं बढ़ाई जा सकती और उसे रोककर रखना होगा।
इस दलील को खारिज करते हुए जस्टिस विश्वनाथन द्वारा लिखे गए फ़ैसले में कहा गया:
"...तेज़ी से सुनवाई का अधिकार न केवल आरोपी का विशेषाधिकार है, बल्कि पीड़ित का भी एक अहम अधिकार है और मुकदमे के समापन में अत्यधिक देरी का समाज पर बुरा असर पड़ सकता है। यदि प्रतिवादी-आरोपी द्वारा बताई गई व्याख्या को स्वीकार कर लिया जाता है तो यह गैंगस्टर एक्ट की धारा 12 को भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के विरुद्ध (अल्ट्रा वायर्स) बना देगा। इससे आरोपी को अन्य सभी मामलों में देरी करने का बहाना मिल जाएगा कि गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्यवाही लंबित है... यह कोर्ट ऐसी किसी भी व्याख्या को स्वीकार नहीं कर सकता, जो न्यायिक प्रक्रिया का मज़ाक उड़ाती हो।"
गैंगस्टर्स एक्ट की धारा 12 प्राथमिकता देती है, न कि दूसरी कार्यवाही को रोकती
कोर्ट के अनुसार, "धारा 12 का असली मकसद यह नहीं था कि जब तक गैंगस्टर्स एक्ट के तहत कार्यवाही पूरी न हो जाए, तब तक आरोपी के खिलाफ दूसरी कार्यवाही को रोक दिया जाए। इसका मकसद सिर्फ़ यह बताना था कि अगर तारीखें टकराती हैं तो गैंगस्टर्स एक्ट के तहत कार्यवाही को प्राथमिकता दी जाएगी।"
कोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट का 'धर्मेंद्र कीर्थल बनाम यूपी राज्य व अन्य' (2013) 8 SCC 368 मामले पर भरोसा करना सही था। उस मामले में कहा गया कि "धारा 12 बनाते समय विधायिका का मकसद गैंगस्टर्स एक्ट के तहत मामलों की ट्रायल कार्यवाही में देरी करना नहीं था। साथ ही IPC के तहत अपराधों के लिए ट्रायल में हुई प्रगति को देखते हुए यह माना गया कि गैंगस्टर्स एक्ट की धारा 12 लागू नहीं होगी और सेशंस ट्रायल को रोके रखने का कोई औचित्य नहीं था।"
इसके आधार पर अपील मंजूर कर ली गई। हत्या के ट्रायल रोकने का हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया गया। चूंकि सेशंस ट्रायल कोर्ट के पहले के अंतरिम आदेश के तहत आगे बढ़ा और उसके परिणामस्वरूप प्रतिवादी को दोषी ठहराया गया, इसलिए सेशंस कोर्ट का दोषी ठहराने का फैसला अंतिम हो गया।
Cause Title: Keshvendra Singh Versus Shankar Singh And Anr.