IPC की धारा 149: अवैध जमाव सिद्ध होने पर घातक वार करने वाले की पहचान अप्रासंगिक- सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-02-24 10:40 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि अवैध जमाव (Unlawful Assembly) का अस्तित्व और उसका साझा उद्देश्य सिद्ध हो जाए, तो घातक चोट किस व्यक्ति ने पहुंचाई, यह मायने नहीं रखता। ऐसे मामलों में जमाव के प्रत्येक सदस्य पर समान रूप से आपराधिक दायित्व (vicarious liability) लागू होता है।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस निर्णय को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपियों की सजा हत्या (धारा 302 IPC) से घटाकर गैर-इरादतन हत्या (धारा 304 भाग-II IPC) कर दी गई थी, केवल इस आधार पर कि अभियोजन यह साबित नहीं कर पाया कि घातक चोट किस आरोपी ने दी।

 धारा 149 IPC का सिद्धांत लागू

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 149 IPC सामूहिक दायित्व के सिद्धांत को स्थापित करती है। यदि अपराध अवैध जमाव के साझा उद्देश्य को आगे बढ़ाने के लिए किया गया है, तो प्रत्येक सदस्य उस अपराध के लिए जिम्मेदार होगा।

अदालत ने कहा:

“जब यह सिद्ध हो जाए कि अवैध जमाव मौजूद था और उसका उद्देश्य हत्या करना था, तब घातक चोट किसने पहुंचाई, यह महत्वहीन हो जाता है।”

घटना का विवरण

मामला 11 जुलाई 2003 का है। मृतक भग्गू उर्फ भगचंद मिनी बस से लौट रहा था। आरोपियों ने रास्ते में ट्यूबवेल के पाइप रखकर मार्ग अवरुद्ध कर दिया। वाहन रुकते ही लाठियों से लैस आरोपी बाहर आए और सामूहिक हमला कर दिया, जिससे भग्गू की मृत्यु हो गई।

ट्रायल कोर्ट ने सभी आरोपियों को IPC की धाराओं 148, 323/149, 325/149 और 302/149 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा दी थी।

हाईकोर्ट ने सजा कम की थी

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अवैध जमाव की मौजूदगी स्वीकार करने के बावजूद यह कहते हुए हत्या की सजा घटा दी कि:

मृत्यु एक ही चोट से हुई

यह स्पष्ट नहीं कि घातक वार किसने किया

हत्या का साझा उद्देश्य सिद्ध नहीं हुआ

इस आधार पर अपराध को धारा 304 भाग-II IPC में बदलकर सजा छह वर्ष कठोर कारावास कर दी गई।

सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट का यह दृष्टिकोण धारा 149 IPC के मूल सिद्धांत के विपरीत है और बिना ठोस आधार के है।

अदालत ने स्पष्ट किया:

“जब अपराध अवैध जमाव के साझा उद्देश्य को आगे बढ़ाने के लिए किया गया हो, तो यह अप्रासंगिक है कि घातक चोट किसने दी।”

सुप्रीम कोर्ट का आदेश

अदालत ने:

हाईकोर्ट का फैसला रद्द किया

ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा बहाल की

आरोपियों को 8 सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया

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