ज़मानत की शर्त के तौर पर आरोपी की संपत्ति बेचने का आदेश नहीं दिया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ज़मानत की शर्तें दंडात्मक या निर्णायक प्रकृति की नहीं होनी चाहिए, और वे किसी आरोपी को ज़मानत की शर्त के तौर पर उसकी संपत्ति बेचने की मांग करके, उसकी संपत्ति का इस्तेमाल करने के अधिकार से वंचित नहीं कर सकतीं।
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने मद्रास हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया। उस आदेश में धोखाधड़ी और आपराधिक विश्वासघात के मामले में ज़मानत देने की शर्त के तौर पर आरोपी की अचल संपत्तियों को बेचने की शर्त रखी गई।
कोर्ट ने कहा,
"...हमारी सुविचारित राय है कि न तो भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 और न ही दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 किसी कोर्ट को ज़मानत या जांच के चरण में कथित दावों के निपटारे के लिए आरोपी की अचल संपत्ति बेचने का निर्देश देने का अधिकार देती है।"
यह मामला 4 जून, 2025 की एक शिकायत से जुड़ा है, जिसमें धोखाधड़ी और पैसों के गबन का आरोप लगाया गया। इसके आधार पर FIR दर्ज की गई, जिसमें अपीलकर्ता-आरोपी और एक अन्य व्यक्ति पर IPC की धारा 406 (आपराधिक विश्वासघात), 409 (सरकारी कर्मचारी द्वारा आपराधिक विश्वासघात), 420 (धोखाधड़ी) और धारा 34 (सामान्य आशय) के तहत मामला दर्ज किया गया।
उन्हें गिरफ्तार किया गया और जांच के दौरान वे 83 दिनों तक हिरासत में रहे। जहां सेशंस कोर्ट ने उनकी ज़मानत याचिका खारिज की, वहीं मद्रास हाईकोर्ट ने उन्हें ज़मानत दी। हालांकि, कोर्ट ने एक विवादित शर्त लगाई, जिसमें न्यायिक मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया गया कि वह आरोपी की अचल संपत्तियों को बेचकर उससे मिलने वाली रकम को शिकायतकर्ता और इसी तरह के अन्य पीड़ितों के बीच बांट दे। इसी शर्त के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई।
विवादित आदेश रद्द करते हुए कोर्ट ने कहा कि कोर्ट के लिए ऐसी शर्तें लगाना गलत है, जिनका ज़मानत देने के उद्देश्य से कोई लेना-देना न हो। कोर्ट ने यह भी कहा कि ज़मानत की कार्यवाही को वसूली की कार्यवाही में नहीं बदला जा सकता।
कोर्ट ने कहा,
"...ज़मानत की शर्त के तौर पर संपत्ति बेचने का आदेश देना एक तरह की अंतिम दीवानी राहत है, जो संपत्ति के अधिकारों को प्रभावित करती है, इसलिए इसे सही नहीं ठहराया जा सकता।"
कोर्ट ने कहा कि असल में हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता की संपत्ति बेचने का आदेश देकर अपनी ज़मानत संबंधी अधिकार-क्षेत्र से बाहर जाकर काम किया है। यह संपत्ति पहले से ही एक दीवानी मुकदमे का विषय थी, जो अभी भी कोर्ट में लंबित था।
अदालत ने टिप्पणी की,
“हम इस बात को फिर से दोहराते हैं कि ज़मानत देते समय अदालत का अधिकार क्षेत्र यह तय करना नहीं है कि नागरिक अधिकार या विवाद क्या हैं, या ऐसी शर्तें थोपना नहीं है, जो असल में वह अंतिम नागरिक राहत दे दें, जिसकी शिकायतकर्ता मांग कर रहा हो। ऐसी शर्तें ज़मानत के प्रावधानों से बिल्कुल अलग होंगी, जैसा कि इस अदालत ने महेश चंद्र बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य के मामले में (2006) 6 SCC 196 में कहा था।”
अपील स्वीकार करते हुए अदालत ने फैसला सुनाया,
“ज़मानत देने के लिए अपीलकर्ताओं की संपत्तियाँ बेचने की शर्त लगाने वाला विवादित आदेश उचित नहीं है, इसलिए उसे रद्द किया जाता है।”
Cause Title: FEROZE BASHA & ANR. VERSUS STATE OF TAMIL NADU