'व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी' से जानकारी स्वीकार नहीं की जा सकती: जस्टिस नागरत्ना

Update: 2026-04-23 07:49 GMT

सुप्रीम कोर्ट में सबरीमला मामले की सुनवाई के आठवें दिन हल्के-फुल्के अंदाज में एक अहम टिप्पणी सामने आई। जस्टिस बी. वी. नागरत्ना ने कहा कि “व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी” से मिली जानकारी को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

यह टिप्पणी उस समय आई, जब सीनियर एडवोकेट नीरज किशन कौल ने दलील दी कि ज्ञान और जानकारी किसी भी स्रोत से आए, उसे स्वीकार किया जाना चाहिए। वे शशि थरूर के एक लेख का हवाला दे रहे थे, जिसमें धार्मिक मामलों में न्यायिक संयम की बात कही गई थी।

कोर्ट में क्या हुआ?

चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि किसी भी लेख या विचार को सम्मान दिया जा सकता है, लेकिन वह केवल व्यक्तिगत राय होती है और अदालत पर बाध्यकारी नहीं होती।

इस पर कौल ने कहा कि—

“ज्ञान और बुद्धिमत्ता किसी भी स्रोत से मिले, उसे स्वीकार करना चाहिए।”

तभी जस्टिस नागरत्ना ने हल्के अंदाज में कहा—

“लेकिन व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से नहीं।”

मामले की मुख्य बहस

सुनवाई के दौरान कौल ने अनुच्छेद 25 और 26 के बीच संतुलन की बात रखते हुए कहा कि—

धार्मिक संप्रदायों के अधिकार (Article 26) को हर स्थिति में सामाजिक सुधार कानूनों (Article 25(2)(b)) के अधीन नहीं माना जा सकता

इस पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि—

धार्मिक अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन होते हैं

इन्हीं आधारों पर सामाजिक सुधार कानून बनाए जा सकते हैं

'संवैधानिक नैतिकता' पर बहस

कौल ने यह भी तर्क दिया कि—

अनुच्छेद 25 और 26 में 'morality' का मतलब 'constitutional morality' नहीं होना चाहिए

'public morality' ही पर्याप्त है

इस पर जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने सवाल उठाया कि क्या 'constitutional morality' को लागू नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह एक विकसित होती अवधारणा है।

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