सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब अदालत खुद हस्ताक्षर या लिखावट की तुलना करके किसी नतीजे पर पहुंच सकती है तो विवादित लिखावट/हस्ताक्षर/अंगूठे के निशान वाले हर मामले को एक्सपर्ट की जांच के लिए भेजना सही नहीं है।

जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने कहा कि सिर्फ़ इस आधार पर एक्सपर्ट की राय नहीं मांगी जा सकती कि अदालतें लिखावट/हस्ताक्षर/अंगूठे के निशान की असलियत का पता लगाने में एक्सपर्ट नहीं हैं। कोर्ट ने साफ़ किया कि जब उसे कोई शक हो, या लिखावट/निशान धुंधला, अस्पष्ट या बहुत हल्का हो, तभी वह एक्सपर्ट की राय मांगने का अपना अधिकार इस्तेमाल कर सकती है।

कोर्ट ने कहा,

"इस कोर्ट का यह भी मानना ​​है कि हस्ताक्षर या लिखावट की तुलना करना और खुद किसी नतीजे पर पहुंचना कोर्ट की ज़िम्मेदारी है और कोर्ट यह कहकर इससे बच नहीं सकता कि वह एक्सपर्ट नहीं है। वास्तव में, एक्सपर्ट का सबूत सिर्फ़ एक राय होती है जो कोर्ट पर बाध्यकारी नहीं होती। इसलिए हाईकोर्ट का यह निष्कर्ष कि वसीयत की असलियत का पता लगाने के लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 39 के तहत एक्सपर्ट की राय लेना ज़रूरी है, कानूनन सही नहीं है। हालांकि, कोर्ट के पास एक्सपर्ट की राय मांगने का पूरा अधिकार है, जैसे कि जब उसे कोई शक हो या लिखावट/निशान धुंधला, अस्पष्ट या बहुत हल्का हो।"

यह मामला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच के आदेश से जुड़ा है। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस फ़ैसले को पलट दिया था, जिसमें एक्सपर्ट की राय मांगने से इनकार कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने रेस्पोंडेंट की उस अर्ज़ी को मंज़ूरी दे दी थी जिसमें हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की मांग की गई थी। हाईकोर्ट का कहना था कि 'वसीयत' की असलियत का पता लगाने के लिए एक्सपर्ट की राय 'ज़रूरी' है, क्योंकि कोर्ट खुद एक्सपर्ट नहीं है।

अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर तर्क दिया कि एक्सपर्ट एविडेंस (विशेषज्ञ की गवाही) बुलाने की शक्ति का इस्तेमाल आम तौर पर नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब कोर्ट खुद 'भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023' (BSA) की धारा 72 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करके हस्ताक्षर की तुलना कर सकते हैं। साथ ही अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि चूंकि प्रतिवादी ने खुद BSA की धारा 39 के तहत अपनी अर्जी में माना है कि उसके पिता किराएदार थे, इसलिए अब वह हस्ताक्षर पर सवाल उठाकर 'वसीयत' की असलियत पर एक ही समय में विवाद नहीं कर सकता।

इसके विपरीत, प्रतिवादी ने एक्सपर्ट एविडेंस की अनुमति देने वाले हाई कोर्ट के फैसले का बचाव किया। उसने सुप्रीम कोर्ट के 2008 के फैसले 'थिरुवेंगडा पिल्लई बनाम नवनीथमल और अन्य' का हवाला देते हुए तर्क दिया कि जहां लिखावट/हस्ताक्षर/अंगूठे के निशान को लेकर विवाद हो, वहां कोर्ट की राय या निष्कर्ष खतरनाक और जोखिम भरा हो सकता है, इसलिए मामले को किसी एक्सपर्ट के पास भेजा जाना चाहिए।

अपीलकर्ता के तर्कों में दम पाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हस्ताक्षर की तुलना के लिए हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की गवाही बुलाने वाले हाई कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया, क्योंकि यह काम BSA की धारा 72 के तहत भी किया जा सकता था।

कोर्ट के अनुसार, 'थिरुवेंगडा पिल्लई बनाम नवनीथमल और अन्य' के फैसले का मतलब यह नहीं निकाला जा सकता कि जिन मामलों में लिखावट/हस्ताक्षर/अंगूठे के निशान पर विवाद हो, उनमें एक्सपर्ट गवाह की जांच करना ज़रूरी है।

एक्सपर्ट एविडेंस बुलाने की शक्ति का इस्तेमाल तभी किया जा सकता है, जब कोर्ट को कोई संदेह हो, या लिखावट/निशान धुंधला, अस्पष्ट या बहुत हल्का हो।

नतीजतन, याचिका स्वीकार कर ली गई। एक्सपर्ट एविडेंस बुलाने से इनकार करने वाले ट्रायल कोर्ट के आदेश को बहाल कर दिया गया।

Case Title : GOPAL PATHAK VERSUS NITIN ALIAS PAPPU & ANR.

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