NDPS Act की धारा 50 सिर्फ़ व्यक्ति की तलाशी पर लागू होती है, न कि तब जब आरोपी के पास मौजूद सामान से कोई चीज़ बरामद हो: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (21 जुलाई) को कहा कि नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट, 1985 (NDPS Act) की धारा 50 के तहत मिलने वाली सुरक्षा - यानी किसी गजेटेड ऑफिसर या मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में तलाशी - सिर्फ़ आरोपी की व्यक्तिगत तलाशी के दौरान ही मिलेगी। यह सुरक्षा तब लागू नहीं होती जब आरोपी के पास कोई बैग, कंटेनर या कोई अन्य चीज़ हो।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने एक व्यक्ति की सज़ा बरकरार रखते हुए कहा,
"धारा 50 के तहत सुरक्षा उन मामलों तक ही सीमित है, जहां आरोपी की व्यक्तिगत तलाशी के ज़रिए कोई चीज़ बरामद की जानी हो। यह उन मामलों में लागू नहीं होती, जहां किसी चीज़ - जैसे बैग, कंटेनर, सूटकेस या कोई अन्य वस्तु - की तलाशी ली जा रही हो, जिसे आरोपी ले जा रहा हो।"
यह टिप्पणी उस व्यक्ति के मामले में की गई जो पानी की बोतल में छिपाकर नशीला पदार्थ (स्मैक) ले जा रहा था।
अपीलकर्ता ने NDPS Act की धारा 50 का हवाला देते हुए अपनी सज़ा को चुनौती दी। उसने तर्क दिया कि मजिस्ट्रेट या गजेटेड ऑफिसर की मौजूदगी में तलाशी न लेना गैर-कानूनी था और इसके आधार पर उसे बरी किया जाना चाहिए। साथ ही उसने धारा 52A का पालन न करने की भी शिकायत की और तर्क दिया कि मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में इकट्ठा किए गए सैंपल को न लेना अभियोजन पक्ष के मामले के लिए नुकसानदेह साबित हुआ।
उसके तर्कों को खारिज करते हुए जस्टिस करोल द्वारा लिखे गए फ़ैसले में कहा गया कि चूंकि नशीला पदार्थ पानी की बोतल से बरामद हुआ था जिसे अपीलकर्ता ले जा रहा था, इसलिए धारा 50 लागू नहीं होती।
कोर्ट ने कहा,
"इस मामले में चूंकि प्रतिबंधित पदार्थ पानी की बोतल से बरामद हुआ था जिसे अपीलकर्ता ले जा रहा था, न कि उसके शरीर से, इसलिए NDPS Act की धारा 50 लागू नहीं होती। इसके अलावा, रिकॉर्ड पर मौजूद सबूत साफ़ तौर पर दिखाते हैं कि अपीलकर्ता को मजिस्ट्रेट या गजेटेड ऑफिसर के सामने तलाशी कराए जाने के उसके अधिकार के बारे में बताया गया।"
इसके अलावा, NDPS Act की धारा 52A का पालन न करने (यानी मजिस्ट्रेट की मौजूदगी के बिना सैंपल लेने) के बारे में आरोपी की दलील खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि यह प्रक्रिया से जुड़ी अनियमितता थी और इसे बरी करने का आधार नहीं बनाया जा सकता, जब तक कि यह साबित न हो जाए कि NDPS Act की धारा 52A का पालन न करने से आरोपी को नुकसान हुआ है।
कोर्ट ने कहा,
"...मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में सैंपल न लेना केवल प्रक्रिया से जुड़ी एक अनियमितता है और इसे बरी करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।"
कोर्ट ने कहा,
"यह अच्छी तरह से स्थापित है कि धारा 52A के तहत बताई गई प्रक्रिया का पालन करने में देरी या पालन न करने से ही आरोपी को ट्रायल में बरी होने का हक नहीं मिल जाता, खासकर तब जब जांच अधिकारी ने यह साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत इकट्ठा कर लिए हों कि प्रतिबंधित सामान की तलाशी और् ज़ब्ती NDPS Act के अनिवार्य प्रावधानों के अनुसार की गई। जहां NDPS Act की धारा 52A का पालन न करने का आरोप लगाया जाता है, वहां अभियोजन पक्ष को या तो धारा 52A के निर्देशों का काफी हद तक पालन साबित करना होगा या कोर्ट को यह संतुष्ट करना होगा कि ऐसे पालन न करने से आरोपी के खिलाफ उनके मामले पर कोई असर नहीं पड़ा है।"
NDPS Act मौके पर सैंपल लेने से नहीं रोकता
“यह बात निर्विवाद है कि ज़ब्ती के समय सैंपल खुद PW-9 ने लिए थे, न कि किसी मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में। हालांकि, अपीलकर्ता यह साबित करने में नाकाम रहा है कि इस तरह के नियमों का पालन न करने से उसे कोई गंभीर नुकसान हुआ है। यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि NDPS Act, जैसा कि उस समय लागू था, ज़ब्ती की जगह पर सैंपल लेने से नहीं रोकता। जैसा कि ऊपर बताया गया, धारा 52A के तहत ज़रूरत प्रक्रिया से जुड़ी है। जांच अधिकारी द्वारा मौके पर या जांच के दौरान तैयार किए गए दस्तावेज़, जैसे पंचनामा, ज़ब्ती मेमो, गिरफ़्तारी मेमो आदि, प्रतिबंधित सामान की तलाशी और ज़ब्ती के संबंध में प्राथमिक सबूत माने जाते हैं। इन्हें सिर्फ़ इसलिए नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि एक्ट की धारा 52A का पालन करने में कोई चूक या कमी पाई गई।”
कोर्ट ने NCB बनाम काशिफ़, 2024 LiveLaw (SC) 1033 मामले का हवाला देते हुए यह बात कही।
सज़ा बरकरार रखते हुए कोर्ट ने देखा कि धारा 21 में कम से कम 10 साल की सज़ा का प्रावधान है और उसकी सज़ा को 14 साल से बदलकर कम-से-कम 10 साल कर दिया।
अपील को आंशिक रूप से मंज़ूरी दी गई।
Cause Title: MEHBOOB SHAH Versus STATE OF MADHYA PRADESH