S. 27 Evidence Act | पुलिस कस्टडी के बाहर दिए गए डिस्क्लोजर स्टेटमेंट मान्य नहीं होंगे: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (17 फरवरी) को अपनी छह साल की सौतेली बेटी की हत्या के दोषी को बरी किया। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि सबूतों की रिकवरी के लिए दिया गया डिस्क्लोजर स्टेटमेंट इंडियन एविडेंस एक्ट की धारा 27 के तहत तभी मान्य होगा, जब आरोपी बयान देते समय पुलिस कस्टडी में था।
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा कि आरोपी के डिस्क्लोजर स्टेटमेंट के आधार पर मृतक की हड्डियों के बचे हुए हिस्से की खोज को सबूत के तौर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि ऐसे डिस्क्लोजर स्टेटमेंट देते समय आरोपी कस्टडी में नहीं था।
कोर्ट ने कहा,
"एविडेंस एक्ट की धारा 27 साफ तौर पर कहता है कि पुलिस कस्टडी में किसी भी अपराध के आरोपी व्यक्ति से मिली जानकारी से किसी तथ्य का पता चलने पर उसे ट्रायल में साबित किया जा सकता है। बयान के समय आरोपी पुलिस कस्टडी में नहीं था। इसलिए इसे धारा 27 के दायरे से हटा दिया गया।"
दुर्लाव नामसुद्र बनाम एम्परर 1931 SCC ऑनलाइन Cal 146 के फैसले का ज़िक्र किया गया, जिसमें कहा गया कि "अगर जानकारी किसी ऐसे व्यक्ति से मिली है, जो पुलिस की कस्टडी में नहीं था तो उसे धारा 27 के तहत नहीं लाया जा सकता।"
कोर्ट ने कहा कि धारा 27 के तहत मेमोरेंडम 13 अक्टूबर, 2018 को सुबह 10.30 बजे रिकॉर्ड किया गया, जबकि अरेस्ट मेमो से पता चलता है कि आरोपी को उसी दिन रात 10.00 बजे ही अरेस्ट किया गया। चूंकि बयान देने के समय आरोपी पुलिस कस्टडी में नहीं था, इसलिए कोर्ट ने माना कि यह खुलासा धारा 27 के दायरे से बाहर है।
हालांकि कोर्ट ने माना कि "कस्टडी" का मतलब फॉर्मल अरेस्ट नहीं है और इसमें सर्विलांस या रोक शामिल हो सकती है, जैसा कि धर्म देव यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य में बताया गया। हालांकि, उसे यह दिखाने के लिए कोई मटीरियल नहीं मिला कि बयान रिकॉर्ड करते समय आरोपी किसी ऐसी रोक में था।
स्टेट ऑफ़ ए.पी. बनाम गंगुला सत्य मूर्ति (1997) 1 SCC 272 के उदाहरण पर भरोसा करते हुए कोर्ट ने माना कि हालांकि कस्टडी के बाहर दिया गया डिस्क्लोज़र स्टेटमेंट धारा 27 के दायरे से बाहर है, लेकिन यह एविडेंस एक्ट की धारा 8 के तहत आरोपी के व्यवहार को दिखाने के लिए मान्य हो सकता है। हालांकि, बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया कि ऐसा सबूत कमज़ोर है और अकेले, सज़ा का आधार नहीं बन सकता।
कोर्ट ने कहा,
“आरोपी की जानकारी, जिससे हड्डी के बचे हुए हिस्से का पता चला। हालांकि, धारा 27 के तहत स्वीकार्य नहीं है। फिर भी धारा 8 के तहत स्वीकार्य सबूत होगा, जो अपने आप में एक कमज़ोर सबूत है। धारा 8 के तहत सबूत सिर्फ़ पुष्टि कर सकते हैं और अपने आप में सज़ा का नतीजा नहीं बन सकते।”
हालांकि, DNA सबूतों से बच्चे की मौत की पुष्टि हुई, लेकिन जस्टिस चंद्रन के लिखे फैसले में कहा गया कि यह आरोपी को जुर्म से पूरी तरह से नहीं जोड़ता, खासकर मौत का कोई पक्का समय न होने और परिवार द्वारा बच्चे के लापता होने की रिपोर्ट करने में लंबी, बिना किसी वजह के देरी को देखते हुए, जबकि उन्हें पता था कि बच्चा आखिरी बार आरोपी के साथ था।
कोर्ट ने कहा,
"जब तक लापता बच्चे के बारे में कोई शिकायत नहीं की गई और परिवार और पुलिस को बताया गया कि वह आरोपी के साथ गई, तब तक किसी ने भी आरोपी से पूछताछ नहीं की। इससे मामला आरोपी के पक्ष में जाता है; खासकर इसलिए, क्योंकि उसे FIR दर्ज होने से दो दिन पहले 08.10.2018 को रिहा किया गया। यह भी ज़रूरी है कि चूंकि कॉर्पस डेलिक्टी बरामद नहीं हुआ। इसलिए मौत का कोई समय नहीं बताया गया। इसलिए हम आरोपी की सज़ा बरकरार नहीं रख सकते। उसे शक का फ़ायदा ज़रूर मिलना चाहिए।"
हालांकि अपील स्वीकार की गई, लेकिन कोर्ट ने सरकारी वकील की तारीफ़ की, जिन्होंने पुलिस की जांच में बड़ी कमियों के बावजूद, समझदारी से दलीलें दीं।
कोर्ट ने कहा,
“हम यह ज़रूर कह सकते हैं कि अगर जांच, स्टेट काउंसिल की तैयारी जितनी अच्छी होती तो बेचारे बच्चे के गायब होने और मौत पर से राज़ हट सकता था।”
कोर्ट ने आगे कहा,
“हम अपील करने वाले के सीनियर वकील की कोशिशों की भी तारीफ़ करते हैं, जिन्होंने जांच को ठीक से न करने के लिए स्टेट की जांच की।”
Cause Title: Rohit Jangde Versus The State of Chhattisgarh