'शॉपिंग मॉल जैसी याचिका' : व्यापक PIL पर सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप से किया इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक प्राधिकरणों की कथित लापरवाही से होने वाली मौतों को रोकने के लिए व्यापक दिशा-निर्देश जारी करने की मांग वाली एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि याचिका बहुत व्यापक है और इसमें मांगी गई राहतें इतनी विस्तृत हैं कि उन्हें लागू करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं होगा।
चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ इस याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश देने की मांग की गई थी कि वे सार्वजनिक प्राधिकरणों की लापरवाही से होने वाली मौतों को रोकने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार करें। इसमें असुरक्षित बुनियादी ढांचे, अधूरे निर्माण कार्य, खराब वायरिंग से होने वाली बिजली के झटके जैसी घटनाओं का उल्लेख किया गया था।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ता ने दलील दी कि संबंधित अधिकारियों को कई बार प्रतिनिधित्व देने के बावजूद कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए। उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाओं का लेखा-जोखा रखने और उन्हें रोकने के लिए एक तंत्र बनाने की आवश्यकता है।
इस पर चीफ़ जस्टिस ने कहा कि यह याचिका पहले दायर की गई समान याचिका की लगभग प्रतिलिपि प्रतीत होती है। उन्होंने यह भी कहा कि सभी राज्यों की आर्थिक परिस्थितियां और प्रशासनिक चुनौतियां अलग-अलग हैं, इसलिए पूरे देश के लिए एक समान SOP बनाना व्यावहारिक नहीं होगा।
सीजेआई ने कहा, “हर राज्य पर अलग-अलग तरह का दबाव है और उनकी वित्तीय सीमाएं भी अलग हैं। कुछ राज्य कर्मचारियों के वेतन देने के लिए भी उधार ले रहे हैं। ऐसे में यदि सभी राज्यों पर एक समान SOP लागू करने को कहा जाए, तो वे कहेंगे कि उनके पास इसके लिए संसाधन ही नहीं हैं।”
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से हिरासत में मौत, पुल गिरने जैसी कई व्यापक समस्याओं का उल्लेख किया गया। इस पर चीफ़ जस्टिस ने टिप्पणी करते हुए कहा, “आपकी याचिका किसी शोरूम या शॉपिंग मॉल की तरह है—गड्ढों से लेकर पुलिस भवनों तक, अधूरे पुलों से लेकर अंडरपास तक, हर तरह की शिकायत इसमें शामिल है। ऐसा कोई मुद्दा नहीं है जो इसमें न हो।”
अंततः अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि इतनी व्यापक प्रकृति के मामलों में सामान्य दिशा-निर्देश जारी करना संभव नहीं है, जब तक कि मुद्दे किसी विशेष राज्य से संबंधित और स्पष्ट रूप से परिभाषित न हों।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता उचित रूप से तैयार याचिका के साथ संबंधित उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकते हैं। अदालत ने यह भी कहा कि वह इस मामले के गुण-दोष (merits) पर कोई टिप्पणी नहीं कर रही है।