S. 125 CrPC | पति शुरुआती में ही पत्नी का एक्स्ट्रा-मैरिटल अफेयर साबित कर दे तो पत्नी को अंतरिम गुज़ारा-भत्ता देने से इनकार किया जा सकता है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (31 जुलाई) को कहा कि CrPC की धारा 125 के तहत पत्नी को अंतरिम गुज़ारा-भत्ता देने से इनकार किया जा सकता है, अगर पति शुरुआती स्तर पर ही पत्नी के एक्स्ट्रा-मैरिटल अफेयर (व्यभिचार) को साबित कर देता है।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने कहा,
"...हमारा मानना है कि अगर पति धारा 125(4) के तहत अर्ज़ी दाखिल करता है और पहली ही बार में सबूतों के ज़रिए आरोप को साबित कर देता है, तभी अंतरिम गुज़ारा-भत्ता देने पर रोक लगाई जा सकती है।"
बेंच ने एक पति की अपील को मंज़ूरी देते हुए यह बात कही। पति ने धारा 125(4) के तहत व्यभिचार का आरोप लगाते हुए अर्ज़ी दी थी, जिसे ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए खारिज किया कि इस मुद्दे पर फ़ैसला सिर्फ़ अंतिम सुनवाई के चरण में ही किया जा सकता है।
अपीलकर्ता (पति) ने 2014 में प्रतिवादी नंबर 2 (पत्नी) से शादी की थी। रिश्तों में खटास के कारण पत्नी 2020 में बच्चे और कीमती सामान के साथ ससुराल छोड़कर चली गई। इसके बाद उसने गुज़ारा-भत्ते की मांग करते हुए CrPC की धारा 125 के तहत अर्ज़ी दाखिल की।
पति ने CrPC की धारा 125(4) के तहत अर्ज़ी दाखिल की और तर्क दिया कि एक्स्ट्रा-मैरिटल अफेयर के कारण पत्नी किसी भी गुज़ारा-भत्ते की हकदार नहीं है। उसने पत्नी की बेवफाई दिखाने वाली तस्वीरें और अन्य सबूत पेश किए।
ट्रायल कोर्ट ने पति की अर्ज़ी को यह कहते हुए खारिज किया कि दस्तावेज़ों की प्रमाणिकता और असलियत का पता मुख्य याचिका में सबूत पेश किए जाने के बाद ही लगाया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने भी इस विचार को सही ठहराया और कहा कि अंतरिम गुज़ारा-भत्ते की अर्ज़ी पर फ़ैसला करने से पहले ऐसे मुद्दे पर फ़ैसला करने का कोई प्रावधान नहीं है।
हाईकोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ पति सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
विवादित फ़ैसला रद्द करते हुए जस्टिस करोल द्वारा लिखे गए फ़ैसले में कहा गया कि निचली अदालतों ने अपीलकर्ता की CrPC की धारा 125(4) के तहत अर्ज़ी को शुरुआती चरण में ही खारिज करके गलती की थी। जब पति द्वारा पेश किए गए सबूतों से पत्नी के व्यभिचारी संबंधों की बात साफ़ तौर पर साबित हो गई तो निचली अदालतों के लिए उसकी अर्ज़ी को शुरुआती चरण में ही खारिज कर देना गलत था, बजाय इसके कि वे अंतरिम चरण में उस पर कोई फ़ैसला लेतीं।
अदालत ने कहा,
"निचली अदालतों ने यह मानकर गलती की कि ऐसे सवाल पर सिर्फ़ अंतिम फ़ैसले के चरण में ही विचार किया जा सकता है। इस नज़रिए से कानून में दी गई व्यवस्था बेकार हो जाएगी।"
अदालत ने कहा,
"...मामले को ट्रायल कोर्ट में वापस भेजा जा रहा है ताकि वे मामले के गुण-दोष के आधार पर फ़ैसला कर सकें, क्योंकि उन्होंने इस मामले में अर्ज़ी को शुरुआती चरण में ही खारिज किया।"
अपील मंज़ूर की गई।
Cause Title: HIMANSHU CHORDIA VERSUS STATE OF RAJASTHAN & ANR.