S. 100 CPC | तथ्यों पर आधारित निष्कर्ष, भले ही गलत हों, दूसरी अपील में बदले नहीं जा सकते: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-04-21 06:39 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि दूसरी अपील की सुनवाई करते समय, हाई कोर्ट के लिए यह स्वीकार्य नहीं है कि वह सबूतों का फिर से मूल्यांकन करके निचली अदालत के तथ्यों पर आधारित निष्कर्षों को फिर से खोले या उनमें बदलाव करे।

जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने प्रतिवादी द्वारा दायर अपील खारिज की। प्रतिवादी हाई कोर्ट द्वारा पहली अपीलीय अदालत के 'विशिष्ट पालन' (specific performance) के आदेश की पुष्टि किए जाने से असंतुष्ट था। अपीलकर्ता-प्रतिवादी ने आरोप लगाया कि पहली अपीलीय अदालत द्वारा 'तैयारी और इच्छा', 'समय-सीमा में विस्तार' और 'नकद भुगतान' जैसे तथ्यों पर आधारित जो निष्कर्ष दर्ज किए गए, वे गलत थे। साथ ही हाईकोर्ट ने किसी सही निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए उन तथ्यों का फिर से मूल्यांकन नहीं किया।

यह विवाद 1988 में निष्पादित कृषि भूमि को बेचने के समझौते के 'विशिष्ट पालन' के लिए दायर मुकदमे से उत्पन्न हुआ था। जहां ट्रायल कोर्ट ने 'विशिष्ट पालन' से इनकार किया था और केवल आंशिक भुगतान की वापसी का आदेश दिया था, वहीं पहली अपीलीय अदालत ने इस फैसले को पलट दिया और 'विशिष्ट पालन' का आदेश दिया। अदालत ने पाया कि वादी ने भुगतान, समय-सीमा में विस्तार और अपनी 'तैयारी और इच्छा' को साबित किया था।

हाईकोर्ट ने दूसरी अपील में हस्तक्षेप करने से यह मानते हुए इनकार किया कि इसमें कानून का कोई 'सारवान प्रश्न' (substantial question of law) नहीं उठ रहा है, जिसके परिणामस्वरूप यह मामला सुप्रीम कोर्ट में अपील के रूप में पहुँचा।

अपील खारिज करते हुए जस्टिस मित्तल द्वारा लिखे गए फैसले में यह टिप्पणी की गई:

"कानून में यह बात स्थापित है कि तथ्यों पर आधारित निष्कर्ष, चाहे वे कितने भी गलत क्यों न हों, दूसरी अपील में उन्हें फिर से खोला या बदला नहीं जा सकता। दूसरी अपील में केवल कानून के 'सारवान प्रश्न' (यदि कोई हो) पर ही निर्णय दिया जाना अपेक्षित होता है। अतः, यह तर्क कि हाईकोर्ट को दूसरी अपील में पहली अपीलीय अदालत के निष्कर्षों की सत्यता सुनिश्चित करने के लिए सबूतों की जांच करनी चाहिए थी—पूरी तरह से आधारहीन है और खारिज किया जाता है।"

अदालत ने कहा कि जब तक हाईकोर्ट कानून का कोई 'सारवान प्रश्न' तैयार नहीं कर लेता, तब तक उसके लिए तथ्यों पर आधारित निष्कर्षों का फिर से मूल्यांकन करना या उनमें बदलाव करना स्वीकार्य नहीं है—भले ही वे निष्कर्ष देखने में गलत प्रतीत होते हों।

अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा,

"...पहली अपीलीय अदालत द्वारा 'तैयारी और इच्छा', 'समय-सीमा में विस्तार' और 'नकद भुगतान' जैसे तथ्यों पर दिए गए निष्कर्ष न तो विकृत हैं और न ही गैर-कानूनी; अतः उनमें किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है।"

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून के किसी 'सारवान प्रश्न' के अभाव में, हाई कोर्ट तथ्यों पर आधारित निष्कर्षों की फिर से जाँच करने से वर्जित है।

कोर्ट ने फैसला सुनाया,

"...यह तर्क कि हाईकोर्ट को दूसरी अपील में पहली अपीलीय कोर्ट के निष्कर्षों की सही होने की पुष्टि करने के लिए सबूतों की जांच करनी चाहिए थी, बेबुनियाद है और टिक नहीं पाता।"

तदनुसार, पहली अपीलीय कोर्ट द्वारा पारित डिक्री बरकरार रखी गई।

Cause Title: RUSSI FISHERIES P. LTD. & ANR. VERSUS BHAVNA SETH & ORS.

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