'रेस ज्यूडिकाटा' का सिद्धांत एक ही मुकदमे के दो चरणों के बीच भी लागू होता है: सुप्रीम कोर्ट ने 'इंटरलोक्यूटरी रेस ज्यूडिकाटा' को समझाया
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि 'रेस ज्यूडिकाटा' (Res Judicata) का सिद्धांत एक ही मुकदमे के दो अलग-अलग चरणों के बीच भी लागू होता है। इसे 'इंटरलोक्यूटरी रेस ज्यूडिकाटा' (Interlocutory Res Judicata) का सिद्धांत कहा जाता है।
इसलिए सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश VII नियम 11 के तहत पहले दायर की गई किसी अर्जी को खारिज कर दिए जाने के बाद उसी आधार पर वाद (Plaint) को खारिज करने के लिए बाद में दायर की गई अर्जी पर रोक लगाई जा सकती है।
कोर्ट ने कहा कि इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वाद को खारिज करने की मांग वाली बाद की अर्जी किसी दूसरे व्यक्ति ने दायर की थी। यदि अर्जी का मूल विषय (Substance) वही रहता है तो बाद की अर्जी पर 'रेस ज्यूडिकाटा' के सिद्धांत के तहत रोक लग जाएगी।
कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा,
"यह सिद्धांत (रेस ज्यूडिकाटा का) न केवल दो अलग-अलग मुकदमों के बीच लागू होता है, बल्कि एक ही मुकदमे के दो अलग-अलग चरणों के बीच भी लागू होता है, जिसे 'इंटरलोक्यूटरी रेस ज्यूडिकाटा' कहा जाता है।"
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की। इस मामले में अपीलकर्ता-बेटी ने 'हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956' (जिसे आगे 'अधिनियम' कहा गया है) की धारा 8 के तहत 'प्रथम श्रेणी की वारिस' (Class I Heir) के तौर पर अपने पिता की बिना वसीयत वाली संपत्ति में बंटवारे की मांग करते हुए एक मुकदमा दायर किया था।
इस मुकदमे का विरोध करते हुए कुछ भाइयों ने CPC के आदेश VII नियम 11(d) के तहत वाद खारिज करने की मांग करते हुए अर्जी दायर की। उन्होंने तर्क दिया कि यह मुकदमा अधिनियम में 2005 में किए गए संशोधन के कारण बाधित है, क्योंकि अधिनियम की धारा 6(5) के अनुसार, अपीलकर्ता के लिए दिसंबर 2004 से पहले प्रतिवादी-भाइयों के बीच हुए बंटवारे या व्यवस्था को दोबारा खोलना (Reopen) अनुमेय नहीं था।
हालांकि, वाद खारिज करने की मांग वाली पहली अर्जी खारिज कर दी गई थी और मुकदमा जारी रहा। बाद में एक अन्य प्रतिवादी ने CPC के आदेश VII नियम 11 के तहत कुछ अतिरिक्त आधारों का हवाला देते हुए वाद खारिज करने की मांग करते हुए एक और अर्जी दायर की। इस अर्जी का मूल विषय भी वही था, जो पहली अर्जी का था, यानी यह तर्क देना कि यह मुकदमा 2005 के संशोधन अधिनियम के कारण बाधित है। दोनों अर्जियों के बीच एकमात्र अंतर यह था कि उन्हें अलग-अलग व्यक्तियों द्वारा दायर किया गया।
बाद में दायर की गई अर्जी स्वीकार करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट ने यह फैसला दिया कि यह वाद कानून द्वारा बाधित है और इसे खारिज किया जाता है। इस फैसले से व्यथित होकर अपीलकर्ता-बेटी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। हाईकोर्ट का फ़ैसला रद्द करते हुए जस्टिस मसीह द्वारा लिखे गए फ़ैसले में यह कहा गया कि चूंकि दोनों आवेदनों में मुद्दे का सार एक ही था, इसलिए सिर्फ़ अलग-अलग प्रतिवादियों द्वारा आवेदन दायर करने से 'रेस ज्यूडिकाटा' (Res Judicata) के सिद्धांत का लागू होना नहीं रुकेगा।
कोर्ट ने कहा कि जब अलग-अलग लोग एक ही अधिकार के तहत मुक़दमा लड़ते हैं, और मुद्दे का सार भी एक ही होता है - यानी, मुक़दमा एक्ट की धारा 6(5) के तहत वर्जित है - तो बाद वाला आवेदन 'रेस ज्यूडिकाटा' के सिद्धांत के तहत वर्जित माना जाएगा।
कोर्ट ने कहा,
“हाईकोर्ट ने अपने विवादित आदेश में इस आधार पर 'रेस ज्यूडिकाटा' के सिद्धांत को लागू होने से रोकने की कोशिश की कि पहला आवेदन प्रतिवादी नंबर 1 से 3 द्वारा दायर किया गया, जबकि दूसरा आवेदन प्रतिवादी नंबर 4 के कानूनी प्रतिनिधियों द्वारा दायर किया गया। यह तर्क हमें सही नहीं लगता। सभी प्रतिवादी एक ही पूर्वज के बेटे (या उनके कानूनी प्रतिनिधि) हैं। उनका हित एक ही है: वे एक ही 'बंटवारा विलेख' (Partition Deed) का बचाव करते हैं, बंटवारे के लिए दायर किए गए एक ही मुक़दमे का विरोध करते हैं, और एक ही दलील देते हैं कि मुक़दमे से संबंधित संपत्तियों पर बेटियों का कोई अधिकार नहीं है। वे CPC की धारा 11 के 'स्पष्टीकरण VI' के अर्थ के अनुसार, जैसा कि ऊपर बताया गया, एक ही अधिकार के तहत मुक़दमा लड़ते हैं।”
कोर्ट ने टिप्पणी की,
“मुद्दे का सार - कि क्या मुक़दमे को इस आधार पर खारिज किया जाना चाहिए कि यह एच.एस. एक्ट की धारा 6(5) के तहत वर्जित है - वही रहता है,”
मुक़दमा खारिज करने के लिए सिर्फ़ कुछ अतिरिक्त आधारों का ज़िक्र करने से 'रेस ज्यूडिकाटा' का सिद्धांत लागू होने से नहीं रुकेगा, जब तक कि मुद्दे का सार वही रहता है।
कोर्ट ने कहा,
“यह आधार कि मुक़दमे में 'वाद-हेतु' (Cause of Action) नहीं बताया गया [खंड (a)] या मुक़दमा दोषपूर्ण है [खंड (b)] - इसे पहले आवेदन में उठाया जा सकता था, और वास्तव में उठाया जाना भी चाहिए था। दूसरे आवेदन में सिर्फ़ कुछ अतिरिक्त उप-खंडों का ज़िक्र करने से मामला 'रेस ज्यूडिकाटा' के दायरे से बाहर नहीं हो जाता। मुद्दे का सार - कि क्या मुक़दमे को इस आधार पर खारिज किया जाना चाहिए कि यह एच.एस. एक्ट की धारा 6(5) के तहत वर्जित है - वही रहता है। कोई भी पक्ष किसी प्रतिकूल आदेश की अंतिम वैधता को, उसी चुनौती को किसी अलग प्रक्रियात्मक प्रावधान के तहत दोबारा पेश करके दरकिनार नहीं कर सकता।”
उपर्युक्त के आधार पर अपील स्वीकार की गई।
Cause Title: B.S. LALITHA AND OTHERS VERSUS BHUVANESH AND OTHERS