'ओनर रिस्क' पर बुक किए गए सामान की कम डिलीवरी के लिए रेलवे तब तक ज़िम्मेदार नहीं, जब तक उसने खुद सामान की गिनती या वज़न न किया हो: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-07-17 11:00 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि "ओनर रिस्क" (मालिक के जोखिम) रेट पर बुक किए गए सामान की कम डिलीवरी के लिए रेलवे को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि उसने ट्रांसपोर्ट से पहले खुद सामान की गिनती या वज़न न किया हो और इस तरह उसे सौंपी गई मात्रा की देखभाल की ज़िम्मेदारी न ली हो।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने M/s बजाज ट्रेडिंग कंपनी की अपील खारिज कr। कंपनी ने गुजरात से असम भेजे गए नमक के 1,742 बोरे कम होने के लिए मुआवज़े की मांग की थी। कोर्ट ने रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल और गुवाहाटी हाईकोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें दावा खारिज कर दिया गया।

यह विवाद तब शुरू हुआ, जब अपीलकर्ता ने नवंबर 2009 में गुजरात के चिराई जंक्शन से असम के धर्मनगर तक नमक के 40,444 बोरे बुक किए। पहुंचने पर, कथित तौर पर केवल 38,702 बोरे ही डिलीवर किए गए। हालांकि रेलवे ने शॉर्टेज सर्टिफिकेट (कमी का प्रमाण पत्र) जारी किया, लेकिन उसने इस आधार पर ज़िम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया कि कंसाइनमेंट "ओनर रिस्क" रेट पर बुक किया गया और उस पर "सेड टू कंटेन" (सामान होने का दावा) का नोट लगा था, जिसका मतलब था कि रेलवे कर्मचारियों ने लोड किए गए सामान की मात्रा की पुष्टि नहीं की थी।

अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि रेलवे, रेलवे एक्ट, 1989 की धारा 93 के तहत सामान्य ज़िम्मेदारी से बंधा हुआ है और रेलवे अधिकारियों को लोडिंग प्रक्रिया की निगरानी करनी चाहिए। उसने यह भी कहा कि "सेड टू कंटेन" नोट रेलवे को ज़िम्मेदारी से मुक्त नहीं कर सकता।

इन दलीलों को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि रेलवे एक्ट की धारा 97, जो "ओनर रिस्क" रेट पर ले जाए जाने वाले कंसाइनमेंट पर लागू होती है, धारा 93 के तहत सामान्य ज़िम्मेदारी से ऊपर है। इसलिए रेलवे को केवल तभी ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है जब उसकी ओर से लापरवाही या गलत काम साबित हो।

बेंच ने कहा कि ऐसी लापरवाही तभी हो सकती है जब रेलवे अधिकारियों ने ट्रांसपोर्ट से पहले सामान की मात्रा की पुष्टि की हो। कोर्ट ने कहा, "अगर वे किसी भी स्टेज पर सामान को नोट करने, गिनने या तौलने में शामिल होते और उन्हें पता होता कि वे कितना सामान ले जा रहे हैं, तो यह कहा जा सकता था कि उनकी यह ज़िम्मेदारी थी कि वे यह पक्का करें कि जितना सामान उन्होंने गिना या तौला है, उतना ही वे सुरक्षित रूप से आखिरी मंज़िल तक पहुँचाएँ। लेकिन ऐसा नहीं था।"

कोर्ट ने बताया कि रेलवे एक्ट की धारा 65(2) के प्रोविज़ो (शर्त) के तहत, जब रेलवे कर्मचारी पैकेट की संख्या की जाँच नहीं करते हैं और रेलवे रसीद में इसके बारे में कोई नोट नहीं लिखा जाता है तो मात्रा साबित करने की ज़िम्मेदारी कंसाइनर (सामान भेजने वाले), कंसाइनी (सामान पाने वाले) या एंडॉर्सी (जिसे अधिकार सौंपा गया हो) की होती है।

कोर्ट ने पाया कि अपील करने वाला व्यक्ति नमक की खरीदी गई, प्रोसेस की गई और भेजी गई मात्रा को दिखाने वाले दस्तावेज़ी सबूत पेश करके इस ज़िम्मेदारी को पूरा करने में नाकाम रहा।

कोर्ट ने कहा,

"अपील करने वाले ने ऐसे कोई दस्तावेज़ नहीं दिए, जिनसे यह पता चले कि कितनी बोरियां खरीदी और प्रोसेस की गई थीं और फिर उन्हें आयोडीन मिलाने (आयोडाइज़ेशन) के लिए आगे भेजा गया था। दूसरे शब्दों में, धारा 65(2) के प्रोविज़ो के अनुसार सबूत पेश करने की ज़िम्मेदारी पूरी नहीं की गई।"

यह मानते हुए कि रेलवे की तरफ़ से कोई लापरवाही साबित नहीं हुई, सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज की।

Case : M/s Bajaj Trading Company v. Union of India

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