बेनामी लेन-देन में खरीदी गई संपत्ति पर असली मालिक, बेनामीदार द्वारा बनाई गई वसीयत के आधार पर दावा नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-05-09 08:34 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि कोई भी व्यक्ति बेनामी लेन-देन में खरीदी गई संपत्ति पर, केवल उसके नाममात्र के मालिक (Ostensible Owner) द्वारा बनाई गई वसीयत के आधार पर मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकता। कोर्ट ने यह टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह की वसीयत संबंधी व्यवस्थाओं का इस्तेमाल 'बेनामी संपत्ति लेन-देन निषेध अधिनियम, 1988' केतहत मौजूद कानूनी रोक को खत्म करने के लिए नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने शुक्रवार (8 मई) को यह भी फैसला दिया कि किसी व्यावसायिक अनुबंध के तहत किसी अन्य व्यक्ति द्वारा दिए गए पैसों से खरीदी गई संपत्तियां, 'बेनामी संपत्ति लेन-देन निषेध अधिनियम, 1988' (अधिनियम) के तहत छूट पाने के लिए 'विश्वसनीय कर्तव्य' (Fiduciary Duty) की श्रेणी में नहीं आतीं। इस वजह से, ऐसी संपत्तियां केंद्र सरकार द्वारा जब्त किए जाने के योग्य हो जाती हैं।

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की। इस मामले में अपीलकर्ता-प्रतिवादी और प्रत्यर्थी-वादी, दोनों ही उस विवादित संपत्ति पर मालिकाना हक का दावा कर रहे थे, जिसे के. रघुनाथ के नाम पर खरीदा गया था। के. रघुनाथ इस संपत्ति के केवल नाममात्र के मालिक है, क्योंकि संपत्ति खरीदने के लिए इस्तेमाल किया गया पैसा असल में वादी ने ही लगाया।

वादी ने नाममात्र के मालिक द्वारा अपने पक्ष में बनाई गई एक पंजीकृत वसीयत के आधार पर संपत्ति पर मालिकाना हक का दावा किया। वादी ने तर्क दिया कि हालांकि ये संपत्तियां स्वर्गीय के. रघुनाथ के नाम पर दर्ज थीं, लेकिन असल में इन्हें उसके (वादी के) पैसों से ही खरीदा गया। ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि 'कर्नाटक भूमि सुधार अधिनियम' के तहत मौजूद कानूनी प्रतिबंधों के कारण वह अपने नाम पर कृषि भूमि नहीं खरीद सकता था। उसने 20 अप्रैल, 2018 की तारीख वाली एक पंजीकृत वसीयत का हवाला दिया, जिसे कथित तौर पर रघुनाथ ने उसके पक्ष में बनाया।

इसके जवाब में प्रतिवादियों ने उत्तराधिकार के आधार पर संपत्ति पर कब्ज़े और मालिकाना हक का दावा किया। उन्होंने तर्क दिया कि मृतक (के. रघुनाथ), जो कुछ प्रतिवादियों के पिता और पहली अपीलकर्ता के पति थे, ने यह संपत्ति अपीलकर्ता संख्या 1 (जो अन्य अपीलकर्ताओं की मां हैं) के नाम वसीयत कर दी थी।

प्रत्यर्थी-वादी ने संपत्ति पर मालिकाना हक की घोषणा और स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction) की मांग करते हुए मुकदमा दायर किया। हालांकि, अपीलकर्ता-प्रतिवादी ने इस मुकदमे का विरोध किया और 'दीवानी प्रक्रिया संहिता' (CPC) के 'आदेश VII नियम 11' के तहत एक आवेदन दायर करके वादी के दावे (plaint) को खारिज करने की मांग की। प्रतिवादी ने यह तर्क दिया कि वादी का दावा कानून द्वारा वर्जित है, यानी यह 'बेनामी अधिनियम' के प्रावधानों के विपरीत है।

प्रतिवादियों ने मुख्य रूप से यह तर्क दिया कि चूंकि वादी द्वारा विवादित संपत्ति पर अपना मालिकाना हक जताने के लिए दायर किया गया मुकदमा एक बेनामी संपत्ति से जुड़ा था, इसलिए वे उस पर मालिकाना हक और स्वामित्व का दावा नहीं कर सकते।

दूसरी ओर, वादी-प्रतिवादी ने मुकदमा दायर करने को सही ठहराते हुए तर्क दिया कि मृतक उस संपत्ति को उसके साथ एक 'विश्वासपूर्ण संबंध' (Fiduciary Relationship) के तहत, नियोक्ता-कर्मचारी संबंध के हिस्से के रूप में रखे हुए था; इस प्रकार वह 'बेनामी संपत्ति लेनदेन निषेध अधिनियम' के तहत छूट पाने का हकदार है। उसने दावा किया कि यह मुकदमा एक वसीयत पर आधारित था, न कि कथित बेनामी लेनदेन पर।

ट्रायल कोर्ट ने CPC के 'आदेश VII नियम 11' के तहत दायर अर्जी को स्वीकार किया, जिसके बाद वादी ने हाईकोर्ट का रुख किया और एक 'नियमित प्रथम अपील' (Regular First Appeal) दायर की।

हाईकोर्ट के उस फैसले से असंतुष्ट होकर, जिसमें उसने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट दिया, प्रतिवादियों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

मुद्दा

मुख्य मुद्दा यह था कि क्या मृतक विवादित संपत्ति को प्रतिवादी-वादी के साथ एक 'विश्वासपूर्ण संबंध' के हिस्से के रूप में रखे हुए था, ताकि वह अधिनियम के तहत छूट प्राप्त कर सके।

निर्णय

हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए जस्टिस महादेवन द्वारा लिखे गए फैसले में यह माना गया कि मृतक और प्रतिवादी-वादी के बीच के संबंध को 'विश्वासपूर्ण कर्तव्य' (Fiduciary Duty) की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता; क्योंकि "विश्वासपूर्ण कर्तव्य तब उत्पन्न होता है, जब कोई एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के हितों की रक्षा करने के लिए बाध्य होता है। उसे उस विश्वासपूर्ण पद का उपयोग करके कोई निजी लाभ नहीं उठाना चाहिए।"

कोर्ट ने यह भी कहा कि चूंकि प्रतिवादी द्वारा मृतक को धनराशि का कथित हस्तांतरण एक 'समझौता ज्ञापन' (MoU) के तहत किया गया—जो दोनों पक्षों के बीच व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए एक अनुबंध के रूप में किया गया—इसलिए प्रतिवादी अधिनियम के तहत छूट का दावा नहीं कर सकता।

कोर्ट ने कहा,

“मालिक-कर्मचारी का रिश्ता, अपने आप में बेनामी कानून के तहत छूट के मकसद से भरोसे वाले रिश्तों (Fiduciary Relationship) की मानी हुई कैटेगरी में नहीं आता। दूसरी बात, कानून आम तौर पर किसी कंपनी और उसके कर्मचारी के बीच, या किसी डायरेक्टर और कंपनी के कर्मचारी के बीच उस तरह का भरोसे वाला रिश्ता नहीं मानता जैसा कि यहां दिखाने की कोशिश की गई। बल्कि, माना हुआ भरोसे वाला फ़र्ज़ डायरेक्टर का कंपनी के प्रति होता है, क्योंकि डायरेक्टर कंपनी के फ़ायदे में काम करने के लिए बँधा होता है।” (देखें संग्रामसिंह पी. गायकवाड़ और अन्य बनाम शांतादेवी पी. गायकवाड़ (मृत) उनके कानूनी वारिसों (LRs) के ज़रिए और अन्य, (2005) 11 SCC 314)

यह देखते हुए कि “प्रॉपर्टी खरीदने के लिए पैसे का कथित ट्रांसफर MOUs में लिखे गए कॉन्ट्रैक्ट के इंतज़ामों पर आधारित था,” कोर्ट ने प्रतिवादी / वादी की इस दलील को खारिज किया कि “उसके और के. रघुनाथ के बीच कोई भरोसे वाला रिश्ता था, जिससे कि यह लेन-देन बेनामी कानून की सख्ती से छूट पा सके।”

चूंकि यह पाया गया कि प्रॉपर्टी एक बेनामी लेन-देन के तहत हासिल की गई। साथ ही अपीलकर्ता-प्रतिवादी यह साबित करने में नाकाम रहा कि मृतक ने प्रॉपर्टी स्वतंत्र स्रोतों से हासिल की थी, इसलिए केस वाली प्रॉपर्टी पर अपीलकर्ता-प्रतिवादी का दावा भी खारिज कर दिया गया, जिससे केस वाली प्रॉपर्टी एक्ट की धारा 27 के तहत ज़ब्ती के लायक हो गई।

कोर्ट ने कहा,

“के. रघुनाथ द्वारा प्रॉपर्टीज़ की खरीद बेनामी एक्ट की धारा 3 या 4 में दी गई किसी भी छूट के तहत सुरक्षित नहीं है, चाहे वह संशोधन से पहले हो या बाद में, और जिन MOUs पर भरोसा किया गया है, उनका मकसद गैर-कानूनी और बेकार है। इसी तरह, अपीलकर्ता / प्रतिवादी, जो कानूनी वारिस होने का दावा कर रहे हैं, उन्हें भी इससे कोई फ़ायदा उठाने का हक नहीं है, क्योंकि वे यह साबित करने में नाकाम रहे कि केस वाली प्रॉपर्टीज़ मृतक के अपने पैसों से हासिल की गई थीं।”

इस दलील को खारिज करते हुए कि यह केस सिर्फ़ वसीयत पर आधारित था। इसलिए बेनामी एक्ट के दायरे से बाहर था, कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि वसीयत वाले दस्तावेज़ को मूल लेन-देन के बारे में शुरुआती दलीलों से अलग करके नहीं देखा जा सकता। कोर्ट ने कहा कि कथित वसीयत का इस्तेमाल उन प्रॉपर्टीज़ पर मालिकाना हक (Beneficial Ownership) का दावा करने के एक तरीके के तौर पर किया जा रहा था, जो साफ़ तौर पर किसी और के नाम पर दर्ज थीं। वाद-पत्र को खारिज करने के फैसले को बरकरार रखते हुए कोर्ट ने बेनामी कानून के तहत संपत्ति को ज़ब्त करने का भी आदेश दिया।

कोर्ट ने आदेश दिया,

“इसलिए वाद-पत्र में बताई गई संपत्तियां अधिनियम की धारा 27 के तहत ज़ब्त किए जाने योग्य हैं। चूंकि धारा 45 और 65 के तहत लगाई गई रोक हाईकोर्ट या इस कोर्ट पर लागू नहीं होती, इसलिए जब एक सक्षम न्यायिक निर्णय द्वारा किसी लेन-देन को बेनामी घोषित कर दिया गया हो और वह निर्णय अंतिम रूप ले चुका हो, तो पक्षों को फिर से निर्णायक प्राधिकरण (Adjudicating Authority) के पास भेजना अनावश्यक है। ऐसी परिस्थितियों में उस घोषणा के परिणामस्वरूप संपत्ति को ज़ब्त किया जा सकता है।”

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को यह भी निर्देश दिया कि वह आठ हफ़्तों के भीतर एक प्रशासक नियुक्त करे और बेनामी अधिनियम के तहत वाद-पत्र में बताई गई संपत्तियों का कब्ज़ा ले ले; कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि न्यायिक रूप से यह तय हो चुका है कि वह लेन-देन बेनामी था।

कोर्ट ने आगे यह भी स्पष्ट किया कि चूंकि उस निर्णय को अंतिम रूप मिल चुका है जिसमें लेन-देन को बेनामी घोषित किया गया, इसलिए कोई भी कोर्ट भविष्य में उन संपत्तियों पर किए जाने वाले किसी भी ऐसे दावे पर विचार नहीं करेगा, जो उस बेनामी व्यवस्था से उत्पन्न हुआ हो या उस पर आधारित हो।

उपर्युक्त बातों को ध्यान में रखते हुए इस अपील का निपटारा किया गया।

Cause Title: MANJULA AND OTHERS VERSUS D.A. SRINIVAS

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