राज्य के अधिकारियों द्वारा अधिग्रहित वाहन से हुए हादसे के लिए निजी बीमा कंपनी ज़िम्मेदार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-03-24 05:09 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (23 मार्च) को यह फ़ैसला दिया कि जब किसी निजी वाहन को राज्य द्वारा चुनावों जैसे सार्वजनिक कार्यों के लिए अधिग्रहित किया जाता है तो दुर्घटनाओं की ज़िम्मेदारी अधिग्रहित करने वाले प्राधिकरण की होती है, न कि बीमा कंपनी की।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने कहा,

"...जहां किसी वाहन को सार्वजनिक कार्यों के लिए अधिग्रहित किया जाता है और अधिग्रहण की उस अवधि के दौरान कोई घटना घटित होती है तो उसकी ज़िम्मेदारी सही तौर पर अधिग्रहित करने वाले प्राधिकरण की होनी चाहिए, न कि उस बीमा कंपनी की जिसे वाहन के नियमित और स्वैच्छिक उपयोग के लिए मालिक ने नियुक्त किया था।"

खंडपीठ ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट, ग्वालियर पीठ का आदेश बरकरार रखा, जिसने MACT के उस फ़ैसले को पलट दिया था, जिसमें बीमा कंपनी पर ज़िम्मेदारी तय की गई थी। इसके बजाय, पीठ ने ग्वालियर के ज़िला मजिस्ट्रेट/चुनाव अधिकारी पर ज़िम्मेदारी तय की। यह फ़ैसला तब आया जब ग्राम पंचायत चुनाव ड्यूटी के लिए अधिग्रहित एक निजी स्कूल बस की टक्कर एक मोटरसाइकिल सवार से हो गई, जिसके परिणामस्वरूप उसकी मौत हो गई थी।

कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि जब राज्य प्राधिकरण द्वारा किसी निजी बस को अधिग्रहित किया जाता है तो "मालिक से उसकी कस्टडी और फ़ैसले लेने का अधिकार छिन जाता है और वाहन को सरकारी कार्यों के लिए राज्य के अधीन कर दिया जाता है।" इसलिए "उस नियंत्रण से उत्पन्न होने वाले कानूनी परिणामों को, निष्पक्षता के आधार पर, किसी निजी बीमा कंपनी पर वापस नहीं डाला जा सकता, जिसका अनुबंध पूरी तरह से एक अलग आधार पर आधारित था।"

इसकी पुष्टि में 'पूर्ण्य कला देवी बनाम असम राज्य (2014) 14 SCC 142' मामले का हवाला दिया गया। इसमें यह कहा गया कि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 2(3) के तहत 'मालिक' शब्द की परिभाषा कार्यात्मक है, न कि केवल औपचारिक। इसलिए जिस व्यक्ति के पास वाहन का कब्ज़ा और नियंत्रण होता है—जैसे कि अधिग्रहित करने वाला प्राधिकरण—वह ज़िम्मेदारी के उद्देश्यों के लिए "मालिक" माना जाएगा।

अदालत ने टिप्पणी की,

“इन परिस्थितियों में बीमाकर्ता पर दायित्व डालना, अनुबंध को उस जोखिम से आगे बढ़ाना होगा जिसे कवर करने पर सहमति बनी थी। बीमाकर्ता से ऐसे परिणामों के लिए जवाबदेही मांगना, जो बीमित व्यक्ति द्वारा न तो अधिकृत थे और न ही नियंत्रित, अनुचित होगा। बीमाकर्ता, बीमित व्यक्ति के सामान्य कार्यों के आधार पर जोखिम का आकलन और उसका बीमा करता है। जब राज्य हस्तक्षेप करता है, नियंत्रण अपने हाथ में लेता है और वाहन को अपने उद्देश्यों के लिए उपयोग करता है तो उस नियंत्रण के साथ-साथ वह उससे जुड़ी हुई जिम्मेदारी भी अपने ऊपर ले लेता है। इसके अलावा, जब जनहित में निजी संपत्ति को अधिग्रहित करने के लिए वैधानिक शक्ति का प्रयोग किया जाता है तो उस शक्ति के साथ यह दायित्व भी जुड़ा होता है कि ऐसे अनिवार्य उपयोग से उत्पन्न होने वाले परिणामों के लिए जवाब दिया जाए। इसके विपरीत कोई भी निर्णय देना, निजी पक्षों और उनके बीमाकर्ताओं पर ऐसे जोखिमों का बोझ डालना होगा जो पूरी तरह से सरकारी कार्रवाई से उत्पन्न हुए हैं।”

अदालत ने आगे स्पष्ट किया कि यूपी SRTC बनाम कुलसुम (2011) और यूपी SRTC बनाम नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (2021)—जिन पर अपीलकर्ता ने बीमाकर्ता पर दायित्व डालने के लिए भरोसा किया—वे इस मामले से अलग थे; क्योंकि उन मामलों में बसें राज्य परिवहन निगमों द्वारा स्वैच्छिक समझौतों के तहत चलाई जा रही थीं, जबकि प्रस्तुत मामला अनिवार्य अधिग्रहण से संबंधित था।

तदनुसार, अपील खारिज कर दी गई।

Cause Title: DISTRICT MAGISTRATE AND DISTRICT ELECTION OFFICER AND COLLECTOR, GWALIOR, M.P. VERSUS NATIONAL INSURANCE COMPANY LIMITED & ORS.

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