सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (7 सितंबर) को कहा कि कॉमन बायो-मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट फैसिलिटी (CBWTF) बनाने के मकसद से एनवायरनमेंटल क्लीयरेंस (EC) के लिए अर्ज़ी जमा करते समय ज़मीन का पहले से अलॉटमेंट या कानूनी कब्ज़ा होना ज़रूरी नहीं है।

कोर्ट ने कहा,

"EIA, 2006 के क्लॉज़ 6 में कहा गया कि संभावित साइट(साइटों) की पहचान के बाद फॉर्म 1 में अर्ज़ी दी जा सकती है। इसलिए फॉर्म 1 के तहत अर्ज़ी देने के लिए ज़मीन का अलॉटमेंट एक ज़रूरी शर्त नहीं मानी जा सकती।"

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) का वह फ़ैसला रद्द किया, जिसमें उत्तर प्रदेश के संभल ज़िले में प्रस्तावित CBWTF फैसिलिटी के लिए अपील करने वाली कंपनी को दी गई पर्यावरण मंज़ूरी रद्द की गई।

कोर्ट के सामने मुख्य मुद्दा यह था कि क्या CBWTF के लिए पर्यावरण मंज़ूरी चाहने वाले आवेदक को एनवायरनमेंटल इम्पैक्ट असेसमेंट (EIA) स्टडी शुरू करने के लिए 'टर्म्स ऑफ़ रेफरेंस' (ToR) जारी करने हेतु फॉर्म 1 की अर्ज़ी जमा करने से पहले ज़मीन हासिल करनी होगी या उसे ज़मीन अलॉट होनी चाहिए।

कोर्ट ने इसका जवाब 'नहीं' में दिया और समझाया कि पर्यावरण मंज़ूरी की प्रक्रिया में अलग-अलग चरण होते हैं और ज़मीन से जुड़ी ज़रूरत को हर चरण में एक जैसा नहीं माना जा सकता।

फॉर्म 1 के चरण में, जो स्क्रीनिंग का चरण है, आवेदक को केवल प्रस्तावित प्रोजेक्ट के लिए संभावित साइटों की पहचान करनी होती है। ज़मीन का असल अलॉटमेंट या कानूनी कब्ज़ा कोई ज़रूरी शर्त नहीं है।

हालांकि, बाद के मूल्यांकन (Appraisal) चरण में आवेदक को ज़मीन अधिग्रहण की स्थिति बताने वाला एक विश्वसनीय दस्तावेज़ पेश करना होगा। ऐसे दस्तावेज़ में ज़मीन मालिक की बेचने की इच्छा, प्रोविज़नल अलॉटमेंट या ज़मीन हासिल करने की दिशा में हुई प्रगति दिखाने वाले अन्य सबूत शामिल हो सकते हैं।

कोर्ट ने कहा कि फॉर्म 1 दाखिल करने से पहले या मूल्यांकन चरण में सेल डीड या लीज़ डीड के ज़रिए कानूनी कब्ज़ा होना ज़रूरी नहीं है।

कोर्ट ने कहा,

"EIA, 2006 के क्लॉज़ 6 और 07.10.2014 के ओ.एम. से यह साफ़ होता है कि 'फॉर्म 1' में आवेदन करने और मूल्यांकन (Appraisal) के चरण दोनों ही समय सेल डीड (sale deed) या लीज़ डीड (lease deed) वगैरह के ज़रिए कानूनी कब्ज़ा होना ज़रूरी नहीं है।"

इसके अलावा, कोर्ट ने इस मामले में 'कॉमन बायो-मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट एंड डिस्पोजल फैसिलिटीज़, 2016 (RG, 2016) के लिए संशोधित गाइडलाइंस' के अनिवार्य रूप से लागू होने के पहलू पर भी विचार किया, क्योंकि इसमें CBWTF के लिए ज़मीन के आकार की ज़रूरतें बताई गईं, जिसमें लगभग एक एकड़ की सामान्य ज़रूरत भी शामिल है।

चूंकि अपीलकर्ता ने 0.89 एकड़ के प्लॉट पर सुविधा स्थापित करने का प्रस्ताव दिया, जो RG 2016 के तहत एक एकड़ की ज़रूरत से कम है, इसलिए NGT ने पर्यावरण मंज़ूरी (EC) और स्थापना की सहमति (CTE) रद्द की।

NGT के नज़रिए से असहमति जताते हुए जस्टिस पारदीवाला द्वारा लिखे गए फ़ैसले में कहा गया कि हालांकि RG, 2016 का पालन करना अनिवार्य है, लेकिन गाइडलाइंस में ही उचित मामलों में खासकर ग्रामीण इलाकों में स्थित सुविधाओं के लिए एक एकड़ की ज़रूरत में छूट देने की व्यवस्था है।

कोर्ट ने कहा,

"RG, 2016 के क्लॉज़ 7 के अनुसार, CBWTF स्थापित करने के लिए तय एक एकड़ ज़मीन की ज़रूरत में दो पूर्व-शर्तों में से किसी एक के पूरा होने पर छूट दी जा सकती है: यानी ज़मीन या तो 25 लाख से ज़्यादा आबादी वाले नगरपालिका क्षेत्र में हो या ग्रामीण इलाके में। इसके अलावा, CPCB से सलाह लेना और अतिरिक्त नियंत्रण उपाय लागू करना अनिवार्य है। अपीलकर्ता का CBWTF नूरपुर गाँव में स्थित है। इसलिए यह ग्रामीण इलाके में है। छूट केवल CPCB से उचित सलाह-मशविरे और अतिरिक्त नियंत्रण उपाय लागू करने के बाद ही दी गई, जिसमें छोटी जगह में CBWTF की कामकाज की प्रभावशीलता को ध्यान में रखा गया। इसलिए छूट देने के फ़ैसले में कोई गलती नहीं निकाली जा सकती।"

कोर्ट ने कहा,

"...हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि NGT ने दूसरे EC और दूसरे CTE को रद्द करने वाला फ़ैसला सुनाकर बहुत बड़ी गलती की।"

नतीजतन, अपील मंज़ूर कर ली गई। कोर्ट ने निर्देश दिया कि रजिस्ट्री इस फ़ैसले की कॉपी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल, प्रिंसिपल बेंच, नई दिल्ली को भेजेगी। इसके बाद प्रिंसिपल बेंच इस फ़ैसले को ट्रिब्यूनल की सभी सर्किट बेंचों को भेजेगी।

Cause Title: M/S PUNAHCHAKRAN PRIVATE LIMITED VERSUS INDOTECH WASTE SOLUTION & ORS

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