वादी ज़रूरी जानकारी छिपाकर 'साफ़ हाथों' से कोर्ट नहीं आता, उसे 'विशिष्ट पालन' का अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-03-11 04:56 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (10 मार्च) को 'विशिष्ट पालन' (Specific Performance) के लिए दायर एक मुकदमा खारिज किया। कोर्ट ने कहा कि जो वादी ज़रूरी जानकारी छिपाकर 'साफ़ हाथों' (Unclean Hands) से कोर्ट नहीं आता, उसे 'विशिष्ट पालन' जैसी न्यायसंगत राहत पाने का अधिकार नहीं है।

कोर्ट ने कहा,

"विशिष्ट पालन के मुकदमे में पक्षकारों का आचरण बहुत मायने रखता है। इससे कोर्ट को सबूतों का मूल्यांकन करने में मदद मिलती है ताकि यह पता चल सके कि समझौते के समय पक्षकारों की नीयत (Bona Fides) कैसी थी। अगर कोर्ट के मन में ज़रा सा भी शक पैदा होता है कि वादी की नीयत साफ़ नहीं थी। उसने समझौते से जुड़ी ज़रूरी बातें—जिनका समझौते पर सीधा असर पड़ता है—समझौते में और कोर्ट से भी छिपाकर रखी हैं, तो उसे यह न्यायसंगत और विवेकाधीन राहत नहीं दी जा सकती।"

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच एक ऐसे मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें अपीलकर्ता-वादी ने 'बिक्री के समझौते' (Agreement to Sell) के विशिष्ट पालन की मांग की थी। हालांकि, उसने अपने और प्रतिवादी-अभियुक्त के बीच हुए एक अहम 'समझौता ज्ञापन' (MoU) को छिपाकर रखा था। यह MoU उसके इस दावे के बिल्कुल उलट था कि यह लेन-देन एक असली बिक्री थी।

प्रतिवादी-अभियुक्त ने दलील दी कि पक्षों के बीच हुआ MoU यह दिखाता है कि यह लेन-देन असल में अपीलकर्ता द्वारा दिए गए कर्ज़ के लिए 'ज़मानत' (security) मात्र था। इसलिए MoU में लिखी शर्तों को छिपाकर अपीलकर्ता 'बिक्री के समझौते' को लागू करवाने की मांग नहीं कर सकता।

प्रतिवादी की दलील में दम पाते हुए जस्टिस मिश्रा द्वारा लिखे गए फ़ैसले में हाई कोर्ट के उस निर्णय को सही ठहराया गया, जिसमें अपीलकर्ता-वादी को विशिष्ट राहत देने से मना कर दिया गया। हाईकोर्ट ने ऐसा इसलिए किया, क्योंकि वादी ने MoU की शर्तें छिपाकर रखी थीं। कोर्ट ने MoU को इस लेन-देन की असली प्रकृति का पता लगाने के लिए एक बहुत ही अहम दस्तावेज़ माना था।

कोर्ट ने कहा,

"जो वादी 'साफ़ हाथों' से कोर्ट नहीं आता—जैसा कि इस मौजूदा मामले में हुआ है, जहां वादी ने एक दस्तावेज़, यानी MoU (Exhibit B-2) को छिपाकर रखा; क्योंकि मुकदमे की अर्ज़ी (plaint) में इसका कहीं भी ज़िक्र नहीं था—यह मामला 'विशिष्ट पालन' की राहत देने से मना करने के लिए बिल्कुल सही था। हाईकोर्ट ने प्रतिवादी/अभियुक्त द्वारा दायर अपील सही ठहराते हुए, ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए फ़ैसले और आदेश रद्द करके बिल्कुल सही किया।"

नतीजतन, हाईकोर्ट के फ़ैसले में दखल देने का कोई आधार न पाते हुए अपील खारिज की।

Cause Title: MUDDAM RAJU YADAV VERSUS B. RAJA SHANKER (D) THROUGH LRS. & ORS.

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