Order XV Rule 5 CPC | किराया जमा करने में चूक जानबूझकर थी या नहीं, इसकी जांच किए बिना किरायेदार का बचाव खारिज नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश XV नियम 5 के तहत "सुनवाई की पहली तारीख" तय किए बिना और किरायेदार को उचित नोटिस मिला या नहीं और उसे सुनवाई का मौका दिया गया या नहीं, इन मुद्दों पर विचार किए बिना, शुरू में ही किरायेदार के बचाव को खारिज करना गलत है। ऐसा इसलिए ज़रूरी है ताकि यह जांचा जा सके कि किराये में चूक जानबूझकर की गई थी या अनजाने में।
जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने कहा,
"आदेश XV नियम 5 CPC के तहत बचाव को खारिज करने की शक्ति, भले ही अनिवार्य शब्दों में लिखी गई हो, लेकिन इसका इस्तेमाल बिना सोचे-समझे नहीं किया जाना चाहिए। कोर्ट को यह विचार करना चाहिए कि क्या नियमों का काफी हद तक पालन किया गया और क्या चूक जानबूझकर या अवज्ञापूर्ण थी... बचाव को खारिज करना एक गंभीर मामला है। ऐसा तब तक नहीं किया जाना चाहिए, जब तक कि किरायेदार की ओर से जानबूझकर चूक या अवज्ञापूर्ण आचरण का कोई स्पष्ट मामला न हो।"
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद दो हॉल से जुड़ी किरायेदारी को लेकर शुरू हुआ, जहां प्रतिवादी-किरायेदार "ज्ञान वैष्णव होटल" चला रहा था। मकान मालिकों के अनुसार, सितंबर 2020 में मासिक किराया बढ़ाकर 25,000 रुपये कर दिया गया। वहीं किरायेदार ने नवंबर 2020 से किराया देना बंद किया।
संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम की धारा 106 के तहत किरायेदारी खत्म करने का नोटिस जारी करने के बाद मकान मालिकों ने बेदखली और बकाया किराए की वसूली के लिए स्मॉल कॉजेज़ कोर्ट में मुकदमा दायर किया।
मुकदमे की सुनवाई के दौरान, मकान मालिकों ने आदेश XV नियम 5 CPC के तहत अर्जी दायर की, जिसमें किराया जमा न करने के आधार पर किरायेदार का बचाव खारिज करने की मांग की गई। ट्रायल कोर्ट ने 5 अगस्त, 2023 को इस अर्जी को स्वीकार कर लिया और किरायेदार का बचाव खारिज किया।
किरायेदार ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने पुनरीक्षण याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए किरायेदार को 25,000 रुपये के बजाय 1,500 रुपये प्रति माह की दर से किराया जमा करने का निर्देश दिया। साथ ही यह चेतावनी भी दी कि यदि निर्धारित समय के भीतर राशि जमा नहीं की गई तो किरायेदार का बचाव खारिज कर दिया जाएगा। इसके बाद किराएदार की चूक के बावजूद, हाईकोर्ट ने इस आधार पर समय की और मोहलत दे दी कि स्थानीय वकील विदेश चले गए।
इन घटनाक्रमों से व्यथित होकर मकान मालिक सुप्रीम कोर्ट चले गए।
फैसला
विवादित आदेशों को रद्द करते हुए जस्टिस वराले द्वारा लिखे गए फैसले में यह माना गया कि "सुनवाई की पहली तारीख", जिसे उस तारीख के रूप में परिभाषित किया गया जिस पर कोर्ट मुकदमे में विवाद पर अपना ध्यान केंद्रित करने का प्रस्ताव करता है, उसको सबसे पहले निर्धारित किया जाना चाहिए। इसमें स्पष्ट किया गया कि किराया न चुकाने के कारण बचाव पक्ष की दलीलों को खारिज करने की प्रार्थना पर केवल प्रक्रियात्मक अनुपालन के लिए तय की गई किसी भी पिछली तारीख पर विचार नहीं किया जा सकता। ऐसे निर्धारण से पहले किराएदार को नोटिस की उचित तामील भी होनी चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने सुनवाई की पहली तारीख निर्धारित किए बिना, और यह जांचे बिना कि किराएदार की ओर से चूक सद्भावपूर्ण थी या जानबूझकर की गई, शुरुआत में ही मकान मालिक की बचाव पक्ष को खारिज करने की दलील को स्वीकार करके गलती की थी।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
"...ट्रायल कोर्ट ने CPC के आदेश XV नियम 5 के तहत आवेदन स्वीकार किया और मुख्य रूप से निर्धारित समय के भीतर किराया जमा न करने के आधार पर प्रतिवादी के बचाव पक्ष को खारिज किया। हालांकि, रिकॉर्ड से ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ बुनियादी पहलुओं, जैसे कि 'सुनवाई की पहली तारीख' का निर्धारण और उचित तामील तथा अवसर का मुद्दा, न तो निर्णायक रूप से निर्धारित किए गए और न ही पर्याप्त रूप से जांचे गए।"
कोर्ट ने आगे कहा,
"ऐसी तारीख के स्पष्ट निर्धारण के अभाव में CPC के आदेश XV नियम 5 को लागू करने का मूल आधार ही अनिश्चित हो जाता है।"
इसके अलावा, कोर्ट ने हाईकोर्ट के दृष्टिकोण में भी त्रुटि पाई। कोर्ट ने माना कि यद्यपि हाईकोर्ट ने शुरू में एक शर्त-युक्त आदेश पारित किया, जिसमें निर्धारित अवधि के भीतर किराया जमा करने का निर्देश दिया गया, लेकिन बाद में उसने पिछली शर्त-युक्त निर्देश और किराएदार को बाद में दी गई रियायत के बीच उचित तालमेल बिठाए बिना ही समय की मोहलत दी।
परिणामस्वरूप, इस मामले को CPC के आदेश XV नियम 5 के पहलू पर नए सिरे से विचार करने के लिए ट्रायल कोर्ट को वापस भेज दिया गया।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि ट्रायल कोर्ट को निम्नलिखित कार्य अवश्य करने चाहिए:
1. कानून के अनुसार, मुकदमे की "सुनवाई की पहली तारीख" निर्धारित करे।
2. यह जांच करे कि क्या CPC के आदेश XV नियम 5 की आवश्यकताओं का विधिवत अनुपालन या पर्याप्त अनुपालन हुआ।
3. इस बात पर विचार करे कि क्या चूक (यदि कोई हो) जानबूझकर की गई या सद्भावपूर्ण है।
4. दोनों पक्षों को पर्याप्त अवसर प्रदान करने के पश्चात्, एक तर्कसंगत आदेश पारित करें।
Cause Title: DHARMENDRA KALRA & ORS. VERSUS KULVINDER SINGH BHATIA