Order VII Rule 11 CPC | यह देखने के लिए कि क्या कानूनी रोक को चालाकी भरी ड्राफ़्टिंग से छिपाया गया, वाद-पत्र को ध्यान से पढ़ा जाना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट
CPC के आदेश VII नियम 11 के दायरे पर महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट को वाद-पत्र की "ध्यान से और पूरी तरह" जांच करनी चाहिए ताकि यह देखा जा सके कि क्या किसी कानूनी रोक को चालाकी भरी ड्राफ़्टिंग के ज़रिए छिपाया गया।
कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर तथ्यों को जान-बूझकर छिपाया गया हो तो वाद-पत्र को खारिज किया जा सकता है।
कोर्ट ने कहा,
"ट्रायल कोर्ट को ऐसे बेतुके मुकदमों को रोकना चाहिए, जो कानून द्वारा वर्जित हैं। साथ ही ऐसे मामलों को भी, जहां कार्रवाई का कारण (Cause of Action) केवल एक भ्रम हो। इसके लिए उन्हें चालाकी भरी ड्राफ़्टिंग के पीछे छिपे सच को उजागर करना होगा और वाद-पत्र तथा उसके साथ लगे दस्तावेजों को ध्यान से और पूरी तरह पढ़ना होगा - बेहतर होगा कि यह काम मुकदमे के शुरुआती चरण में ही कर लिया जाए।"
इस मामले में कोर्ट ने दो आधारों पर वाद-पत्र खारिज किया - पहला, 'बेनामी लेनदेन निषेध अधिनियम' के तहत लगी रोक को छिपाने की कोशिश की गई, जिसके लिए मुकदमे को इस तरह से पेश किया गया जैसे वह किसी वसीयत पर आधारित हो। दूसरा, वादी ने यह तथ्य छिपाया था कि वह वसीयतकर्ता की हत्या का आरोपी है।
कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि अदालतों को कार्रवाई के असली कारण और चालाकी भरी ड्राफ़्टिंग के ज़रिए गढ़े गए झूठे कारण के बीच फर्क करना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि CPC के आदेश VII नियम 11 के तहत जांच करते समय वाद-पत्र के केवल रूप या भाषा पर नहीं, बल्कि उसके मूल तत्व (Substance) पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
"अगर चालाकी भरी ड्राफ़्टिंग के ज़रिए कोई मनगढ़ंत कारण खड़ा करके कानून के तहत लगी रोक को छिपाने की कोशिश की जाती है तो कोर्ट के लिए उस वाद-पत्र को खारिज करना अनिवार्य हो जाता है।"
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हालांकि तथ्यों से जुड़े विवादित सवालों का फैसला आमतौर पर मुकदमे के शुरुआती चरण में नहीं किया जा सकता, फिर भी अदालतों को यह जांचने का अधिकार है कि क्या वादी द्वारा किए गए दावे का मूल आधार कानूनी रूप से सही और मान्य है।
न्यायालय ने टिप्पणी की,
“एक बार जब वाद-पत्र (Plaint) संस्थापन के लिए प्रस्तुत किया जाता है तो इसे स्वीकार किए जाने से पहले यह ट्रायल कोर्ट का कर्तव्य है कि वह वाद-पत्र की सामग्री को सत्यापित करे और यह सुनिश्चित करे कि वाद-पत्र को स्वीकार करने से पहले सभी कानूनी आवश्यकताओं को पूरा किया गया। एक ट्रायल कोर्ट यांत्रिक रूप से वाद-पत्र को स्वीकार नहीं कर सकता और वाद को पंजीकृत नहीं कर सकता। वाद-पत्र की स्वीकृति एक यांत्रिक प्रक्रिया नहीं हो सकती, जिसके द्वारा रजिस्ट्री के नोट को न्यायालय द्वारा केवल अनुमोदित कर दिया जाए। यदि, वाद-पत्र की स्वीकृति के चरण पर ट्रायल कोर्ट वाद-पत्र को ध्यानपूर्वक पढ़ने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि वाद-पत्र अस्वीकृत किए जाने योग्य है तो वह वाद-पत्र को अस्वीकृत कर देगा। ट्रायल कोर्ट के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह प्रतिवादी के उपस्थित होने और वाद-पत्र की अस्वीकृति की मांग करने की प्रतीक्षा करे। एक बार जब न्यायालय यह पाता है कि वाद तुच्छ है, अधिकार-क्षेत्र से बाहर है, पूर्व-शर्तों का पालन किए बिना दायर किया गया, कार्रवाई का कोई वास्तविक कारण (Cause of Action) प्रकट करने में विफल रहता है, महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाता है, या कानून द्वारा वर्जित है लेकिन कार्रवाई का कारण होने का भ्रम पैदा करने के लिए चालाकी से तैयार किया गया है तो उसे वाद-पत्र को लागत (Costs) सहित अस्वीकृत कर देना चाहिए।”
Cause Title: MANJULA AND OTHERS VERSUS D.A. SRINIVAS