सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि यदि आवेदन में विलम्ब के बारे में पर्याप्त स्पष्टीकरण दिया गया तो सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश IX नियम 13 के तहत एकपक्षीय डिक्री को निरस्त करने के आवेदन के साथ विलम्ब क्षमा के लिए अलग से आवेदन दायर करना आवश्यक नहीं है।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की खंडपीठ इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय को चुनौती देने वाली अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसने प्रथम अपीलीय न्यायालय के उस निर्णय बरकरार रखा था, जिसमें अपीलकर्ता-प्रतिवादी द्वारा उसके विरुद्ध पारित एकपक्षीय डिक्री को बहाल करने के लिए दायर बहाली आवेदन को स्वीकार करने वाले ट्रायल कोर्ट के आदेश को पलट दिया गया था। प्रथम अपीलीय न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट के निर्णय को यह कहते हुए पलट दिया कि परिसीमा अधिनियम की धारा 5 के अनुसार एक अलग आवेदन आदेश IX नियम 13 के आवेदन के साथ दायर नहीं किया गया।

यह मामला सिविल मुकदमे की बहाली से संबंधित है, जिसमें धोखाधड़ी के आधार पर सेल डीड को अमान्य घोषित करते हुए एकपक्षीय डिक्री पारित की गई।

पुनर्स्थापना आवेदन एकपक्षीय डिक्री पारित होने के 5 (पांच) महीने बाद दायर किया गया। अपीलकर्ता-प्रतिवादी ने दावा किया कि वह अशिक्षित और बुजुर्ग व्यक्ति है, जो पूरी तरह से अपने पिछले वकील पर निर्भर था, जो उसे कार्यवाही के बारे में सूचित करने में विफल रहा।

प्रतिवादी-वादी ने तर्क दिया कि चूंकि आवेदन 30 दिनों की निर्धारित समय सीमा से परे दायर किया गया, इसलिए देरी माफी आवेदन की अनुपस्थिति में यह बनाए रखने योग्य नहीं होगा।

न्यायालय के विचार के लिए जो प्रश्न आया वह यह था कि क्या परिसीमा अधिनियम की धारा 5 के तहत देरी की माफी के लिए अलग आवेदन अनिवार्य था।

नकारात्मक उत्तर देते हुए जस्टिस नाथ द्वारा लिखित निर्णय ने कहा कि सीपीसी के आदेश IX नियम 13 में पर्याप्त कारण दिखाए जाने पर निर्धारित अवधि से परे एकपक्षीय डिक्री की बहाली की अनुमति दी गई।

न्यायालय ने कहा कि बहाली आवेदन में बहाली आवेदन में देरी के बारे में पर्याप्त रूप से बताया गया, अर्थात अपीलकर्ता को उसके पिछले वकील द्वारा एकपक्षीय डिक्री के बारे में जानकारी नहीं दी गई।

यह देखते हुए कि बहाली आवेदन में देरी माफी आवेदन के सभी तत्व शामिल हैं, जैसा कि भागमल और अन्य बनाम कुंवर लाल और अन्य (2010) में माना गया, इस प्रकार न्यायालय ने माना कि परिसीमा अधिनियम के तहत बहाली आवेदन दाखिल करने में हुई देरी को माफ करने के लिए कोई अलग आवेदन की आवश्यकता नहीं थी।

न्यायालय ने भागमल मामले में कहा,

“हमारे विचार में आदेश 9 नियम 13 आवेदन दाखिल करने के प्रश्न पर अपीलीय न्यायालय द्वारा गुण-दोष के आधार पर सही ढंग से विचार किया गया और अपीलीय न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचने में बिल्कुल सही था कि अपीलकर्ता प्रतिवादियों ने आदेश 9 नियम 13 सीपीसी के तहत आवेदन उस समय दाखिल करने में पूरी तरह से उचित थे, जब उन्होंने वास्तव में इसे दाखिल किया और आवेदन दाखिल करने में देरी को इस तथ्य के कारण भी पूरी तरह से समझाया गया कि उन्हें डिक्री और उनके खिलाफ एकपक्षीय कार्यवाही शुरू करने वाले आदेशों के बारे में कभी पता नहीं था। यदि ऐसा था तो न्यायालय ने वास्तव में देरी के कारणों पर भी विचार किया था। ऐसी परिस्थितियों में हाईकोर्ट को यह अति-तकनीकी दृष्टिकोण नहीं अपनाना चाहिए कि धारा 5 (परिसीमा अधिनियम) के तहत कोई अलग आवेदन दायर नहीं किया गया।”

न्यायालय ने कहा,

“आदेश 9 नियम 13 सीपीसी के तहत आवेदन में ही उस आवेदन को करने में देरी के लिए माफ़ी के लिए आवेदन के सभी तत्व मौजूद थे। प्रक्रिया आखिरकार न्याय की दासी है। उपर्युक्त मामलों से यह स्पष्ट है कि वर्तमान मामले में भी देरी के लिए माफ़ी के लिए अलग से आवेदन दायर करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। हाईकोर्ट ने अति-तकनीकी दृष्टिकोण अपनाकर और यह निष्कर्ष निकालकर गलती की कि कानून के अनिवार्य प्रावधान का उल्लंघन हुआ। इस तरह के दृष्टिकोण का समर्थन करने का मतलब प्रभावी रूप से न्यायिक प्रक्रिया के उद्देश्य की अनदेखी करना होगा। प्रक्रिया न्यायपूर्ण और निष्पक्ष परिणाम प्राप्त करने के रास्ते में नहीं आ सकती। वर्तमान मामले में अपीलकर्ता ने सद्भावनापूर्वक और लगन से काम किया। उसका आचरण कानून के किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं करता है।”

तदनुसार, अपील को स्वीकार कर लिया गया।

केस टाइटल: द्वारिका प्रसाद (डी) टीएचआर एलआरएस बनाम पृथ्वी राज सिंह

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