अगर घायल चश्मदीद की गवाही बहुत मज़बूत हो तो स्वतंत्र गवाह की जांच न होना केस के लिए घातक नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को हत्या के मामले में सज़ा को सही ठहराते हुए कहा कि अगर घायल चश्मदीद की अकेली गवाही भरोसेमंद, विश्वसनीय और एक जैसी हो तो किसी स्वतंत्र गवाह की जाँच न होना अभियोजन पक्ष के केस के लिए घातक साबित नहीं होगा।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने टिप्पणी की,
"...सिर्फ़ एक चश्मदीद की गवाही के आधार पर भी सज़ा देना जायज़ है। आख़िरकार, रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों को उनकी गुणवत्ता के आधार पर मापा जाना चाहिए, न कि उनकी संख्या के आधार पर।"
बेंच ने यह टिप्पणी करते हुए पिता-पुत्र की अपील खारिज की। इन दोनों को हत्या का अपराध करने के लिए भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 302 और 149 (धारा 120B के साथ पढ़ी जाने वाली) के तहत दोषी ठहराया गया और आजीवन कठोर कारावास की सज़ा सुनाई गई।
पटना हाईकोर्ट ने सज़ा को सही ठहराते हुए चार चश्मदीदों की गवाही को उनके बयानों में विसंगतियों का हवाला देते हुए खारिज किया था। हालांकि, उसने घायल चश्मदीद की गवाही को 'बेहद मज़बूत' पाया था।
हाईकोर्ट का फ़ैसला सही ठहराते हुए जस्टिस करोल द्वारा लिखे गए फ़ैसले में कहा गया कि स्वतंत्र गवाह की भरोसेमंद गवाही उपलब्ध न होने के बावजूद, घायल चश्मदीद की अकेली गवाही को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब वह बेहद मज़बूत पाई गई हो।
कोर्ट ने कहा,
"चूंकि PW-5 (गवाह नंबर 5) क्रॉस एग्जामिनेशन की कसौटी पर खरा उतरा है, घटना का निर्विवाद चश्मदीद है और घायल गवाह भी है, इसलिए उसकी गवाही को ज़्यादा महत्व दिया जाएगा। इस तरह यह पहलू भी अपील करने वाले - दोषियों के अपराध को साबित करने में गिना जाएगा।"
उपरोक्त बातों के आधार पर अपील खारिज की गई और सज़ा सही ठहराई गई।
Cause Title: ADALAT YADAV ETC. VERSUS THE STATE OF BIHAR