कोई सार्वभौमिक नियम नहीं कि रिक्तियां उन्हीं नियमों के अनुसार भरी जानी चाहिए, जो रिक्तियां उत्पन्न होने के समय मौजूद थे: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-06-04 05:26 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में यह फैसला दिया कि सरकारी कर्मचारियों के पास भर्ती नियमों के तहत पदोन्नति के लिए विचार किए जाने का कोई निहित अधिकार नहीं होता, भले ही वे नियम रिक्तियाँ उत्पन्न होने के समय मौजूद रहे हों। इसके बजाय, लागू नियम वे होते हैं जो उस तारीख को प्रभावी होते हैं, जब पदोन्नति प्रक्रिया पर वास्तव में विचार किया जाता है।

कोर्ट ने State of Odisha & Ors. v. Sreepati Ranjan Dash, 2026 LiveLaw (SC) 514 मामले में यह फैसला सुनाया था,

"एक कर्मचारी के पास पदोन्नति के लिए विचार किए जाने का अधिकार केवल उन वैधानिक नियमों के आधार पर होता है, जो उस तारीख को प्रभावी होते हैं, जब पदोन्नति पर वास्तविक विचार होता है, न कि पिछली तारीख से (retrospectively)।"

जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी की बेंच ने कलकत्ता हाईकोर्ट की पोर्ट ब्लेयर सर्किट बेंच का फैसला रद्द किया। हाईकोर्ट ने कुछ हेड कांस्टेबलों के इस दावे को सही ठहराया कि उन्हें पुराने भर्ती नियमों के तहत असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर (कार्यकारी) के पद पर पदोन्नति के लिए विचार किया जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने इस आधार पर फैसला दिया कि रिक्तियां उन्हीं नियमों के अनुसार भरी जानी चाहिए, जो उन रिक्तियों के उत्पन्न होने के समय प्रभावी थे। इस तरह प्रतिवादियों की तदर्थ (Ad Hoc) पदोन्नतियों को सुरक्षित रखा था।

हाईकोर्ट के दृष्टिकोण से असहमत होते हुए जस्टिस भट्टी द्वारा लिखे गए फैसले में यह टिप्पणी की गई कि चूंकि रिक्तियों या पदोन्नति वाले पदों को भरने के लिए विचार की तारीख को प्रभावी कानून ही लागू होता है, इसलिए 2016 में नए नियमों के लागू होने के साथ ही पुराने नियम निरस्त हो जाते हैं। इस प्रकार पदोन्नति वाले पदों को नए नियमों के अनुसार ही भरा जाना चाहिए।

प्रतिवादियों ने यह तर्क दिया कि चूंकि 2016 के भर्ती नियम रिक्तियां उत्पन्न होने के बाद और 2014 में उनकी तदर्थ पदोन्नतियाँ दिए जाने के बाद ही लागू हुए, इसलिए पदोन्नति प्रक्रिया उन्हीं नियमों द्वारा शासित होनी चाहिए जो उन रिक्तियों के उत्पन्न होने के समय प्रभावी थे।

इस तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की कि 2014 में दी गई पदोन्नतियां पूरी तरह से तदर्थ (Ad Hoc) थीं और स्पष्ट रूप से लंबित मुकदमे के परिणाम के अधीन थीं। ऐसी पदोन्नतियाँ कोई निहित अधिकार प्रदान नहीं करती थीं। यदि मुकदमा पदोन्नति पाने वालों के खिलाफ समाप्त होता तो उन्हें रद्द किया जा सकता था। नतीजतन, कोर्ट ने श्रीपति रंजन दास (उपर्युक्त) का हवाला देते हुए यह फैसला दिया कि एक बार 2016 के नियम लागू हो जाने के बाद प्रमोशन की प्रक्रिया उन्हीं नियमों के तहत होनी चाहिए, जो उस समय लागू कानूनी ढांचा थे जब इस मामले पर अंतिम रूप से विचार किया गया।

फैसले में श्रीपति रंजन दास मामले के सिद्धांतों को भी इस प्रकार उद्धृत किया गया:

1. नियुक्ति प्राधिकारी के रूप में काम करते हुए सरकार प्रमोशन के ज़रिए खाली पदों को न भरने का विशेषाधिकार रखती है, खासकर कैडर में बदलाव या पदों के पुनर्गठन के दौरान। ऐसे नीतिगत मामलों में, राज्य को नियुक्तियां करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

2. ऐसा कोई सार्वभौमिक नियम नहीं है कि खाली पदों को उन नियमों के अनुसार ही भरा जाना चाहिए, जो पद खाली होने की तारीख को मौजूद थे।

3. किसी कर्मचारी के पास प्रमोशन के लिए विचार किए जाने का अधिकार केवल उन वैधानिक नियमों के आधार पर होता है, जो प्रमोशन के लिए वास्तविक विचार-विमर्श की तारीख को लागू होते हैं, न कि पिछली तारीख से।

4. एक स्वचालित "प्रमोशन पद" और एक "चयन पद" के बीच अंतर होता है। "चयन पद" के लिए प्रमोशन केवल वरिष्ठता या ग्रेडेशन सूची में रैंकिंग के आधार पर स्वचालित नहीं होता है। योग्यता ही मुख्य मापदंड है। चूंकि यह एक चयन पद है, इसलिए सरकार "चयन पद" के लिए चयन की विधि को बदलने में सक्षम है।

5. जब नए नियम पुराने निर्देशों की जगह ले लेते हैं—"सिवाय उन कार्यों के जो किए जा चुके हैं या जिन्हें करने से चूक हुई है"—तो यह सुरक्षा केवल उन कार्यों पर लागू होती है जो पूरे हो चुके हैं। केवल DPC की बैठक बुलाने का अनुरोध करते हुए पत्र लिखना कोई पूरा हुआ कार्य नहीं माना जाता।

उपर्युक्त बातों को ध्यान में रखते हुए अपील स्वीकार की गई।

Cause Title: JAGDISH PRASAD AND OTHERS VERSUS P.M. MANOJ KUMAR AND OTHERS

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