'कौशल वाले खेलों पर सट्टेबाजी के लिए कोई संवैधानिक सुरक्षा नहीं': सुप्रीम कोर्ट ने दांव वाले ऑनलाइन गेम्स पर रोक वाले कानूनों को सही ठहराया
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में तमिलनाडु और कर्नाटक के उन कानूनों की संवैधानिक वैधता को सही ठहराया, जो खेलों पर ऑनलाइन सट्टेबाजी और दांव लगाने पर रोक लगाते हैं। कोर्ट ने कहा कि राज्य की विधायिकाएं सट्टेबाजी पर कानून बनाने में सक्षम हैं, भले ही वह खेल कौशल पर आधारित हो।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने फैसला सुनाया कि राज्यों के पास संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची II की प्रविष्टि 34 के तहत कौशल वाले खेलों पर सट्टेबाजी को विनियमित करने और उस पर रोक लगाने की शक्ति है। यह प्रविष्टि राज्यों को "सट्टेबाजी और जुए" पर कानून बनाने का अधिकार देती है। कोर्ट ने कहा कि कौशल वाले खेलों को जो संवैधानिक सुरक्षा मिली हुई है, वह उन खेलों पर की जाने वाली सट्टेबाजी या दांव लगाने पर लागू नहीं होती।
कोर्ट ने कहा,
"हालांकि यह सच हो सकता है कि कौशल वाले खेल 'जुए' की श्रेणी में न आते हों, लेकिन यह कहना सही नहीं है कि कौशल वाले खेलों पर 'सट्टेबाजी' करना भी राज्य की विधायिका के कानून बनाने के अधिकार क्षेत्र से बाहर होगा।"
कोर्ट ने यह भी कहा कि ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों के पास संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत सट्टेबाजी और जुए से जुड़ा व्यापार करने का कोई मौलिक अधिकार नहीं है।
कोर्ट ने कहा,
"जहां तक ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों के इस तर्क का सवाल है कि यह कानून अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है तो इस तर्क को शुरू में ही इस सीधे से कारण से खारिज किया जाता है कि एक बार जब कंपनियों द्वारा किए जा रहे व्यापार को 'सट्टेबाजी और जुए' का उद्यम मान लिया जाता है तो वह 'res extra commercium' (व्यापार से बाहर की वस्तु) बन जाता है और फिर अनुच्छेद 19 के लागू होने का सवाल ही नहीं उठता।"
कोर्ट ने तमिलनाडु और कर्नाटक राज्यों द्वारा दायर उन अपीलों को स्वीकार किया, जो मद्रास और कर्नाटक हाईकोर्ट के उन फैसलों के खिलाफ थीं, जिनमें ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म को निशाना बनाने वाले संशोधनों को रद्द कर दिया गया।
यह विवाद तमिलनाडु गेमिंग और पुलिस कानून (संशोधन) अधिनियम, 2021; तमिलनाडु ऑनलाइन जुआ निषेध और ऑनलाइन गेमिंग विनियमन अधिनियम, 2022/2023; और कर्नाटक पुलिस (संशोधन) अधिनियम, 2021 से उत्पन्न हुआ था।
तमिलनाडु और कर्नाटक ने कंप्यूटर मोबाइल एप्लिकेशन और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से की जाने वाली ऑनलाइन सट्टेबाजी और दांव लगाने की गतिविधियों से निपटने के लिए अपने कानूनों में संशोधन किया। इन कानूनों ने पहले दी गई उन कानूनी सुरक्षाओं को हटा दिया, जिनके तहत कौशल वाले खेलों पर दांव लगाने को छूट मिली हुई थी और ऑनलाइन सट्टेबाजी की गतिविधियों को दंडात्मक प्रावधानों के दायरे में ला दिया।
दोनों हाईकोर्ट ने यह माना था कि रमी और पोकर जैसे खेल कौशल वाले खेल हैं और उन्हें सातवीं अनुसूची की सूची II की प्रविष्टि 34 के तहत "सट्टेबाजी और जुआ" के दायरे में नहीं लाया जा सकता। परिणामस्वरूप, उन्होंने विवादित प्रावधानों को रद्द कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि दोनों हाईकोर्ट ने प्रविष्टि 34 की बहुत ही संकीर्ण व्याख्या अपनाई थी, जिससे दोनों राज्य सट्टेबाजी और जुए की गतिविधियों पर रोक लगाने में प्रभावी रूप से शक्तिहीन हो गए। कोर्ट ने विवादित फैसलों में अपनाए गए इस दृष्टिकोण को खारिज किया कि "सट्टेबाजी और जुआ" शब्द की व्याख्या केवल "जुआ पर सट्टेबाजी" के रूप में की जानी चाहिए।
कोर्ट ने कहा,
"विवादित फैसलों में यह निष्कर्ष कि 'सट्टेबाजी और जुआ' शब्द की व्याख्या 'जुआ पर सट्टेबाजी' के रूप में की जानी चाहिए, एक स्पष्ट संवैधानिक विचलन है; यह संविधान के साथ छेड़छाड़ करने या वास्तव में संवैधानिक पाठ को फिर से लिखने जैसा है, जिसका अधिकार कोर्ट को कानूनी रूप से प्राप्त नहीं है।"
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि संविधान राज्यों को सट्टेबाजी को विनियमित करने या उस पर रोक लगाने की शक्ति से केवल इसलिए वंचित नहीं करता, क्योंकि वह सट्टेबाजी किसी ऐसे खेल पर हो रही है जिसमें मुख्य रूप से कौशल की आवश्यकता होती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि कौशल वाले खेल अपने आप में जुआ नहीं माने जा सकते, फिर भी ऐसे खेलों पर सट्टेबाजी को स्वतः ही संवैधानिक सुरक्षा प्राप्त नहीं हो जाती।
कोर्ट ने कहा कि एक बार जब सट्टेबाजी और दांव लगाने का मामला सामने आता है तो मूल खेल की प्रकृति अप्रासंगिक हो जाती है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि सट्टेबाजी और जुआ, दोनों में ही किसी अनिश्चित घटना पर पैसा दांव पर लगाना शामिल होता है। ये दोनों ही लत तथा आर्थिक लाभ की इच्छा से जुड़े होते हैं। परिणामस्वरूप, राज्यों को लंबे समय से ऐसी गतिविधियों को विनियमित करने या उन पर रोक लगाने की अनुमति प्राप्त रही है।
कोर्ट ने इस तर्क को भी खारिज किया कि विवादित कानून स्पष्ट रूप से मनमाने या असंगत थे।
कोर्ट ने फैसला दिया कि सट्टेबाजी और जुए की गतिविधियों को संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत सुरक्षा नहीं मिलती है। कोर्ट ने कहा कि जहाँ एक ओर कौशल वाले खेल (games of skill) खुद अनुच्छेद 19 के तहत सुरक्षित हैं, वहीं ऐसे खेलों पर सट्टा लगाना या दाँव लगाना संवैधानिक सुरक्षा का हकदार नहीं है, जब तक कि विधायिका स्पष्ट रूप से कोई अपवाद न बना दे।
कोर्ट ने माना कि अनुच्छेद 19 के तहत सुरक्षा न होने पर ऐसी गतिविधियों पर पूरी तरह से रोक लगाना 'आनुपातिकता के सिद्धांत' (test of proportionality) पर खरा उतरेगा।
कोर्ट ने कहा,
"कौशल वाले खेलों को अनुच्छेद 19 के तहत दी गई संवैधानिक गारंटी से सुरक्षा मिलेगी, लेकिन किसी भी खेल पर सट्टा लगाना या दांव लगाना—चाहे वह कौशल वाला खेल ही क्यों न हो—ऐसी किसी भी सुरक्षा का हकदार नहीं होगा, जब तक कि विधायिका कौशल वाले खेलों पर सट्टेबाजी के पक्ष में कोई अपवाद न बना दे।"
एंट्री 34 के अलावा, कोर्ट ने कहा कि राज्य सूची II की एंट्री 1 (जो सार्वजनिक व्यवस्था से संबंधित है) से भी विधायी समर्थन ले सकते हैं। कोर्ट ने टिप्पणी की कि डिजिटल युग में ऑनलाइन सट्टेबाजी और जुए का प्रभाव केवल व्यक्तिगत प्रतिभागियों तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि यह व्यापक सामाजिक हितों को भी प्रभावित कर सकता है। इस प्रकार, इसमें राज्य के हस्तक्षेप को उचित ठहराया जा सकता है।
तमिलनाडु राज्य ने जस्टिस के. चंद्रू समिति की रिपोर्ट पर भरोसा किया, जिसमें ऑनलाइन गेमिंग से जुड़ी सट्टेबाजी से होने वाले नुकसान के संबंध में अनुभवजन्य निष्कर्ष (Empirical Findings) शामिल थे। कोर्ट ने माना कि विवादित कानून को अनुभवजन्य सामग्री का समर्थन प्राप्त था।
कोर्ट ने फैसला दिया कि यदि कौशल वाले खेलों पर सट्टेबाजी समाज और जन कल्याण के लिए गंभीर खतरा पैदा करने लगती है तो राज्यों के पास ऐसी गतिविधियों को विनियमित करने या उन पर रोक लगाने की शक्ति मौजूद है। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि राज्यों ने ऑनलाइन गेमिंग की लत, आर्थिक संकट, आत्महत्याओं और ऑनलाइन सट्टेबाजी व जुए से उत्पन्न होने वाले अन्य सामाजिक नुकसानों से संबंधित सामग्री पर भरोसा किया था।
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यह कानून उस समस्या (mischief) से सीधा संबंध रखता है, जिसे हल करने का प्रयास किया जा रहा था; अतः, राज्यों के पास इन कानूनों को बनाने के लिए पर्याप्त विधायी आधार मौजूद था।
इसलिए कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट और कर्नाटक हाईकोर्ट के उन फैसलों को पलट दिया, जिन्होंने विवादित प्रावधानों को रद्द कर दिया था और राज्य के अधिकारियों को ऑनलाइन गेमिंग व्यवसायों में हस्तक्षेप करने से रोक दिया था।
Case Title – State of Tamil Nadu & Ors. v. Junglee Games India Pvt. Ltd. & Ors. and connected cases