NI Act 2008 को चुनौती पर सुप्रीम कोर्ट का नोटिस, केंद्र से मांगा जवाब

Update: 2026-04-21 12:25 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) अधिनियम, 2008 की वैधता को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि यह कानून मनमाना है, संसद की विधायी क्षमता से परे है और राज्यों के अधिकारों का अतिक्रमण करता है।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ दवे की दलीलें सुनने के बाद यह आदेश पारित किया। केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी पेश हुईं।

याचिका में उठाए गए मुद्दे

याचिकाकर्ता ने दलील दी कि 'पुलिस' राज्य सूची का विषय है और संसद को किसी एजेंसी को पूर्ण पुलिस शक्तियां देने का अधिकार नहीं है। याचिका में विशेष रूप से एनआईए अधिनियम की धारा 3 और 6(5) का हवाला देते हुए कहा गया कि केंद्र सरकार को स्वयं संज्ञान लेकर जांच एनआईए को सौंपने का अधिकार है, जिससे राज्य पुलिस की शक्तियां समाप्त हो जाती हैं।

अदालत में दलीलें

सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ दवे ने तर्क दिया कि एनआईए को “पुलिस बल” के रूप में कार्य करने की शक्ति देना असंवैधानिक है और यह संघीय ढांचे के विपरीत है। उन्होंने यह भी कहा कि अन्य केंद्रीय एजेंसियों, जैसे प्रवर्तन निदेशालय, को पुलिस का दर्जा नहीं दिया गया है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह याचिका केरल के एक वकील द्वारा दायर की गई है, जिन पर पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया से जुड़े मामलों में कार्रवाई हुई थी। याचिकाकर्ता का कहना है कि एक मामले में राज्य पुलिस पहले ही जांच पूरी कर चुकी थी, इसके बावजूद एनआईए ने उसी मामले में दोबारा जांच शुरू कर दी।

संवैधानिक चुनौती

याचिका में कहा गया है कि एनआईए अधिनियम—

अनुच्छेद 14 के तहत मनमाना है

अनुच्छेद 20 और 21 का उल्लंघन करता है

संघीय ढांचे के खिलाफ है

संसद की विधायी सीमा से बाहर है

अन्य पहलू

याचिकाकर्ता ने वैकल्पिक रूप से यह भी मांग की है कि केंद्र सरकार को एनआईए की शक्तियों के उपयोग के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश बनाने का निर्देश दिया जाए।

निष्कर्ष

मामला केंद्र और राज्यों के अधिकारों के संतुलन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दा उठाता है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस बात को स्पष्ट करेगा कि जांच एजेंसियों की शक्तियों की सीमा क्या होनी चाहिए।

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