NEET-PG 2025 कट-ऑफ में भारी कमी पर सुप्रीम कोर्ट चिंतित, गुणवत्ता पर असर की करेगा जांच
सुप्रीम कोर्ट ने आज कहा कि वह यह जांच करेगा कि NEET-PG 2025-26 के लिए क्वालिफाइंग पर्सेंटाइल में भारी कटौती से स्नातकोत्तर (पोस्टग्रेजुएट) चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है या नहीं। जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ इस कट-ऑफ में कमी को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।
केंद्र की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि यह निर्णय खाली सीटों को ध्यान में रखते हुए लिया गया था। उन्होंने तर्क दिया कि NEET-PG न्यूनतम चिकित्सकीय योग्यता प्रमाणित करने के लिए नहीं, बल्कि सीमित सीटों के बीच उम्मीदवारों की तुलना कर चयन करने के लिए आयोजित किया जाता है, क्योंकि सभी अभ्यर्थी पहले से MBBS डिग्रीधारी डॉक्टर हैं।
याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने फीस असमानता का मुद्दा उठाया। उन्होंने बताया कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों में फीस ₹9,000 से ₹27,000 तक होती है, जबकि निजी कॉलेजों में ₹95 लाख से ₹1.5 करोड़ तक पहुंच जाती है। उनके अनुसार, 50वें पर्सेंटाइल तक लगभग 1.3 लाख छात्र उपलब्ध होने के बावजूद अत्यधिक फीस के कारण वे निजी कॉलेजों में प्रवेश नहीं ले पाते। उन्होंने निजी कॉलेजों की फीस पर सीमा तय करने की मांग की।
इस पर भाटी ने कहा कि राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) ने फीस निर्धारण के नियम बनाए हैं, जिनके अनुसार निजी कॉलेजों की फीस राज्य के सरकारी कॉलेज की फीस से 50% से अधिक नहीं हो सकती। इस पर याचिकाकर्ताओं ने कहा कि यदि ऐसा है तो निजी कॉलेज नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं।
जस्टिस नरसिम्हा ने कहा कि भले ही NEET-PG MBBS में प्रवेश जैसा नहीं है और सभी उम्मीदवार पहले से डॉक्टर हैं, फिर भी कट-ऑफ में इतनी बड़ी कमी के प्रभाव पर विचार करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि अदालत का मुख्य सरोकार शिक्षा की गुणवत्ता है और सरकार को यह संतुष्ट करना होगा कि कट-ऑफ को लगभग शून्य तक घटाने से गुणवत्ता प्रभावित नहीं होगी।
अदालत ने मामले को आंशिक रूप से सुना हुआ मानते हुए आगे की सुनवाई 24 मार्च के लिए तय की है।
पृष्ठभूमि
यह विवाद 13 जनवरी 2026 को नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन्स इन मेडिकल साइंसेज (NBEMS) द्वारा जारी नोटिस से उत्पन्न हुआ, जिसमें NEET-PG 2025-26 के तीसरे काउंसलिंग राउंड के लिए न्यूनतम क्वालिफाइंग पर्सेंटाइल में भारी कमी कर दी गई।
नोटिस के अनुसार —
सामान्य/EWS वर्ग के लिए कट-ऑफ 50वें पर्सेंटाइल (800 में से 276 अंक) से घटाकर 7वां पर्सेंटाइल (103 अंक) कर दिया गया।
सामान्य PwBD वर्ग के लिए 45वें से घटाकर 5वां पर्सेंटाइल किया गया।
SC/ST/OBC तथा PwBD उम्मीदवारों के लिए 40वें पर्सेंटाइल से घटाकर 0वां पर्सेंटाइल (माइनस 40 अंक) कर दिया गया।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि शून्य या नकारात्मक अंक तक कट-ऑफ घटाना मनमाना है और संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करता है। उनका तर्क है कि इससे पोस्टग्रेजुएट स्तर पर चिकित्सा शिक्षा के मानक कमजोर होंगे, जो मरीजों की सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकता है।
6 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने NBEMS से इस कटौती के कारणों पर हलफनामा दाखिल करने को कहा था। उस समय अदालत ने कहा था कि यह मामला दो परस्पर विरोधी पहलुओं से जुड़ा है—एक तरफ मानकों में गिरावट की आशंका और दूसरी तरफ सीटों का खाली रह जाना।
केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में कहा है कि NEET-PG न्यूनतम योग्यता का परीक्षण नहीं है, क्योंकि MBBS डिग्री ही इसका प्रमाण है। सभी उम्मीदवार लाइसेंस प्राप्त डॉक्टर हैं और पोस्टग्रेजुएट प्रशिक्षण तीन वर्ष का संरचित कार्यक्रम है, जिसमें अंतिम दक्षता का आकलन MD/MS की अंतिम परीक्षा में किया जाता है, जहां सिद्धांत और प्रायोगिक दोनों में कम से कम 50% अंक अनिवार्य हैं।
NBEMS ने अपने अलग हलफनामे में कहा कि कट-ऑफ घटाने के निर्णय में उसकी कोई भूमिका नहीं थी; उसका काम केवल परीक्षा आयोजित कर परिणाम काउंसलिंग प्राधिकरण को सौंपना है।