Motor Accident Claim | सिर्फ इसलिए सैलरी से कटौती नहीं की जा सकती कि मृतक रिटायरमेंट के करीब था: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-04-08 12:01 GMT

मोटर दुर्घटना मुआवज़ा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में मृतक की सैलरी से 50 प्रतिशत की कटौती को गलत ठहराया। यह कटौती इस आधार पर की गई कि मृतक की नौकरी के सिर्फ 6 महीने बचे थे।

जस्टिस राजेश बिंदल और विजय बिश्नोई की बेंच ने दावेदारों (मृतक के परिवार वालों) को दिए जाने वाले मुआवज़े की रकम बढ़ा दी। बेंच ने कहा कि हाईकोर्ट और मोटर दुर्घटना दावा ट्रिब्यूनल ने मुआवज़े की रकम तय करते समय मृतक की सैलरी से 50% की कटौती करके गलती की थी।

बेंच ने कहा,

"हमारे सामने जो मामला है, उसमें ट्रिब्यूनल और हाईकोर्ट दोनों ने ही मृतक की सैलरी से 50% की कटौती की थी। इसका आधार यह था कि मृतक की नौकरी के सिर्फ 6 महीने बचे थे। हमारी राय में ट्रायल कोर्ट ने ऐसा बेतुका नतीजा निकालकर गलती की।"

'सरला वर्मा बनाम दिल्ली परिवहन निगम' मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने दोहराया कि मुआवज़े की रकम तय करते समय 'मल्टीप्लिकैंड' (गुणांक) मृतक की "सालाना" आय के आधार पर तय किया जाएगा।

कोर्ट ने आगे कहा,

"...कोई भी कटौती जिसका दुर्घटना से कोई लेना-देना न हो, कानूनन गलत है। इसके अलावा, सरला वर्मा मामले (ऊपर बताया गया) में तय कानून के मुताबिक, मल्टीप्लिकैंड हमेशा मृतक की "सालाना" आय के आधार पर तय किया जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि मोटर दुर्घटना मुआवज़ा मामलों की गणना में एकरूपता और निरंतरता बनी रहे।"

यह मामला 59 साल के एक व्यक्ति से जुड़ा था, जो रेलवे में एक स्थायी कर्मचारी के तौर पर काम करता था। साल 2013 में वह अपनी साइकिल से कहीं जा रहा था। तभी पीछे से एक बाइक ने उसे टक्कर मार दी। बाइक चलाने वाला बहुत तेज़ी से और लापरवाही से गाड़ी चला रहा था। इस दुर्घटना के कारण उस व्यक्ति को चोटें आईं और बाद में उसकी मौत हो गई।

उस व्यक्ति की पत्नी और बच्चों ने MACT (मोटर दुर्घटना दावा ट्रिब्यूनल) में मुआवज़े के लिए अर्जी दी। उन्होंने 36,16,264 रुपये के मुआवज़े की मांग की। उन्होंने दावा किया कि मृतक हर महीने 25,507 रुपये कमाता था। MACT ने यह तय किया कि मृतक की सैलरी 25,415 रुपये थी और फिर उसमें से यह देखते हुए 50% की कटौती की कि मृतक की नौकरी के सिर्फ़ 6 महीने बचे थे। इस संबंध में, कर्नाटक स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन बनाम श्री नरसुबाई मामले में हाईकोर्ट के फ़ैसले पर भरोसा किया गया।

इसके अलावा, MACT ने मृतक के निजी खर्चों के मद में 1/3 राशि की कटौती की। इस तरह मृतक की शुद्ध आय 8,472 रुपये प्रति माह मानी गई। आखिरकार, ट्रिब्यूनल ने कुल 11,37,466 रुपये का मुआवज़ा दिया।

मुआवज़े की राशि बढ़वाने के लिए, अपीलकर्ता-दावेदारों ने हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। उन्होंने अन्य बातों के अलावा, सैलरी के हिस्से और भविष्य की संभावनाओं के मद में दिए गए मुआवज़े पर आपत्ति जताई। जहां एक ओर हाई कोर्ट ने मृतक की सैलरी में से 50% की कटौती को सही ठहराया, वहीं उसने अन्य मदों, जैसे कि जीवनसाथी के साथ की क्षति (loss of consortium), संपत्ति आदि के तहत मुआवज़ा दिया। इस तरह, मुआवज़े की कुल राशि 14,05,942 रुपये हो गई।

मुआवज़े की राशि बढ़वाने के लिए अपीलकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। सरला वर्मा मामले पर भरोसा करते हुए उन्होंने दलील दी कि रिटायरमेंट से पहले और रिटायरमेंट के बाद की अवधियों के लिए आय को "दो हिस्सों में नहीं बांटा" जा सकता। बल्कि, अंतिम बार मिली मासिक सैलरी के आधार पर वार्षिक आय को ही आधार बनाया जाना चाहिए। भविष्य की संभावनाओं के संबंध में उन्होंने दावा किया कि नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम प्रणय सेठी मामले में दिए गए फ़ैसले के अनुसार, इस मद में 10% के बजाय 15% की वृद्धि की जानी चाहिए थी।

रिकॉर्ड की जांच करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने यह पाया कि हाईकोर्ट द्वारा बढ़ाई गई मुआवज़े की राशि काफ़ी कम थी। सैलरी में से 50% की कटौती रद्द करते हुए और भविष्य की संभावनाओं के मद में वृद्धि को 10% से बढ़ाकर 15% करते हुए (प्रणय सेठी मामले के फ़ैसले के अनुसार), मुआवज़े की राशि को बढ़ाकर 23,51,362 रुपये कर दिया गया। चूंकि अब मुआवज़े की गणना वार्षिक आय के आधार पर की गई, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने 6 महीने की कमाई के नुकसान के मद में दी गई अतिरिक्त राशि को हटा दिया।

सरला वर्मा के मामले का ज़िक्र करते हुए अदालत ने कहा,

"यह तथ्य कि मृतक की सेवा के केवल छह महीने ही शेष थे, इस बात पर कोई संदेह पैदा नहीं करता कि यदि दुर्घटना न हुई होती तो मृतक सेवा में होता और अपनी मृत्यु से पहले प्राप्त अंतिम आय के अनुरूप ही कमा रहा होता। इसलिए मृतक की वार्षिक आय की गणना उसकी अंतिम मासिक वेतन के आधार पर की जाएगी।"

Case Title: SUSHILA & ORS. VERSUS SUDHAKAR & ANR., SLP (CIVIL) NO. 21717 OF 2025

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