Motor Accident Claim | केस पार्टी बनाई गई बीमा कंपनी सभी आधार उठा सकती है और मुआवज़े की रकम को चुनौती दे सकती है: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-04-09 06:10 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक बीमा कंपनी की उस अपील को मंज़ूरी दी, जो बॉम्बे हाईकोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ थी। हाईकोर्ट ने बीमा कंपनी को मोटर दुर्घटना मुआवज़े की रकम के बारे में अपनी दलीलें रखने से रोक दिया था।

कोर्ट ने कहा कि जब किसी मोटर दुर्घटना मुआवज़े के केस में बीमा कंपनी को एक पार्टी-प्रतिवादी (Respondent) के तौर पर शामिल किया जाता है तो उसे सभी उपलब्ध आधारों पर दावे को चुनौती देने का अधिकार होता है। यानी, उसे सिर्फ़ मोटर वाहन अधिनियम की धारा 149(2) में बताए गए आधारों (जैसे, पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन, ज़रूरी तथ्यों को छिपाना, वगैरह) तक ही सीमित रहने की कोई पाबंदी नहीं है।

जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने कहा,

"जब बीमा कंपनी को मुआवज़े की याचिका में प्रतिवादी के तौर पर शामिल किया जाता है तो उसे 1988 के अधिनियम की धारा 149(2) के तहत उपलब्ध आधारों तक सीमित हुए बिना सभी उपलब्ध आधारों पर दावे को चुनौती देने का अधिकार होता है।"

मोटर वाहन अधिनियम की धारा 149(2) के मुताबिक, बीमा कंपनी सिर्फ़ पॉलिसी की शर्तों के उल्लंघन का आधार ही उठा सकती है। हालांकि, अगर उसे प्रतिवादी के तौर पर शामिल किया जाता है तो वह सभी आधार उठा सकती है, जिसमें लापरवाही के साथ-साथ मुआवज़े की रकम पर भी विवाद शामिल है।

यह मामला 54 साल के एक व्यक्ति से जुड़ा था, जिसे सड़क पर चलते समय एक तेज़ रफ़्तार कार ने टक्कर मार दी थी। इस दुर्घटना के कारण उस व्यक्ति की मौके पर ही मौत हो गई। बाद में उसकी पत्नी और बच्चों ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) में बीमा कंपनी कार के ड्राइवर और कार के मालिक के ख़िलाफ़ मुआवज़े की याचिका दायर की।

साल 2015 में MACT ने उनके दावे को मंज़ूरी दी और उन्हें 52,33,440 रुपये का मुआवज़ा, साथ ही 9% सालाना की दर से साधारण ब्याज देने का आदेश दिया। इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ बीमा कंपनी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की, लेकिन उसे यह कहते हुए ख़ारिज कर दिया गया कि यह अपील सुनवाई के लायक नहीं है।

सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने यह फ़ैसला दिया कि हाईकोर्ट ने बीमा कंपनी को मुआवज़े की रकम के बारे में कोर्ट के सामने अपनी बात रखने की अनुमति न देकर ग़लती की थी।

इसमें 'यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम शीला दत्ता' मामले में दिए गए फ़ैसले का ज़िक्र किया गया, जिसमें यह टिप्पणी की गई:

"इसलिए जहां बीमाकर्ता (Insurer) एक प्रतिवादी पक्ष है—चाहे उसे ट्रिब्यूनल द्वारा धारा 170 के तहत एक पक्ष के रूप में शामिल किया गया हो, या दावा याचिका में दावाकर्ताओं द्वारा स्वेच्छा से एक प्रतिवादी पक्ष के रूप में शामिल किया गया हो—तो उसे सभी आधारों को उठाते हुए मामले का विरोध करने का अधिकार होगा। वह अधिनियम की धारा 149(2) के तहत उपलब्ध आधारों तक ही सीमित नहीं रहेगा। बीमाकर्ता को एक पक्ष के रूप में शामिल किए बिना भ, मालिक और चालक के विरुद्ध दावा याचिका सुनवाई योग्य है।"

अंततः, न्यायालय ने मुआवज़े की राशि (Quantum of Compensation) से जुड़े मुद्दे पर निर्णय लेने के लिए मामले को वापस हाईकोर्ट के पास भेज दिया। साथ ही यह अनुरोध किया कि इस मामले की सुनवाई में तेज़ी लाई जाए।

Case Title: NATIONAL INSURANCE COMPANY LTD. v. GAURI GURUDAS GAONKAR, SLP (C) No. 11439 of 2023

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