मंदिर पर सिर्फ़ निगरानी की भूमिका निभाने और पुजारियों की नियुक्ति करने से ही मालिकाना हक़ नहीं मिल जाता: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-05-06 09:29 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि सिर्फ़ इस बात से कि किसी समूह ने मंदिर पर प्रबंधकीय या निगरानी का नियंत्रण रखा है, उसे अपने-आप मंदिर का मालिकाना हक़ नहीं मिल जाता।

कोर्ट ने कहा,

"सिर्फ़ इस बात से कि किसी संस्था ने मंदिर पर कुछ निगरानी या प्रबंधकीय काम किए, या 'पुजारियों' की नियुक्ति में हिस्सा लिया है, उसे अपने-आप मालिकाना हक़ नहीं मिल जाता।"

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने राजस्थान हाईकोर्ट का फ़ैसला रद्द किया। हाईकोर्ट ने राजस्थान के कोटा में स्थित मंदिर 'मूर्ति स्वरूप श्री गोवर्धन नाथ जी' पर प्रतिवादियों के मालिकाना हक़ को सही ठहराया था, जबकि वे मंदिर पर अपने मालिकाना हक़ को साबित करने वाला कोई भी दस्तावेज़ पेश नहीं कर पाए।

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस फ़ैसले को सही ठहराया था, जिसमें वादी-प्रतिवादी के पक्ष में मालिकाना हक़ घोषित किया गया। इसका मुख्य आधार यह था कि उन्होंने मंदिर पर प्रबंधकीय और निगरानी का नियंत्रण रखा, जिसमें पुजारियों की नियुक्ति भी शामिल थी। ऐसा करते हुए कोर्ट ने प्रतिवादी की अपील को खारिज कर दिया और यह माना कि प्रतिवादी के मालिकाना हक़ साबित न कर पाने का फ़ायदा वादी-प्रतिवादी को मिला।

हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए अपीलकर्ता—जिसे एक लंबी परंपरा के तहत मंदिर का देखरेख करने वाला (Caretaker) नियुक्त किया गया और जो संपत्ति पर मालिकाना हक़ का दावा कर रहा था—ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। उसने यह दलील दी कि प्रतिवादी के पक्ष में दिया गया फ़ैसला कानूनी तौर पर सही नहीं है। यह तर्क दिया गया कि प्रतिवादी मंदिर पर अपना मालिकाना हक़ साबित करने में नाकाम रहा है। अपीलकर्ता का अपना मालिकाना हक़ साबित न कर पाना, अपने-आप में वादी-प्रतिवादी के फ़ायदे के लिए नहीं हो सकता, खासकर तब जब उनके पास अपने स्वतंत्र मालिकाना हक़ का कोई सबूत न हो।

अपील स्वीकार करते हुए जस्टिस नाथ द्वारा लिखे गए फ़ैसले में यह टिप्पणी की गई कि ट्रायल कोर्ट ने कानून के मामले में ग़लती की। उसने अपना ध्यान मालिकाना हक़ साबित करने की ज़रूरत से हटाकर प्रतिवादी के मामले में कथित कमियों पर केंद्रित कर दिया था। कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि मंदिर पर अपने मालिकाना हक़ को साबित करने वाले कोई भी दस्तावेज़ पेश न कर पाने की स्थिति में वादी-प्रतिवादी सिर्फ़ मंदिर के प्रशासन पर अपनी निगरानी और नियंत्रण के आधार पर मालिकाना हक़ का दावा नहीं कर सकते।

अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा,

“इस तरह का नज़रिया, मालिकाना हक के मुकदमों के निपटारे से जुड़े तयशुदा सिद्धांतों के खिलाफ है और इसे सही नहीं ठहराया जा सकता।”

अदालत ने यह भी बताया कि अपील करने वाले-प्रतिवादी का मंदिर पर अपना मालिकाना हक साबित न कर पाना, जवाब देने वाले-वादी के फायदे में नहीं जाएगा। खासकर तब, जब उन्होंने मंदिर पर अपने मालिकाना हक को साबित करने के लिए कोई दस्तावेज़ पेश नहीं किया था।

अदालत ने कहा,

“रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री की बारीकी से जांच करने पर यह पता चलता है कि जवाब देने वाले-वादी मुकदमे वाली संपत्ति पर अपने मालिकाना हक को साबित करने वाला कोई भी दस्तावेज़ पेश करने में नाकाम रहे हैं। न तो कोई समर्पण-पत्र है, न ही कोई दान-पत्र, और न ही कोई ऐसा कानूनी तौर पर मान्य सबूत है जिससे यह साबित हो सके कि यह संपत्ति जवाब देने वाली संस्था (सोसायटी) के अधिकार में थी।”

उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए अपील स्वीकार की गई।

Cause Title: KISHAN CHAND (DEAD) THROUGH LRS. VERSUS GAUTAM GAUR HITKARAK SABHA, KOTA & ORS.

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