भर्ती नियमों के तहत ज़रूरी योग्यता न होने पर परीक्षा के नंबर काम नहीं आते: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लिखित परीक्षा में मिले नंबर भर्ती नियमों के तहत तय ज़रूरी योग्यता की कमी को पूरा नहीं कर सकते। कोर्ट ने दोहराया कि तुलनात्मक मेरिट पर तभी विचार किया जा सकता है, जब उम्मीदवार पहले तय योग्यता शर्तों को पूरा करते हों।
कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी एजुकेशनल बोर्ड द्वारा किसी एजुकेशनल क्वालिफिकेशन (शैक्षिक योग्यता) को मान्यता देने का मतलब यह नहीं है कि वह भर्ती नियमों में बताई गई खास योग्यता के बराबर हो।
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने गोवा सरकार में वोकेशनल इंस्ट्रक्टर (प्रैक्टिकल) के तौर पर एक उम्मीदवार की नियुक्ति रद्द की। उस उम्मीदवार के पास नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग (NIOS) से मिला सेकेंडरी स्कूल सर्टिफिकेट (10वीं कक्षा) था, जिसे गोवा एजुकेशन बोर्ड ने 10+2 शिक्षा प्रणाली के तहत 10वीं कक्षा के बराबर माना था। हालांकि, भर्ती नियमों के लिए उम्मीदवार का "10+2 शिक्षा प्रणाली के तहत 10वीं कक्षा पास" होना ज़रूरी था और नियम NIOS 10वीं कक्षा को इस पद के लिए ज़रूरी योग्यता नहीं मानते।
कोर्ट ने कहा,
"...यह कहा जा सकता है कि भर्ती नियम एक खास एकेडमिक क्वालिफिकेशन तय करते हैं और '10+2 शिक्षा प्रणाली के तहत' शब्द उसका अहम हिस्सा हैं। नियमों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो NIOS सेकेंडरी स्कूल सर्टिफिकेट को उस ज़रूरत को पूरा करने वाला मानता हो, इसलिए ऐसी योग्यता को संबंधित पद के लिए तय ज़रूरी एकेडमिक क्वालिफिकेशन पूरा करने वाला नहीं माना जा सकता।"
प्रतिवादी ने लिखित परीक्षा में 96 नंबर हासिल किए, जो अपीलकर्ता से दो नंबर ज़्यादा थे। हालांकि, डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन के दौरान डिपार्टमेंटल सिलेक्शन कमेटी ने पाया कि उसके पास तय एकेडमिक क्वालिफिकेशन नहीं थी, जबकि अपीलकर्ता को योग्य पाया गया।
इसके बाद हाईकोर्ट ने NIOS क्वालिफिकेशन की मान्यता के आधार पर अधिकारियों को नियुक्ति के लिए प्रतिवादी पर विचार करने का निर्देश दिया, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की गई। जस्टिस पंचोली के फ़ैसले में विवादित आदेश को रद्द करते हुए कहा गया कि "10+2 शिक्षा प्रणाली के तहत" शब्द तय की गई योग्यता का एक ज़रूरी हिस्सा हैं और इन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा,
"इसलिए सवाल यह नहीं है कि NIOS द्वारा जारी सेकेंडरी स्कूल सर्टिफिकेट आम तौर पर एक मान्यता प्राप्त योग्यता है या नहीं। सवाल यह है कि क्या ऐसी योग्यता उस पद के लिए भर्ती नियमों के तहत तय की गई खास पात्रता शर्तों को पूरा करती है या नहीं।"
कोर्ट ने फिर से कहा कि योग्यताएं उसी तरह पूरी की जानी चाहिए जैसा भर्ती करने वाले अधिकारी ने तय किया और ज़रूरी पात्रता शर्तों को जोड़ने, बदलने या बढ़ाने के लिए न्यायिक समीक्षा का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
सिर्फ़ ज़्यादा नंबर पाने से अयोग्यता दूर नहीं होती
कोर्ट ने प्रतिवादी के ज़्यादा नंबरों के आधार पर दी गई दलील को भी खारिज किया और कहा कि तुलनात्मक योग्यता तभी मायने रखती है जब कोई उम्मीदवार तय पात्रता मानदंडों को पूरा कर ले।
कोर्ट ने कहा,
"हम यह भी नहीं मान सकते कि प्रतिवादी नंबर 3 द्वारा हासिल किए गए ज़्यादा नंबरों का पात्रता के मुद्दे पर कोई असर पड़ सकता है। तुलनात्मक योग्यता पर केवल उन उम्मीदवारों के बीच विचार किया जा सकता है जो तय पात्रता शर्तों को पूरा करते हैं। लिखित परीक्षा में हासिल किए गए नंबर भर्ती नियमों के तहत तय ज़रूरी योग्यता की कमी को पूरा नहीं कर सकते।"
कोर्ट ने कहा,
"...हमारी राय है कि हाई कोर्ट ने रिट याचिका नंबर 272/2023 को मंज़ूरी देकर और अधिकारियों को प्रतिवादी नंबर 3 को प्लंबर ट्रेड में वोकेशनल इंस्ट्रक्टर (प्रैक्टिकल) के पद के लिए योग्य मानने का निर्देश देकर गंभीर गलती की है। इसलिए 11.01.2024 का विवादित फ़ैसला और आदेश कानून की नज़र में टिक नहीं सकता।"
नतीजतन, अपील मंज़ूर कर ली गई।
Case Title : SANTOSH B. NAIK VERSUS STATE OF GOA & ORS.