Hindu Succession Act | धारा 22 के तहत क्लास-I उत्तराधिकारियों का प्राथमिकता वाला अधिकार कृषि भूमि पर भी लागू होती है: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-07-14 15:06 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (14 जुलाई) को फैसला सुनाया कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 22, जो क्लास-I उत्तराधिकारियों को किसी अन्य सह-उत्तराधिकारी द्वारा ट्रांसफर की जाने वाली संपत्ति को खरीदने का प्राथमिकता वाला अधिकार देता है, कृषि भूमि पर भी समान रूप से लागू होती है।

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 22 के कृषि भूमि पर लागू होने को चुनौती देने वाली अपील खारिज करते हुए जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा। हाईकोर्ट ने 'बाबू राम बनाम संतोख सिंह' (2019) 14 SCC 162 मामले का हवाला देते हुए कहा कि धारा 22 के तहत प्राथमिकता वाला अधिकार कृषि भूमि पर भी लागू होती है।

कोर्ट ने कहा कि HSA की धारा 22 मूल रूप से उत्तराधिकार से संबंधित कानून है, न कि कोई अलग 'प्री-एम्पशन' (पहले खरीदने का अधिकार) कानून। इसलिए, यह संसद की उस क्षमता को नकारता नहीं है, जिसके तहत वह कृषि भूमि को बाहर किए बिना बिना वसीयत के मृत्यु (intestacy) और उत्तराधिकार से जुड़े मामलों पर संविधान की लिस्ट III के तहत कानून बना सकती है।

यह विवाद तब शुरू हुआ, जब कई भाई-बहनों ने, जिन्हें अपने पिता से क्लास-I उत्तराधिकारी के तौर पर कृषि भूमि विरासत में मिली थी, दिसंबर 2011 में अपने हिस्से किसी तीसरे पक्ष को बेचने पर सहमति व्यक्त की।

एक अन्य भाई-बहन ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 22 का हवाला देते हुए संपत्ति को किसी बाहरी व्यक्ति को ट्रांसफर किए जाने से पहले उसे खरीदने के प्राथमिकता वाले अधिकार का दावा किया।

ट्रायल कोर्ट ने 'आतम प्रकाश बनाम हरियाणा राज्य' (1986) मामले में संविधान पीठ के फैसले का हवाला देते हुए मुकदमा खारिज कर दिया, जिसमें पंजाब प्री-एम्पशन एक्ट की धारा 15 को रद्द कर दिया गया था। हालांकि, पहली अपीलीय अदालत ने 'बाबू राम' मामले का हवाला देते हुए उस फैसले को पलट दिया और कहा कि धारा 22 कृषि भूमि पर भी लागू होती है। हाईकोर्ट ने अपीलीय अदालत के नजरिए को सही ठहराया, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट में यह अपील दायर की गई।

सुप्रीम कोर्ट के सामने, अपीलकर्ताओं ने 'आतम प्रकाश' मामले में संविधान पीठ के फैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि HSA की धारा 22 के तहत प्री-एम्पशन के अधिकार को कृषि भूमि के उत्तराधिकार तक नहीं बढ़ाई जा सकती।

अपील करने वाले की दलील को खारिज करते हुए जस्टिस करोल के फैसले में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि धारा 22 क्लास-I के उत्तराधिकारियों के बीच विरासत से सीधे तौर पर जुड़ा एक प्राथमिकता वाला अधिकार बनाती है और इसकी तुलना पंजाब प्री-एम्पशन एक्ट के तहत व्यापक प्री-एम्पशन अधिकारों से नहीं की जा सकती।

कोर्ट ने कहा कि जहाँ पंजाब कानून रिश्तेदारों, सह-मालिकों और किरायेदारों सहित कई तरह के लोगों को प्री-एम्पशन अधिकार देता है, वहीं धारा 22 सिर्फ़ उन उत्तराधिकारियों तक सीमित है, जिन्हें हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत एक साथ संपत्ति विरासत में मिलती है।

कोर्ट ने कहा,

"हमें यह बिल्कुल साफ लगता है कि 'आतम प्रकाश' मामले का हवाला देकर यह कहना कि प्री-एम्पशन का कॉन्सेप्ट ही असंवैधानिक है, उस मामले में की गई टिप्पणियों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना होगा। पंजाब एक्ट की धारा 15 को असंवैधानिक मानने का मुख्य कारण यह है कि उसमें बताए गए लोगों की सूची 'एग्नेटिक सक्सेशन' (पुरुष वंश परंपरा से उत्तराधिकार) के सिद्धांत के अनुरूप नहीं थी, और उन्हें शामिल करने का कोई औचित्य नहीं था।"

कोर्ट ने 'आतम प्रकाश' और 'बाबू राम' मामलों के बीच अंतर स्पष्ट किया और इस तर्क को भी खारिज किया कि 'आतम प्रकाश' मामले में संविधान पीठ के फैसले ने प्री-एम्पशन के कॉन्सेप्ट को ही असंवैधानिक बना दिया।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान पीठ ने पंजाब प्री-एम्पशन एक्ट के तहत खून के रिश्ते (consanguinity) पर आधारित प्री-एम्पशन के अधिकार को ही अमान्य किया। इसे सामंती अतीत की निशानी बताया।

कोर्ट के अनुसार, उस फैसले में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 22 की संवैधानिक वैधता की जांच नहीं की गई। वास्तव में, कोर्ट ने यह भी कहा कि चूंकि धारा 22 की संवैधानिक वैधता को कभी चुनौती नहीं दी गई, इसलिए अदालतें किसी दूसरे कानून से जुड़े मामले में की गई टिप्पणियों के आधार पर इसे लागू करने से इनकार नहीं कर सकतीं।

धारा 22 का मुख्य सार क्लास-I उत्तराधिकारियों के बीच उत्तराधिकार है: जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह

एक अलग लेकिन सहमति वाले फ़ैसले में जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह ने 'पिथ एंड सब्सटेंस' (कानून के मुख्य सार) के सिद्धांत को लागू करते हुए कहा कि धारा 22 का असली मकसद संपत्ति के ट्रांसफर को रेगुलेट करना नहीं, बल्कि उत्तराधिकार से जुड़ा है।

कोर्ट ने कहा कि प्राथमिकता का अधिकार उत्तराधिकार से अलग नहीं हो सकता, क्योंकि यह केवल उन क्लास-I उत्तराधिकारियों के बीच पैदा होता है जिन्हें एक ही व्यक्ति (जिसने वसीयत नहीं बनाई हो) से संपत्ति विरासत में मिलती है।

यह बाहरी लोगों, बिना रिश्ते वाले सह-मालिकों या संयुक्त रूप से संपत्ति खरीदने वाले लोगों पर लागू नहीं होता। इसलिए कोर्ट ने माना कि प्राथमिकता का अधिकार और उत्तराधिकार का कानून एक ही कानूनी योजना के अविभाज्य हिस्से हैं।

जस्टिस कोटिश्वर सिंह ने कहा,

"प्राथमिकता का अधिकार और उत्तराधिकार का अधिकार एक ही कानूनी ढांचे के दो हिस्से हैं, जो इस एक्ट के तहत हिंदुओं के बीच उत्तराधिकार से निपटते हैं। उन्हें अलग-अलग नहीं पढ़ा जा सकता और उन्हें एक साथ पढ़ा जाना चाहिए। इसे केवल ट्रांसफर नहीं कहा जा सकता, बल्कि यह मूल रूप से उत्तराधिकार से पैदा होता है। साथ ही वह भी केवल क्लास-I उत्तराधिकारियों तक सीमित है... पंजाब एक्ट की धारा 15 ने लोगों के एक बड़े दायरे को प्री-एम्पशन (पहले खरीदने) का अधिकार दिया, जो न केवल खून के रिश्ते से जुड़े हैं (जिसमें भाई, चचेरे भाई, पिता के भाई और उनके बेटे शामिल हैं), बल्कि वे लोग भी जो परिवार का हिस्सा नहीं है, जैसे कि किराएदार और सह-मालिक, चाहे उनका बेचने वाले के साथ कोई उत्तराधिकार का रिश्ता हो या न हो। उस अर्थ में, यह एक स्वतंत्र प्री-एम्पशन अधिकार है, जो न केवल खून के रिश्ते पर आधारित है, बल्कि उन लोगों पर भी लागू होता है, जिनका उत्तराधिकार या विरासत से कोई ज़रूरी संबंध नहीं है। इसके विपरीत, HSA की धारा 22 सख्ती से और विशेष रूप से HSA की अनुसूची के तहत क्लास-I उत्तराधिकारियों के उत्तराधिकार तक सीमित है, यानी वे लोग जिन्हें एक ही व्यक्ति (जिसने वसीयत नहीं बनाई हो) से एक साथ विरासत मिली है। पंजाब एक्ट के मामले की तरह कोई किराएदार, कोई दूर का खून का रिश्तेदार, या कोई सह-मालिक धारा 22 का इस्तेमाल नहीं कर सकता। यह एक ऐसा अधिकार है जो उत्तराधिकार के रिश्ते के साथ ही बनता और खत्म होता है। इसलिए ये दोनों प्रावधान स्वभाव और दायरे में मौलिक रूप से अलग हैं। इस प्रकार, 'आतम प्रकाश' मामले में पंजाब एक्ट की धारा 15 के संबंध में जो कहा गया था, उसका HSA की धारा 22 की व्याख्या पर कोई असर नहीं पड़ सकता है।"

संसद के पास कृषि भूमि के लिए धारा 22 बनाने का अधिकार

कोर्ट ने कहा,

"बिना वसीयत मरे व्यक्ति की संपत्ति के उत्तराधिकार के मामले में किसी राज्य के कानून के न होने और नतीजतन, राज्य के कानून और केंद्रीय कानून के बीच कोई टकराव न होने की स्थिति में संविधान के अनुच्छेद 254 के तहत टकराव का सवाल ही नहीं उठता। HSA (हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम) ही इस क्षेत्र में लागू एकमात्र कानून है, इसलिए HSA के दायरे में आने वाले हिंदुओं के उत्तराधिकार से जुड़े मामलों पर यही कानून लागू होगा। इसलिए यह तर्क कि संसद के पास कृषि भूमि के संबंध में HSA की धारा 22 बनाने का अधिकार नहीं था, न केवल सिद्धांत के तौर पर गलत है, बल्कि इस मामले में किसी ठोस तथ्य पर भी आधारित नहीं है। इस प्रकार, संसद के अधिकार न होने का सवाल ही नहीं उठता।"

ऊपर बताई गई बातों के आधार पर अपील खारिज कर दी गई, क्योंकि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 22 की वैधता को चुनौती देने का प्रयास सफल नहीं हुआ।

Cause Title: MAHINDER & ORS. VERSUS PURAN SINGH

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