हाईकोर्ट सिर्फ़ देरी की वजह से वैधानिक अपीलीय प्राधिकरण के सामने लंबित अपील पर फ़ैसला नहीं दे सकता: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-04-22 06:18 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में फ़ैसला दिया कि हाईकोर्ट वैधानिक अपीलीय प्राधिकरणों की भूमिका नहीं निभा सकते, सिर्फ़ इसलिए कि कार्यवाही में देरी हो रही है। कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के उन आदेशों को रद्द किया, जिनमें हाईकोर्ट ने वैधानिक अपील पर फ़ैसला होने देने के बजाय सीधे ही म्यूटेशन (नाम परिवर्तन) विवाद पर फ़ैसला दे दिया था।

जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने कहा कि जब आंध्र प्रदेश भूमि में अधिकार और पट्टादार पास बुक अधिनियम, 1971 के तहत वैधानिक अपील का विकल्प मौजूद था तो हाईकोर्ट को चाहिए कि वह अपीलीय प्राधिकरण को इस मामले पर फ़ैसला करने देता।

कोर्ट ने कहा,

"वैधानिक उपाय इसलिए दिए जाते हैं ताकि पक्षकार अलग-अलग स्तरों पर विभिन्न मंचों के सामने अपने अधिकारों के लिए लड़ सकें। ऐसी वैधानिक योजनाओं को सिर्फ़ इसलिए रद्द नहीं किया जा सकता कि उस प्रक्रिया में कुछ देरी हो सकती है।"

कोर्ट ने इस मामले को पेनुकोंडा के राजस्व मंडल अधिकारी के पास वापस भेज दिया, ताकि वे लंबित वैधानिक अपील पर उसके गुण-दोष के आधार पर फ़ैसला कर सकें।

यह विवाद कुछ संपत्तियों से जुड़े राजस्व रिकॉर्ड में की गई प्रविष्टियों से संबंधित है। निषेधाज्ञा (Injunction) को लेकर पहले चले दीवानी मुक़दमे के 2006 में ख़ारिज हो जाने और हाईकोर्ट तक की अपीलें भी रद्द हो जाने के बाद मंडल राजस्व अधिकारी ने अधिकारों के रिकॉर्ड में बदलाव करने का निर्देश दिया था।

उन बदलावों को 1971 के अधिनियम के तहत राजस्व मंडल अधिकारी के सामने चुनौती दी गई। उस अपील में 1 नवंबर, 2007 को अंतरिम आदेश पारित किया गया, जिसमें संशोधित प्रविष्टियों को निलंबित कर दिया गया।

जब यह वैधानिक अपील अभी भी लंबित थी, तभी 2008 में हाई कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की गई, जिसमें राजस्व मंडल अधिकारी के सामने अपील के सुनवाई योग्य होने को चुनौती दी गई।

इसके अलावा, 2007 में विरोधी दावेदारों द्वारा एक दीवानी मुक़दमा दायर किया गया, जिसमें उन्हीं संपत्तियों पर मालिकाना हक़ की घोषणा और कब्ज़े की वापसी की मांग की गई। 29 मार्च, 2022 को ट्रायल कोर्ट ने उन्हें मालिक घोषित कर दिया, लेकिन पाया कि संपत्तियां उनके कब्ज़े में नहीं थीं। इसलिए कोर्ट ने उचित प्रक्रिया के माध्यम से कब्ज़ा सौंपने का निर्देश दिया। इस फ़ैसले (Decree) के ख़िलाफ़ एक अपील हाई कोर्ट में लंबित है।

इस पृष्ठभूमि में हाईकोर्ट के सिंगल जज ने 24 मार्च, 2025 को पक्षकारों को वापस वैधानिक अपीलीय प्राधिकरण के पास भेजने के बजाय रिट याचिका पर ही फ़ैसला दे दिया। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि राजस्व रिकॉर्ड में डिक्री धारकों को "मालिक" और विरोधी पक्ष को "कब्जेदार" के रूप में दिखाया जाए, यह देखते हुए कि राजस्व प्रविष्टियां स्वामित्व प्रदान नहीं करतीं, बल्कि केवल कब्जे को दर्शाती हैं। यह व्यवस्था लंबित सिविल अपील के परिणाम के अधीन रखी गई।

बाद में डिवीज़न बेंच ने इसमें संशोधन किया और निर्देश दिया कि राजस्व रिकॉर्ड में रिट अपीलकर्ताओं के नाम "मालिक" और "कब्जेदार" दोनों के रूप में दिखाए जाएं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि डिवीज़न बेंच ने मामले के गुण-दोषों की जाँच की थी और ऐसी टिप्पणियां की थीं, जो लंबित सिविल अपील को प्रभावित कर सकती थीं। हालांकि, कोर्ट ने उन निष्कर्षों की जांच करने से इनकार किया और इसके बजाय यह माना कि वैधानिक उपचार के स्थान पर रिट क्षेत्राधिकार का प्रयोग करने की पूरी प्रक्रिया उचित नहीं थी।

कोर्ट ने माना कि सिंगल जज को अपीलीय प्राधिकारी की भूमिका नहीं निभानी चाहिए थी, जब यह स्पष्ट था कि राजस्व मंडल अधिकारी के समक्ष अपील दायर की जा सकती थी। कोर्ट ने टिप्पणी की कि वैधानिक उपचार इसलिए मौजूद हैं ताकि पक्षकार विभिन्न स्तरों पर अपने अधिकारों का दावा कर सकें और केवल देरी के आधार पर ऐसी व्यवस्था को रद्द नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने कहा,

"हम यह नोट करना चाहेंगे कि यद्यपि रिट याचिका माननीय जज के समक्ष काफी लंबे समय तक लंबित रही। फिर भी माननीय जज के लिए वैधानिक अपीलीय प्राधिकारी की भूमिका निभाना उचित नहीं था। एक बार जब माननीय जज को यह ज्ञात हो गया कि ऐसी अपील दायर की जा सकती है और संबंधित अपीलीय प्राधिकारी के पास अपील को रिकॉर्ड पर लेने तथा उस पर नोटिस जारी करने की शक्ति है तो माननीय जज को यह मामला अपीलीय प्राधिकारी पर छोड़ देना चाहिए था, ताकि वह अपील का निर्णय गुण-दोषों के आधार पर और कानून के अनुसार कर सके। केवल समय बीत जाने से माननीय जज का अपीलीय प्राधिकारी की भूमिका निभाना उचित नहीं ठहराया जा सकता।"

24 मार्च, 2025 और 10 मार्च, 2026 के दोनों आदेशों को रद्द करते हुए कोर्ट ने पेनुकोंडा के राजस्व मंडल अधिकारी के समक्ष लंबित वैधानिक अपील बहाल की। कोर्ट ने संबंधित प्राधिकारी को निर्देश दिया कि वह अपील का निर्णय गुण-दोषों के आधार पर और कानून के अनुसार करे। साथ ही इस बात का भी ध्यान रखे कि हाई कोर्ट में सिविल अपील अभी भी लंबित है।

कोर्ट ने कहा कि राजस्व मंडल अधिकारी द्वारा लिया गया कोई भी निर्णय, लंबित सिविल अपील के अंतिम परिणाम के अधीन होगा। कोर्ट ने संबंधित प्राधिकारी को यह स्वतंत्रता भी दी कि वह सभी पक्षों की सुनवाई करने के बाद राजस्व रिकॉर्ड में की जाने वाली प्रविष्टियों के संबंध में उचित आदेश पारित कर सकता है।

Case Title – Premal Pratap Joisher & Anr. v. Vikram Jethlal Joisher & Ors. Etc.

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