हेट स्पीच मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा, अधिकांश याचिकाएं बंद की

Update: 2026-01-20 13:34 GMT

मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच से जुड़े कई रिट याचिकाओं के एक समूह पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने कहा कि इन सभी मामलों को बंद किया जाएगा, हालांकि याचिकाकर्ताओं को अन्य वैधानिक उपाय अपनाने की स्वतंत्रता रहेगी। साथ ही पीठ ने एक मामला—काज़ीम अहमद शेरवानी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य—को जीवित रखने का निर्णय लिया, ताकि 2021 में नोएडा में एक मुस्लिम मौलवी पर हुए कथित हेट क्राइम से जुड़े ट्रायल की प्रगति और अन्य कदमों की निगरानी की जा सके।

खंडपीठ के समक्ष रखी गई अधिकांश याचिकाएं वर्ष 2020 की थीं, जो सोशल मीडिया पर चलाए गए 'कोरोना जिहाद' जैसे कथित नफरत भरे अभियानों और सुदर्शन टीवी के 'यूपीएससी जिहाद' कार्यक्रम से जुड़ी थीं। उल्लेखनीय है कि 2020 में ही अदालत ने 'यूपीएससी जिहाद' शो के प्रसारण पर रोक लगाने का आदेश दिया था। इसके बाद के वर्षों में क़ुरबान अली और मेजर जनरल एस.जी. वोम्बटकेरे जैसी याचिकाएं कथित 'धर्म संसद' और धार्मिक आयोजनों में दिए गए नफरत भरे भाषणों को लेकर दायर की गईं। इस बैच में अश्विनी उपाध्याय की जनहित याचिकाएं भी शामिल थीं, जिनमें हेट स्पीच के खिलाफ अलग कानून बनाने की मांग की गई थी।

अदालत ने याद दिलाया कि 2023 में उसने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया था कि सांप्रदायिक नफरत फैलाने और धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाले भाषणों के मामलों में पुलिस बिना किसी औपचारिक शिकायत का इंतजार किए स्वतः (सुओ मोटो) एफआईआर दर्ज करे। इन निर्देशों के पालन न होने के आरोप में अवमानना याचिकाएं भी दाखिल की गई थीं।

क़ुरबान अली की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता निज़ाम पाशा ने दलील दी कि समस्या कानून की कमी नहीं, बल्कि उसके क्रियान्वयन की अनिच्छा है—खासतौर पर तब, जब कथित आरोपी सत्ताधारी व्यवस्था से जुड़े हों। उन्होंने कहा कि कई हेट स्पीच कार्यक्रम पहले से प्रचारित होते हैं और अदालत के हस्तक्षेप से पहले ऐसे कार्यक्रम रुक भी चुके हैं, लेकिन एफआईआर के बाद न गिरफ्तारी होती है और न ही प्रभावी कार्रवाई, जिससे वही लोग बार-बार नफरत फैलाते रहते हैं।

सीपीआई(एम) नेता बृंदा करात की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ अग्रवाल ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने के संदर्भ में कहा कि मजिस्ट्रेट ने एफआईआर के लिए पूर्व स्वीकृति को अनिवार्य मान लिया था, जबकि कानून के अनुसार स्वीकृति केवल संज्ञान के चरण में आवश्यक होती है। उन्होंने बताया कि इस प्रश्न पर मंजू सुराणा मामले में संदर्भ लंबित है, जिस पर पीठ ने संक्षिप्त नोट दाखिल करने को कहा।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एम.आर. शमशाद ने कहा कि सामान्य हेट स्पीच के अलावा धार्मिक व्यक्तित्वों को निशाना बनाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है और पुलिस अक्सर गलत तरीके से 'स्वीकृति की कमी' का हवाला देकर शिकायतें खारिज कर देती है। पीयूसीएल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारेख ने याद दिलाया कि अदालत पहले तेहसीन पूनावाला (मॉब लिंचिंग) फैसले के सिद्धांतों को हेट स्पीच पर लागू करने की बात कह चुकी है, हालांकि इसमें कुछ विशेष बदलाव जरूरी हैं।

एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने कहा कि अदालत के निर्देशों का पालन हुआ है और जिन मामलों का हवाला दिया गया, उनमें कई में एफआईआर दर्ज की गई है। वहीं, न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एंड डिजिटल एसोसिएशन (NBDA) ने कहा कि मीडिया को भी सुना जाना चाहिए और संस्था ने हेट स्पीच को लेकर अपने दिशा-निर्देश तैयार किए हैं।

काज़ीम अहमद शेरवानी मामले में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता शरुख आलम ने दलील दी कि एक मौलवी को उसकी धार्मिक पहचान के कारण निर्वस्त्र कर पीटा गया, जो स्पष्ट रूप से हेट क्राइम है। उत्तर प्रदेश सरकार ने हालांकि कहा कि आरोपपत्र दाखिल हो चुका है और ट्रायल जारी है, साथ ही संबंधित अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई भी की गई है। पीठ ने इस मामले को लंबित रखने का निर्णय लिया।

अंत में, अमीकस क्यूरी वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने कहा कि सोशल मीडिया और मुख्यधारा का मीडिया नफरत को इसलिए बढ़ावा दे रहा है क्योंकि इससे व्यूअरशिप बढ़ती है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या हेट स्पीच को 'अलाभकारी' बनाकर इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाया जा सकता है। सभी पक्षों को सुनने के बाद पीठ ने संक्षिप्त लिखित नोट दाखिल करने का निर्देश दिया और आदेश सुरक्षित रख लिया।

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