कंपनी के फंड का धोखाधड़ी से गलत इस्तेमाल बाद में शेयरहोल्डर्स की मंज़ूरी से ठीक नहीं हो सकता: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-03-17 14:34 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को फैसला सुनाया कि प्रेफरेंशियल अलॉटमेंट के ज़रिए जुटाए गए फंड का इस्तेमाल उन मकसदों के अलावा किसी और मकसद के लिए करना, जिनका खुलासा निवेशकों के सामने किया गया, सिक्योरिटीज़ कानून के तहत धोखाधड़ी माना जाएगा। साथ ही इसे बाद में शेयरहोल्डर्स की मंज़ूरी से भी ठीक नहीं किया जा सकता।

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) द्वारा दायर अपीलों को मंज़ूर करते हुए जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की बेंच ने सिक्योरिटीज़ अपीलीय ट्रिब्यूनल (SAT) का आदेश रद्द किया, जिसने टेरास्कोप वेंचर्स लिमिटेड और उसके डायरेक्टर्स को बरी कर दिया था। कोर्ट ने SEBI के एडजुडिकेटिंग ऑफिसर (AO) द्वारा लगाए गए जुर्माने को बहाल किया।

बेंच ने कहा,

"...सिक्योरिटीज़ जारी करने के लिए, जिसमें शेयरों का प्रेफरेंशियल अलॉटमेंट भी शामिल है, स्पष्टीकरण नोट में बताए गए मकसद बहुत ज़्यादा अहमियत रखते हैं और सिक्योरिटीज़ बाज़ार से जुड़े स्टेकहोल्डर्स के बर्ताव को प्रभावित करने और उन पर असर डालने में उनकी बड़ी भूमिका होती है।"

बेंच ने यह भी बताया कि निवेशकों को सही जानकारी दिए बिना फंड का किसी और मकसद के लिए इस्तेमाल करना, SEBI (सिक्योरिटीज़ बाज़ार से जुड़ी धोखाधड़ी और गलत व्यापारिक तरीकों पर रोक) रेगुलेशंस, 2003 ("PFUTP रेगुलेशंस") के तहत धोखाधड़ी वाली गतिविधि मानी जाएगी।

कोर्ट ने फैसला सुनाया,

"सब्सक्राइब करने के आमंत्रण में बताए गए मकसद से अलग किसी और मकसद के लिए फंड का इस्तेमाल करना, PFUTP रेगुलेशंस के तहत एक धोखाधड़ी वाली गतिविधि है।"

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 2012 के एक प्रेफरेंशियल अलॉटमेंट से जुड़ा है, जिसे रेस्पोंडेंट-टेरास्कोप वेंचर्स लिमिटेड (उस समय मोर्यो इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड) ने किया। इसके ज़रिए कंपनी ने लगभग ₹15.87 करोड़ जुटाए। अपनी असाधारण आम बैठक (EGM) के नोटिस में कंपनी ने साफ तौर पर बताया था कि इस फंड का इस्तेमाल पूंजीगत खर्च, अधिग्रहण, वर्किंग कैपिटल और विस्तार से जुड़े मकसदों के लिए किया जाएगा।

हालांकि, SEBI ने पाया कि कंपनी ने फंड जुटाने के तुरंत बाद ही उसका गलत इस्तेमाल करना शुरू किया। कंपनी ने इन पैसों का इस्तेमाल दूसरी कंपनियों के शेयर खरीदने और लोन व एडवांस देने के लिए किया, जो कि बताए गए मकसदों के बिल्कुल उलट था।

नियामक कार्रवाई के बाद SEBI के एडजुडिकेटिंग ऑफिसर ने कंपनी पर आर्थिक जुर्माना लगाया, जबकि उसके पूर्णकालिक सदस्य (WTM) ने कंपनी और उसके डायरेक्टर्स पर सिक्योरिटीज़ बाज़ार में कारोबार करने पर भी रोक लगाई।

कंपनी ने अपने कामों का बचाव करते हुए 2017 के एक शेयरहोल्डर प्रस्ताव का हवाला दिया। इस प्रस्ताव में दावा किया गया कि फंड के इस्तेमाल में किए गए बदलाव को शेयरहोल्डर्स ने मंज़ूरी दी थी। इस तर्क को स्वीकार करते हुए सिक्योरिटीज अपीलीय ट्रिब्यूनल ने यह माना कि एक बार शेयरधारकों द्वारा विचलन को मंज़ूरी दिए जाने के बाद उसका उपयोग वैध हो गया, जिसके परिणामस्वरूप लगाए गए जुर्माने रद्द कर दिए गए।

SAT के आदेश के खिलाफ, SEBI ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

विवाद

मुख्य मुद्दा यह था कि क्या किसी कंपनी द्वारा प्रेफरेंशियल अलॉटमेंट (विशेष आवंटन) के ज़रिए जुटाए गए फंड का गलत इस्तेमाल बाद में शेयरधारकों द्वारा पारित किसी प्रस्ताव (रेज़ोल्यूशन) के ज़रिए वैध ठहराया जा सकता है।

फैसला

SAT का आदेश रद्द करते हुए जस्टिस विश्वनाथन द्वारा लिखे गए फैसले में फंड जुटाते समय निवेशकों को दी जाने वाली जानकारियों (डिस्क्लोज़र) के महत्व पर ज़ोर दिया गया। इसमें कहा गया कि ऐसी जानकारियाँ सिर्फ़ औपचारिकताएँ नहीं हैं, बल्कि ये सिक्योरिटीज़ मार्केट में भरोसे की नींव होती हैं। फंड का कोई भी गलत इस्तेमाल, जो उसके मूल उद्देश्य के खिलाफ हो, बाज़ार की अखंडता को कमज़ोर करता है।

कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा,

"जब कोई कंपनी प्राइवेट प्लेसमेंट करती है या पब्लिक होती है तो कानूनी व्यवस्था के तहत सही जानकारी देना और पारदर्शिता बनाए रखना अनिवार्य होता है। निवेशक और सिक्योरिटीज़ मार्केट से जुड़े अन्य सभी हितधारक—चाहे वे अंततः शेयर खरीदें या न खरीदें—दी गई जानकारी के आधार पर ही अपने फैसले लेते हैं।"

कोर्ट ने आगे कहा,

"ICDR रेगुलेशंस के रेगुलेशन 73 में बताए गए उद्देश्यों की जानकारी देना और SEBI के विभिन्न रेगुलेशंस के तहत कंपनियों से अपेक्षित निष्पक्षता और पारदर्शिता बनाए रखना—इन सभी का एक सकारात्मक उद्देश्य होता है, जिसके साथ लापरवाही नहीं बरती जानी चाहिए।"

शेयरधारकों की बाद की मंज़ूरी गलत इस्तेमाल को वैध नहीं ठहरा सकती

कोर्ट ने फैसला दिया कि कंपनियां शेयरधारकों की बाद की मंज़ूरी के ज़रिए फंड के गलत इस्तेमाल को वैध नहीं ठहरा सकतीं।

अदालत ने टिप्पणी की,

"तथ्यों से यह बिल्कुल स्पष्ट है कि प्रतिवादियों (Respondents) का शुरू से ही फंड का इस्तेमाल बताए गए उद्देश्यों के लिए करने का कोई इरादा नहीं था; उनका एकमात्र उद्देश्य किसी भी तरह फंड जुटाना और उसे उस काम के लिए इस्तेमाल करना था, जिसके लिए उन्होंने अंततः उसका इस्तेमाल किया," कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा। कोर्ट ने यह भी बताया कि "जुटाया गया पूरा फंड उस उद्देश्य के अलावा किसी दूसरे उद्देश्य के लिए इस्तेमाल किया गया, जो EoGM (असाधारण आम बैठक) के नोटिस में बताया गया। साथ ही यह गैर-कानूनी काम करने के बाद शेयरधारकों से इसकी पुष्टि (Ratification) मांगी गई।"

इसी टिप्पणी को आगे बढ़ाते हुए अदालत ने कहा,

“हमारे उद्देश्य के लिए जो बात सबसे अहम है, वह यह है कि प्रेफरेंशियल शेयर जारी करने से पहले EoGM के नोटिस के साथ जुड़ी एक्सप्लेनेटरी नोट में जो उद्देश्य बताए गए, उन फंड्स का इस्तेमाल उन बताए गए उद्देश्यों के लिए नहीं किया गया। प्रतिवादियों के लिए स्थिति को और भी खराब बनाने वाली बात यह है कि फंड्स जुटाए जाने के तुरंत बाद, यानी 16.10.2012 और 08.11.2012 के बीच ही, इन फंड्स का गलत इस्तेमाल (डायवर्जन) कर दिया गया। यह डायवर्जन एक्सप्लेनेटरी नोट में बताए गए उद्देश्य के बिल्कुल विपरीत था। यह तब किया गया, जब मेमोरेंडम ऑफ़ एसोसिएशन में कोई संशोधन नहीं हुआ, और न ही 29.09.2017 की कथित पुष्टि (Ratification) का प्रस्ताव पारित हुआ। इससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि यह डायवर्जन SEBI के PFUTP नियमों, SEBI अधिनियम और कंपनी अधिनियम की धारा 173(2) के तहत (जिसे SEBI ICDR नियम, 2009 के नियम 73(1) के साथ पढ़ा जाए) निर्धारित प्रकटीकरण (Disclosure) मानदंडों के भी विपरीत था। चूंकि यह एक स्पष्ट रूप से गैर-कानूनी कृत्य था, जिसका असर कंपनी के शेयरधारकों के अलावा अन्य कई हितधारकों (Stakeholders) पर भी पड़ रहा था, इसलिए इस मामले में किसी भी तरह की पुष्टि (Ratification) का सवाल ही पैदा नहीं होता।”

तदनुसार, अपील स्वीकार कर ली गई और विवादित फैसला रद्द कर दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप, एडजुडिकेटिंग ऑफिसर के आदेश को बहाल कर दिया गया।

Cause Title: Securities and Exchange Board of India Versus Terrascope Ventures Limited Etc.

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