अगर आरोपी को नोटिस नहीं दिया गया तो FERA शिकायत पर संज्ञान लेना गलत होगा: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि मजिस्ट्रेट, अब रद्द हो चुके 'फॉरेन एक्सचेंज रेगुलेशन एक्ट, 1973' (FERA) के तहत किसी आपराधिक शिकायत पर तब तक सही तरीके से संज्ञान नहीं ले सकते, जब तक कि एक्ट की धारा 61(2) के तहत ज़रूरी "मौका देने वाला नोटिस" (opportunity notice) आरोपी को न दिया गया हो।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने कहा,
"...FERA की धारा 61(2) के प्रावधान के तहत मौका देने वाला नोटिस देना एक ज़रूरी शर्त है। इसके बिना FERA की धारा 56 या 57 के तहत कोई शिकायत सही तरीके से दर्ज नहीं की जा सकती और न ही मजिस्ट्रेट उसमें बताए गए अपराध का संज्ञान ले सकते हैं।"
बेंच ने स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक और उसके इंचार्ज अधिकारी के खिलाफ FERA उल्लंघन के कथित मामले में शिकायतों और समन आदेशों को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की। यह मामला भारत के बाहर रहने वाले किसी व्यक्ति के फायदे के लिए गैर-कानूनी रूप से लगभग 30 लाख रुपये जमा करने से जुड़ा था।
कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला पलट दिया, जिसमें अपीलकर्ता की CrPC की धारा 482 के तहत शिकायत रद्द करने की याचिका पर विचार करने से इनकार किया गया था। हाईकोर्ट ने ऐसा सिर्फ इसलिए किया, क्योंकि CrPC की धारा 397 के तहत एक वैकल्पिक उपाय (यानी रिवीजन एप्लीकेशन दाखिल करना) मौजूद था।
कोर्ट ने 'धारीवाल टोबैको प्रोडक्ट्स लिमिटेड बनाम महाराष्ट्र राज्य (2009) 2 SCC 370' मामले में तय कानून को दोहराया कि रिवीजन एप्लीकेशन दाखिल करने जैसा कोई वैकल्पिक उपाय होने से हाईकोर्ट का CrPC की धारा 482 के तहत निहित अधिकार (Inherent Jurisdiction) कम या खत्म नहीं होता। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता की याचिका को सिर्फ इसलिए खारिज करके बड़ी गलती की कि उन्होंने रिवीजनरी अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल नहीं किया।
इसके अलावा, कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट ने अपीलकर्ताओं के खिलाफ प्रतिवादी की शिकायत के आधार पर संज्ञान लेने में गलती की, क्योंकि उन्होंने FERA की धारा 61(2) के प्रावधान का पालन नहीं किया। इस प्रावधान के तहत शिकायत के आधार पर अपराध का संज्ञान लेने से पहले आरोपी व्यक्तियों को अनिवार्य नोटिस देना ज़रूरी है।
कोर्ट ने कहा,
"FERA के तहत कार्यवाही के बाद होने वाले गंभीर दंड को देखते हुए यह मौका सार्थक और पर्याप्त होना चाहिए, न कि सिर्फ़ कागज़ी या दिखावटी औपचारिकता। यह साबित करने की ज़िम्मेदारी अभियोजन पक्ष की है कि ऐसा नोटिस तय तरीके से जारी और तामील किया गया। मामले का संज्ञान लेने से पहले मजिस्ट्रेट को खुद संतुष्ट होना होगा कि ऐसा मौका वास्तव में दिया गया था; वरना, संज्ञान लेने का आदेश टिक नहीं पाएगा और उसे रद्द किया जा सकता है।"
कोर्ट ने यह भी पाया कि कार्यवाही में हुई असाधारण देरी के लिए अभियोजन पक्ष ही मुख्य रूप से ज़िम्मेदार था।
कोर्ट ने गौर किया कि 2002 में शिकायत दर्ज कराने के बाद शिकायतकर्ता खुद लगभग दो साल तक समन लेने में नाकाम रहा। उसके बाद भी कई सालों तक समन तामील नहीं हो पाए। हाईकोर्ट के 2012 में एक महीने के भीतर ट्रायल पूरा करने के निर्देश के बावजूद, अभियोजन पक्ष ने फिर से तत्परता नहीं दिखाई; यहाँ तक कि आरोपी को तामील कराने के लिए नए नोटिस लेने से भी इनकार किया।
कैलाश चंद्र कापड़ी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, 2026 LiveLaw (SC) 487 मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा,
"प्रतिवादी-शिकायतकर्ता आज तक न तो उसे पेश कर पाया है और न ही उसकी सही तारीख बता पाया है। यह बताना ज़रूरी है कि शिकायत दर्ज हुए 23 साल और संबंधित लेन-देन को हुए तीन दशक से ज़्यादा का समय बीत चुका है, लेकिन ट्रायल अभी भी समन तामील होने के चरण से आगे नहीं बढ़ पाया।"
ऊपर बताई गई बातों को ध्यान में रखते हुए अपील मंज़ूर कर ली गई।
Cause Title : STANDARD CHARTERED BANK & ANR. VERSUS ENFORCEMENT OFFICER MINISTRY OF HOME AFFAIRS & ANR.