'आवंटित ज़मीन को विकसित न कर पाने पर कोई राहत नहीं', सुप्रीम कोर्ट ने Piaggio के पक्ष में लीज़ रद्द करने का फ़ैसला सही ठहराया

Update: 2026-04-07 04:59 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (6 अप्रैल) को Piaggio Vehicles Pvt. Ltd. को दी गई लीज़ रद्द करने का फ़ैसले सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि कंपनी तय समय सीमा के भीतर औद्योगिक प्लॉट पर निर्माण या विकास कार्य करने में नाकाम रही, इसलिए वह किसी भी तरह की राहत पाने की हकदार नहीं है।

जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और एनवी अंजारिया की बेंच ने कहा,

"...इस नतीजे से बचा नहीं जा सकता कि, जिस दिन लीज़ दी गई... तब से लेकर अब तक अपील करने वाली कंपनी इस प्लॉट पर एक पूरी तरह से औद्योगिक निर्माण इकाई स्थापित करने के लिए कोई ठोस प्रयास या नेक इरादा दिखाने में नाकाम रही है।"

बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया कि लीज़ एग्रीमेंट की शर्तों का पालन न करने पर कंपनी को कोई राहत नहीं दी जा सकती।

कोर्ट ने कहा,

"...लीज़ एग्रीमेंट में तय की गई छह महीने की अनिवार्य अवधि के मुकाबले, औद्योगिक प्लॉट के विकास में लगभग छह से सात साल की देरी करना कंपनी को किसी भी तरह की विवेकाधीन राहत पाने से भी वंचित करता है।"

गौतम बुद्ध नगर के सूरजपुर औद्योगिक क्षेत्र में 33 एकड़ ज़मीन मूल रूप से 1985 में आवंटित की गई और बाद में Piaggio की पिछली कंपनी को हस्तांतरित कर दी गई। मार्च, 2002 में औपचारिक लीज़ एग्रीमेंट किया गया, जिसमें कंपनी को छह महीने के भीतर ज़मीन का उपयोग शुरू करने की शर्त रखी गई।

हालांकि, अप्रैल, 2002 में ज़मीन का कब्ज़ा लेने के बावजूद, Piaggio ने कोई खास विकास कार्य नहीं किया। कोर्ट ने पाया कि ज़मीन के केवल 7.68% हिस्से पर ही पहले से बनी इमारतें मौजूद थीं, जो कंपनी द्वारा ज़मीन हासिल करने से भी पहले की थीं। कंपनी ने कई सालों तक कोई नया निर्माण कार्य शुरू नहीं किया और न ही कोई स्वीकृत लेआउट प्लान जमा किया।

उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास प्राधिकरण (UPSIDA) ने 2007 में नोटिस जारी कर लीज़ की शर्तों के उल्लंघन की ओर इशारा किया। इसके जवाब में कंपनी ने अपनी आंतरिक समस्याओं का हवाला देते हुए समय सीमा बढ़ाने की मांग की और यह स्वीकार किया कि उसने अपना ध्यान महाराष्ट्र में स्थित अपनी एक अन्य इकाई पर केंद्रित कर लिया।

लीज़ एग्रीमेंट रद्द किए जाने के फ़ैसले के ख़िलाफ़ कंपनी ने हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। हाई कोर्ट ने भी लीज़ रद्द करने के फ़ैसले में दखल देने से इनकार किया, जिसके बाद कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। अपील खारिज करते हुए जस्टिस मेहता द्वारा लिखे गए फैसले में कंपनी के सुस्त रवैये पर सवाल उठाया गया। कंपनी यह दिखाने में नाकाम रही कि उसने ज़मीन का इस्तेमाल किसी औद्योगिक विकास के लिए किया। इस संबंध में उसने कोई भी सार्थक कदम नहीं उठाया।

अदालत ने कहा,

"...अपील करने वाली कंपनी यह नहीं बता पाई कि पिछले छह सालों के दौरान उस ज़मीन पर कोई भी सार्थक औद्योगिक गतिविधि—जिसमें तथाकथित टेस्टिंग गतिविधियां भी शामिल हैं—कभी की गई हो।"

अदालत ने आगे कहा,

"...अपील करने वाली कंपनी का लापरवाह रवैया—जिसमें उसने लीज़ डीड (पट्टे के दस्तावेज़) की शर्तों का पालन नहीं किया। इस तरह औद्योगिक ज़मीन के विकास में लगभग छह से सात साल की देरी की, जबकि लीज़ डीड में इसके लिए सिर्फ़ छह महीने की अनिवार्य समय-सीमा तय थी—उसे विवेकाधीन राहत का हकदार नहीं बनाता। उन मुकदमों के पक्ष में न्याय नहीं हो सकता जिनका रवैया संवेदनहीन, लापरवाही भरा और लागू नियमों-कानूनों का स्पष्ट उल्लंघन करने वाला हो।"

नतीजतन, अपील खारिज कर दी गई।

अदालत ने आदेश दिया,

"अपील करने वाली कंपनी आज से तीस दिनों के भीतर—और इससे ज़्यादा देर न करते हुए—उस ज़मीन का खाली और शांतिपूर्ण कब्ज़ा तुरंत UPSIDA को सौंप दे। UPSIDA कानून के अनुसार उस ज़मीन के संबंध में कोई भी फैसला लेने के लिए स्वतंत्र होगा। अपील करने वाली कंपनी द्वारा इस अदालत में जमा की गई 10,95,52,825 रुपये (दस करोड़ पचानवे लाख बावन हज़ार आठ सौ पच्चीस रुपये मात्र) की राशि, उस पर बने ब्याज के साथ, अपील करने वाली कंपनी को वापस कर दी जाएगी।"

Cause Title: M/S. PIAGGIO VEHICLES PVT. LTD. VERSUS STATE OF U.P. & ORS.

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