'आतंकवाद से जुड़े मामलों में भी संवैधानिक सुरक्षा और निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार को कम नहीं किया जा सकता': सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-07-22 04:28 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने फिर कहा कि आतंकवादी हिंसा और समाज की सामूहिक अंतरात्मा को झकझोर देने वाले अपराधों के मामलों में भी संवैधानिक सुरक्षा और आपराधिक न्यायशास्त्र के स्थापित सिद्धांतों से समझौता नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने माना कि निर्दोष नागरिकों पर बम धमाकों से डर, दुख और जनता में गुस्सा पैदा होता है। हालांकि, कोर्ट ने जोर दिया कि ऐसे मामलों में संवैधानिक मानकों को कम करने के बजाय संवैधानिक सिद्धांतों का और भी सख्ती से पालन करने की ज़रूरत होती है।

कोर्ट ने कहा,

"ये सिद्धांत तब और भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं, जब कोर्ट के सामने ऐसे अपराध आते हैं जो समाज की सामूहिक अंतरात्मा को झकझोर देते हैं। निर्दोष नागरिकों के खिलाफ हिंसा की घटनाएं, खासकर सार्वजनिक जगहों पर विस्फोटकों का इस्तेमाल, सामाजिक व्यवस्था की नींव पर चोट करती हैं और डर, दुख और गुस्से की स्वाभाविक भावनाएं पैदा करती हैं। फिर भी ऐसे ही मामलों में कोर्ट को संवैधानिक मूल्यों के पालन पर अडिग रहना चाहिए। आरोप की गंभीरता के कारण सबूत के मानक को कम नहीं किया जा सकता, और न ही अपराध की भयावहता आपराधिक न्याय प्रक्रिया के स्थापित सिद्धांतों से हटने को सही ठहरा सकती है। जनता का आक्रोश जितना ज़्यादा होता है, कोर्ट की ज़िम्मेदारी उतनी ही बढ़ जाती है कि वह यह सुनिश्चित करे कि दोषी होने का फैसला पूरी तरह से कानून और सबूतों पर आधारित हो।"

जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संजय करोल और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने ये टिप्पणियां तब कीं, जब वे 1996 के समलेटी बस बम धमाका मामले में मुख्य आरोपी डॉ. अब्दुल हमीद को दोषी ठहराए जाने और मौत की सज़ा दिए जाने की समीक्षा कर रहे थे। वे यह देख रहे थे कि क्या यह फैसला निष्पक्ष सुनवाई और उचित प्रक्रिया की संवैधानिक गारंटी के अनुरूप था।

कोर्ट ने कहा कि आपराधिक न्याय प्रणाली की वैधता सज़ा की गंभीरता पर नहीं, बल्कि उस प्रक्रिया की निष्पक्षता पर निर्भर करती है, जिससे दोष तय किया जाता है। कोर्ट ने जोर दिया कि न्याय का असली पैमाना जल्द सज़ा देने में नहीं, बल्कि संयम में है। कोर्ट ने उस पुराने स्थापित सिद्धांत को दोहराया कि एक निर्दोष व्यक्ति को गलत तरीके से दोषी ठहराए जाने की तुलना में सौ दोषियों का बच निकलना बेहतर है।

कोर्ट ने कहा कि निष्पक्ष सुनवाई की संवैधानिक गारंटी का स्थान सबसे महत्वपूर्ण है। कोर्ट ने कहा कि प्रभावी कानूनी प्रतिनिधित्व का अधिकार, निर्दोष होने की धारणा, उचित संदेह से परे दोष साबित करने की अभियोजन पक्ष की ज़िम्मेदारी और सबूतों की निष्पक्ष जांच की ज़रूरत - ये केवल प्रक्रियात्मक औपचारिकताएं नहीं हैं, बल्कि ठोस गारंटी हैं जो कानून के शासन को जनमत के शासन से अलग करती हैं।

कोर्ट ने कहा,

“असरदार कानूनी प्रतिनिधित्व का अधिकार, बेगुनाह माने जाने का अधिकार, अभियोजन पक्ष पर बिना किसी शक के गुनाह साबित करने की ज़िम्मेदारी, और सबूतों की निष्पक्षता और सावधानी से जांच की ज़रूरत - ये सिर्फ़ प्रक्रिया की औपचारिकताएं नहीं हैं। ये वे अहम गारंटी हैं, जो कानून के शासन को जनमत के शासन से अलग करती हैं। न्याय न सिर्फ़ होना चाहिए, बल्कि साफ़ तौर पर होता हुआ दिखना भी चाहिए। किसी अदालती फ़ैसले की वैधता सिर्फ़ उसके नतीजे पर ही नहीं, बल्कि उस प्रक्रिया की निष्पक्षता, पारदर्शिता और ईमानदारी पर भी निर्भर करती है जिससे वह नतीजा निकला है।”

कोर्ट ने कहा कि यह सिद्धांत कानून द्वारा व्यक्तिगत आज़ादी और मानवीय गरिमा को दिए जाने वाले ऊंचे महत्व को दिखाता है, जिसके तहत गुनाह को सिर्फ़ कानूनी रूप से स्वीकार्य, भरोसेमंद और ठोस सबूतों के ज़रिए ही साबित किया जाना ज़रूरी है।

कोर्ट ने कहा,

“यह सिद्धांत न तो अपराध के प्रति कोई रियायत है और न ही संस्थागत कमज़ोरी की निशानी; बल्कि यह उस गहरे महत्व को दर्शाता है, जो कानून व्यक्तिगत आज़ादी और मानवीय गरिमा को देता है। इसलिए आपराधिक प्रक्रिया को ऐसे सुरक्षा उपायों के साथ तैयार किया गया, जिनका मकसद गलत सज़ा की संभावना को कम करना है। भले ही शक मज़बूत हो, जनभावनाएं उग्र हों, या आरोप बेहद गंभीर हों, कानून इस बात पर ज़ोर देता है कि गुनाह को कानूनी रूप से स्वीकार्य, भरोसेमंद और ठोस सबूतों के ज़रिए ही साबित किया जाना चाहिए।”

कोर्ट ने कहा कि न सिर्फ़ न्याय होना चाहिए, बल्कि न्याय होता हुआ दिखना भी चाहिए। किसी अदालती फ़ैसले की वैधता इस बात पर भी निर्भर करती है कि जिस प्रक्रिया से वह फ़ैसला लिया गया, वह कितनी निष्पक्ष, पारदर्शी और ईमानदार थी।

कोर्ट ने आगे कहा कि जब किसी अपराध को लेकर जनता में ज़्यादा आक्रोश हो तो अदालतों की ज़िम्मेदारी और बढ़ जाती है कि वे यह पक्का करें कि दोषी होने का फ़ैसला सिर्फ़ कानून और सबूतों के आधार पर ही किया जाए।

कोर्ट ने माना कि भले ही समलेटी बस धमाके की घटना निस्संदेह सार्वजनिक शांति और सुरक्षा पर हमला थी, लेकिन कोर्ट का काम यह बारीकी से जांचना था कि क्या ट्रायल कोर्ट और राजस्थान हाई कोर्ट द्वारा सुनाई गई सज़ा आपराधिक कानून के तहत ज़रूरी सबूतों के मानकों को पूरा करती है। कोर्ट ने कहा कि इन अपीलों में सबूतों की बारीकी से जांच की ज़रूरत थी, न कि सिर्फ़ अपराध की गंभीरता के आधार पर आकलन करने की।

इन सिद्धांतों को लागू करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अंततः माना कि ट्रायल के दौरान डॉ. अब्दुल हमीद को प्रभावी कानूनी प्रतिनिधित्व नहीं मिला। कोर्ट ने उनकी सज़ा और मौत की सज़ा रद्द की और नए सिरे से ट्रायल (de novo trial) का आदेश दिया। साथ ही यह भी साफ़ किया कि यह फ़ैसला आरोपों की गंभीरता के बजाय निष्पक्ष ट्रायल की संवैधानिक गारंटी पर आधारित है।

Case Title – Abdul Hameed v. State of Rajasthan

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