दहेज से होने वाली मौतों पर सुप्रीम कोर्ट चिंतित: यूपी, बिहार और कर्नाटक राज्यों का नाम लेकर जताई आपत्ति
दहेज से जुड़ी हिंसा के लगातार बढ़ते खतरे की कड़ी आलोचना करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दहेज से होने वाली मौतें "समाज के कुछ वर्गों में एक गंभीर समस्या" बनी हुई हैं, खासकर उत्तर प्रदेश, बिहार और कर्नाटक राज्यों में। कोर्ट ने ये टिप्पणियाँ दहेज से जुड़ी एक मौत के मामले में पति को दी गई ज़मानत रद्द करते हुए कीं।
कोर्ट ने ये टिप्पणियां तब कीं, जब उसने एक मृत महिला के पिता द्वारा दायर अपील स्वीकार की। इस अपील में इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश रद्द करने की मांग की गई, जिसमें आरोपी पति को ज़मानत दी गई। यह मामला शादी के सात साल के भीतर उत्पीड़न और मौत के आरोपों से जुड़ा था।
कोर्ट ने कहा,
"समय के साथ हमने देखा कि उत्तर प्रदेश राज्य में नई-नई शादीशुदा लड़कियों को दहेज की मांग पूरी न होने पर उनके ससुराल में बेरहमी से मार दिया जाता है। या तो उन्हें लगातार उत्पीड़न के कारण आत्महत्या करने पर मजबूर किया जाता है, या फिर और ज़्यादा दहेज की मांग को लेकर उनकी हत्या कर दी जाती है।"
कोर्ट ने आगे कहा,
"एक लड़की कई सपनों के साथ शादी करती है; वह उन सपनों को सच करना चाहती है। एक नई-नई शादीशुदा लड़की हमेशा खुशहाल वैवाहिक जीवन जीने की चाह रखती है। वह अपने पति और उसके परिवार वालों से प्यार और स्नेह पाने की भी उम्मीद करती है। वह अपना परिवार बसाने की भी इच्छा रखती है। कोई भी लड़की इसलिए शादी नहीं करती कि दहेज की मांग पूरी न होने पर उसे उसके ससुराल में बेरहमी से मार दिया जाए। यह इस देश के समाज के कुछ वर्गों में एक गंभीर समस्या है, खासकर उत्तर प्रदेश, बिहार और कर्नाटक राज्यों में।"
दहेज प्रथा अभी भी गहरी जड़ें जमाए हुए
कोर्ट की बेंच ने इस बात पर दुख जताया कि शिक्षा और महिला सशक्तिकरण में प्रगति के बावजूद, शादी के बाद भी दहेज की मांगें जारी हैं:
"बेहतर शैक्षिक अवसर मिलने और आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रोत्साहन मिलने के बावजूद, महिलाओं को शादी के बाद भी दहेज की मांगों का दंश झेलना पड़ता है।"
कोर्ट ने व्यापक सामाजिक रीतियों का भी ज़िक्र किया, और कहा कि शुरुआत में दिए गए "तोहफ़े" अक्सर शादी के बाद ज़बरदस्ती की मांगों में बदल जाते हैं, जिससे दुल्हन के परिवार पर दबाव और शोषण का एक दुष्चक्र बन जाता है।
आगे कहा गया,
"यह अक्सर एक ऐसे जाल में बदल जाता है, जिसे कई महिलाएं शादी के बाद ही समझ पाती हैं - भले ही तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। शादी से पहले, दूल्हे का परिवार शायद ही कभी बहुत ज़्यादा मांगें करता है, लेकिन एक बार शादी पक्की हो जाने के बाद वे दबाव डालना शुरू कर देते हैं; उन्हें लगता है कि शादी को बचाने के लिए दुल्हन के माता-पिता के पास उनकी बात मानने के अलावा कोई और चारा नहीं होगा।"
कोर्ट ने कहा,
"भारतीय शादियों में अलिखित नियम यह है कि जब दूल्हा अच्छी-खासी सैलरी कमाता है तो दुल्हन का परिवार अक्सर इस बात का दबाव महसूस करता है कि वह ज़्यादा दहेज दे, ताकि दूल्हे को किसी भी तरह की नाराज़गी न हो।"
कोर्ट ने अपने फ़ैसले की शुरुआत महात्मा गांधी के इस कथन से की - "कोई भी नौजवान जो शादी के लिए दहेज को एक शर्त बनाता है, वह अपनी शिक्षा और अपने देश को बदनाम करता है, और नारी जाति का अपमान करता है।"
चौंकाने वाले आंकड़े
इस समस्या की गंभीरता को उजागर करते हुए कोर्ट ने उन आँकड़ों पर गौर किया जिनसे यह पता चलता है:
“साल 2023 में दहेज से जुड़ी मौतों के मामलों में कुल 6,156 लोगों की जान चली गई। उत्तर प्रदेश एक बार फिर 2,122 मौतों के साथ इस सूची में सबसे ऊपर रहा, जिसके बाद 1,143 मौतों के साथ बिहार का नंबर आया। साल 2023 में पूरे देश में हत्या के 833 मामलों में दहेज को ही हत्या का मकसद बताया गया। दहेज निषेध अधिनियम के तहत साल 2023 में 83,327 मामले सुनवाई के लिए आए, जिनमें से 69,434 मामले पिछले सालों से चले आ रहे थे। इस साल इस अधिनियम (1961) के तहत 27,154 गिरफ्तारियां भी हुईं - जिनमें 22,316 पुरुष और 4,838 महिलाएँ शामिल थीं।"
कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की ज़मानत देने के फ़ैसले की आलोचना करते हुए कहा कि गंभीर आरोपों के बावजूद आरोपी को रिहा करके हाईकोर्ट ने "घोर गलती" की है।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस विजय बिश्नोई की खंडपीठ ने हाईकोर्ट के ज़मानत आदेश रद्द करते हुए यह टिप्पणी की:
“जब ज़मानत की अर्ज़ी दी जाती है तो हाईकोर्ट से यह उम्मीद की जाती है कि वह अपराध की प्रकृति और प्रथम दृष्ट्या मामले पर विचार करे। FIR में पिता द्वारा लगाए गए आरोप प्रथम दृष्ट्या मामले से कहीं अधिक गंभीर हैं। इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि मृतका की मृत्यु शादी के सात साल के भीतर उसके ससुराल में हुई। दहेज की मांग और मृतका को लगातार परेशान करने के गंभीर आरोप होने के कारण हाईकोर्ट को भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (BSA)[पूर्ववर्ती साक्ष्य अधिनियम की धारा 113(B)] की धारा 118 के प्रावधानों को ध्यान में रखना चाहिए था।”
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला एक युवती की मौत से जुड़ा है, जो 11 जुलाई, 2024 को गाजियाबाद में अपने ससुराल में संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाई गई। उसकी शादी को अभी पांच साल भी पूरे नहीं हुए।
12 जुलाई, 2024 को उसके पिता द्वारा दर्ज कराई गई FIR के अनुसार, मृतका को दहेज की माँगों को लेकर लगातार उत्पीड़न और क्रूरता का सामना करना पड़ रहा था। इन मांगों में एक लग्ज़री कार और अतिरिक्त नकदी की मांग भी शामिल थी। शिकायत में आरोप लगाया गया कि भारी मात्रा में दहेज पहले ही दिए जाने के बावजूद, ससुराल वाले और अधिक दहेज के लिए दबाव बनाते रहे और उसे जान से मारने की धमकी भी दी।
FIR में आठ लोगों को आरोपी बनाया गया, जिनमें मृतका का पति और उसके परिवार के सदस्य शामिल थे।
जांच के बाद पति और उसके माता-पिता के खिलाफ 'भारतीय न्याय संहिता, 2023' के प्रावधानों के साथ-साथ 'दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961' की धारा 3 और 4 के तहत आरोप पत्र (चार्जशीट) दायर किया गया।
सेशन कोर्ट ने इससे पहले उनकी ज़मानत याचिका खारिज की थी। हालांकि, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उन्हें ज़मानत दी। हाईकोर्ट ने मुख्य रूप से मौत का कारण 'फाँसी लगाने के कारण दम घुटना' (Asphyxia) माना और FIR दर्ज कराने में कथित देरी का भी ज़िक्र किया।
हाईकोर्ट के इसी फैसले के खिलाफ शिकायतकर्ता (मृतका के पिता) ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।
निर्णय
अपील स्वीकार करते हुए न्यायालय ने पाया कि हाईकोर्ट का तर्क कानूनी रूप से अस्थिर और तथ्यों के आधार पर त्रुटिपूर्ण था। न्यायालय ने टिप्पणी की कि जब घटना के ठीक अगले ही दिन FIR तत्काल दर्ज करा दी गई तो फिर इसमें देरी का सवाल ही कैसे उठता है?
न्यायालय ने टिप्पणी की,
"हाईकोर्ट ने FIR दर्ज कराने में हुई देरी और उसके प्रभावों की बात की। हमारी समझ से परे है कि हाईकोर्ट ने किस आधार पर यह कहा कि FIR दर्ज कराने में कोई देरी हुई। मृतका की मृत्यु 11 जुलाई, 2024 को हुई, और जैसे ही उसके माता-पिता को अपनी बेटी की मौत की खबर मिली, उन्होंने ठीक अगले ही दिन, यानी 12 जुलाई, 2024 को संबंधित पुलिस थाने में FIR दर्ज करा दी। ऐसे में FIR दर्ज कराने में देरी कहां हुई?"
इसके अलावा, कोर्ट ने पाया कि हाई कोर्ट ने पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के ज़रूरी हिस्सों को नज़रअंदाज़ किया, जिससे पहली नज़र में यह पता चलता था कि मौत की वजह गला घोंटने से दम घुटना (Asphyxia) थी - एक ऐसा मामला जिस पर ट्रायल कोर्ट ने गौर किया।
दहेज के मामलों में ज़मानत देने वाली अदालतों को सावधान रहना चाहिए
दहेज के मामलों में ज़मानत देते समय कोर्ट ने ज़मानत देने वाली अदालतों को चेतावनी दी कि वे अपराध की गंभीरता को नज़रअंदाज़ न करें, जिसका पूरे समाज पर असर पड़ता है।
कोर्ट ने कहा,
"हम बस यही कहना चाहते हैं कि किसी भी स्तर पर ज़मानत देने वाली अदालत को बहुत सावधान रहना चाहिए ताकि यह पक्का हो सके कि उसका कोई भी आदेश - जैसा कि हमारे सामने चुनौती के तौर पर आया है - पूरे समाज द्वारा इस तरह न देखा या पढ़ा जाए कि अदालतें महिलाओं के खिलाफ गंभीर अपराधों को बहुत हल्के में ले रही हैं।"
नतीजतन, अपील मंज़ूर की गई और प्रतिवादी नंबर 2 को जेल अधिकारियों के सामने आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया गया।
Cause Title: MAHESH CHAND VERSUS STATE OF UTTAR PRADESH & ANR.