होस्टाइल गवाह की गवाही, जिस हद तक भरोसे लायक हो, स्वीकार्य: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (15 अप्रैल) को फैसला सुनाया कि अदालतें किसी होस्टाइल गवाह की गवाही को पूरी तरह से खारिज नहीं कर सकतीं, बल्कि उन्हें ऐसे सबूतों के उन हिस्सों की पहचान करनी चाहिए और उन पर भरोसा करना चाहिए जो "भरोसे लायक" हों।
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने भ्रष्टाचार के मामले में बरी किए जाने का फैसला रद्द करते हुए टिप्पणी की,
"...हर अदालत जो किसी होस्टाइल गवाह की गवाही पर विचार कर रही है, उसे गवाही की उस हद तक जांच करनी होगी, जो मामले को साबित करने के लिए भरोसे लायक हो।"
बेंच ने कहा कि सिर्फ इस बात से कि शिकायतकर्ता होस्टाइल हो गया, बरी किए जाने को सही नहीं ठहराया जा सकता, जबकि रिश्वत की मांग और उसे स्वीकार किए जाने की बात अन्य सबूतों से साबित हो रही हो।
यह मामला उन आरोपों से जुड़ा है कि आरोपी एक तालुक सप्लाई ऑफिसर (TSO) था। उसने शिकायतकर्ता से एक सरकारी काम करने के लिए 500 रुपये की रिश्वत मांगी थी। यह काम शिकायतकर्ता के काम से जुड़े एक दस्तावेज (Abstract) पर काउंटर-हस्ताक्षर करना था।
रिश्वत देने का इच्छुक न होने पर शिकायतकर्ता ने सतर्कता विभाग से संपर्क किया और एक लिखित शिकायत दर्ज कराई। एक जाल (Trap) बिछाया गया, जिसके दौरान शिकायतकर्ता ने निशान लगे हुए नोट अपने पास रखे; जाल बिछाने से पहले और बाद की कार्यवाही के दौरान स्वतंत्र गवाह मौजूद थे और आरोपी ने कथित तौर पर रिश्वत की रकम स्वीकार की।
जाल बिछाने के बाद कार्यवाही की गई और सबूत इकट्ठा किए गए, जिसमें शिकायत और स्वतंत्र गवाहों की मौजूदगी में दर्ज किए गए बयान शामिल थे।
मुकदमे के दौरान, शिकायतकर्ता (PW1) होस्टाइल हो गया और उसने विरोधाभासी जवाब दिए। इस होस्टाइल रवैये पर बहुत ज़्यादा भरोसा करते हुए हाईकोर्ट ने आरोपी को बरी किया। हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष रिश्वत की "मांग" के ज़रूरी तत्व को साबित करने में नाकाम रहा है।
हाईकोर्ट के फैसले से असंतुष्ट होकर राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए जस्टिस चंद्रन द्वारा लिखे गए फैसले में यह टिप्पणी की गई कि हाईकोर्ट ने आरोपी को बरी करने में गलती की। उसने सिर्फ शिकायतकर्ता के बाद में होस्टाइल हो जाने पर भरोसा किया, जबकि शिकायतकर्ता की गवाही के उस हिस्से को नज़रअंदाज़ किया, जिसमें उसने आरोपी द्वारा रिश्वत की मांग किए जाने की बात स्वीकार की थी।
अदालत ने टिप्पणी की,
"PW1 की गवाही का जितना हिस्सा भरोसे लायक है। उसे, इस बात के बावजूद कि PW1 ने क्रॉस एग्जामिनेशन के दौरान बचाव पक्ष द्वारा दिए गए हर सुझाव को मान लिया था, नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।"
कोर्ट ने कहा कि गवाह के विरोधाभासी बयानों में से भरोसेमंद हिस्से को ढूंढ निकालना कोर्ट की ज़िम्मेदारी है।
कोर्ट ने कहा,
“PW1 की गवाही विरोधाभासी बातों से भरी थी, लेकिन यह कोर्ट का काम है कि वह इसकी बारीकी से जांच करे और पता लगाए कि क्या इसमें कुछ भी ऐसा भरोसेमंद है, जिससे लगाए गए आरोप साबित हो सकें। ट्रायल कोर्ट ने यही किया।”
कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस फैसले को भी खारिज किया कि नीरज दत्ता बनाम राज्य (NCT दिल्ली) मामले के आधार पर प्रतिवादी को सिर्फ इसलिए बरी कर दिया जाए, क्योंकि रिश्वत की मांग पर विवाद था। कोर्ट ने माना कि यह आधार गलत था। यह भी कहा कि नीरज दत्ता मामले में भी कोर्ट ने सत पॉल बनाम दिल्ली प्रशासन (1976) 1 SCC 727 मामले का हवाला दिया, जिसमें कोर्ट से यह अपेक्षा की जाती है कि वह गवाह की पूरी गवाही की जांच करे और उसमें से उन हिस्सों को अलग करे जो भरोसेमंद पाए जाते हैं।
सत पॉल (उपरोक्त) मामले में कोर्ट ने टिप्पणी की,
“अगर जज को लगता है कि इस प्रक्रिया में गवाह की विश्वसनीयता पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है तो वह गवाह की गवाही को पूरी तरह से पढ़ने और उस पर सावधानी और ध्यान से विचार करने के बाद रिकॉर्ड पर मौजूद अन्य सबूतों की रोशनी में उसकी गवाही के उस हिस्से को स्वीकार कर सकता है, जिसे वह भरोसेमंद मानता है और उसी के आधार पर फैसला ले सकता है।”
कोर्ट ने फैसला सुनाया,
“दरअसल, हाईकोर्ट ने PW1 की गवाही में कई ऐसे हिस्से देखे हैं, जहां उसने रिश्वत की मांग की बात स्वीकार की है, खासकर Ext. P1 के कुछ खास हिस्से। गवाह के कटघरे में खड़े होने के दौरान उसके हाव-भाव—जैसा कि रिकॉर्ड किए गए सबूतों से पता चलता है, खासकर सवाल पूछे जाने पर तुरंत जवाब देने में उसकी हिचकिचाहट—को भी हाईकोर्ट ने गौर किया था। हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि PW2 की गवाही को बचाव पक्ष की क्रॉस एग्जामिनेशन में ज़रा भी कमज़ोर नहीं किया जा सका। इन सभी टिप्पणियों के बावजूद, हाईकोर्ट ने यह मान लिया कि रिश्वत की मांग साबित नहीं हुई, जो हमारी नज़र में एक गलती थी। PW1 की गवाही विरोधाभासी बातों से भरी थी, लेकिन यह कोर्ट का काम है कि वह इसकी बारीकी से जांच करे और पता लगाए कि क्या इसमें कुछ भी ऐसा भरोसेमंद है, जिससे लगाए गए आरोप साबित हो सकें। ट्रायल कोर्ट ने यही किया।”
उपरोक्त बातों के आधार पर अपील स्वीकार की गई और ट्रायल कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए जाने का फैसला बहाल किया गया।
Cause Title: The State of Kerala Versus K.A. Abdul Rasheed