स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव असंवैधानिक या अवैध तरीकों से दूषित हो जाए तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हालांकि संवैधानिक अदालतें आमतौर पर चुनाव प्रक्रिया में दखल नहीं देतीं, लेकिन जब यह सुनिश्चित करने के लिए हस्तक्षेप करना जरूरी हो कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव असंवैधानिक या अवैध तरीकों से दूषित न हों, तो उनके हाथ बंधे नहीं होते।
कोर्ट ने यह टिप्पणी आंध्र प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी युवाजन श्रमिक रायतू कांग्रेस पार्टी (YSRCP) को अंतरिम राहत देते हुए की। पार्टी ने आरोप लगाया कि हिंसा और कानून-व्यवस्था की खराब स्थिति के कारण उसके उम्मीदवारों को शहरी स्थानीय निकाय चुनावों के लिए नामांकन दाखिल करने से रोका गया।
जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने माना कि पार्टी ने प्रथम दृष्टया ऐसा मामला पेश किया, जिसमें नामांकन प्रक्रिया की शुचिता (Integrity) की रक्षा के लिए निर्देश देना जरूरी है। इसलिए बेंच ने राज्य चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि वह YSRCP की उस मांग पर विचार करे, जिसमें नामांकन की समय-सीमा बढ़ाने को कहा गया। पार्टी ने अपने उम्मीदवारों के खिलाफ बड़े पैमाने पर हिंसा की शिकायत की थी।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह सीधे तौर पर चुनाव प्रक्रिया में दखल नहीं दे रहा है, बल्कि आंध्र प्रदेश राज्य चुनाव आयोग (SEC) को पार्टी की शिकायत पर विचार करने और उचित निर्णय लेने की अनुमति दे रहा है। कोर्ट ने SEC को यह भी निर्देश दिया कि वह 21 अक्टूबर को उम्मीदवारों की अंतिम सूची जारी न करे और इसे 23 अक्टूबर तक टाल दे।
YSRCP ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए आरोप लगाया कि हिंसा और बाधाओं के कारण उसके लगभग दो-तिहाई उम्मीदवारों को शहरी स्थानीय निकाय चुनावों के लिए नामांकन दाखिल करने से रोक दिया गया।
इससे पहले, हिंसा की आशंका को देखते हुए पार्टी ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट से अग्रिम उपाय (Anticipatory Measures) की मांग की। हाईकोर्ट ने 15 अक्टूबर को इस याचिका को खारिज कर दिया। इसके बाद पार्टी ने नामांकन की समय-सीमा बढ़ाने की मांग की और तर्क दिया कि शारीरिक हिंसा के कारण उसके उम्मीदवार नामांकन केंद्रों तक नहीं पहुंच सके। हाई कोर्ट ने इस अनुरोध को भी ठुकरा दिया, जिसके बाद पार्टी सुप्रीम कोर्ट पहुंची।
आंध्र प्रदेश राज्य और राज्य चुनाव आयुक्त ने इस याचिका का विरोध किया।
'स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के अंतिम संरक्षक संवैधानिक न्यायालय ही हैं'
खंडपीठ ने राज्य चुनाव आयोग के प्रति न्यायिक सम्मान (Judicial Deference) के सिद्धांत को स्वीकार किया, जिसे संविधान के तहत चुनाव कराने और उनकी निगरानी करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। हालांकि, खंडपीठ ने कहा कि जब चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता खतरे में हो तो यह सिद्धांत न्यायिक समीक्षा (Judicial R eview) को पूरी तरह से बाहर नहीं कर सकता।
खंडपीठ ने कहा,
"स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान का एक बुनियादी ढांचा हैं। ऐसे चुनावों में नामांकन दाखिल करके भाग लेने का अधिकार, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया का ही एक हिस्सा है।"
अदालत ने कहा कि राज्य चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी में यह सुनिश्चित करना भी शामिल है कि चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार स्वतंत्र और पारदर्शी तरीके से अपने नामांकन पत्र दाखिल कर सकें। साथ ही, चुनाव प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए संवैधानिक न्यायालयों की न्यायिक समीक्षा करने की शक्ति को पूरी तरह से खत्म नहीं किया जा सकता।
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि चुनाव मामलों में न्यायिक संयम (Judicial Restraint) इसलिए रखा जाता है ताकि यह प्रक्रिया एक स्वतंत्र संवैधानिक प्राधिकरण के हाथों में रहे और चुनाव बिना किसी न्यायिक हस्तक्षेप के, तय समय-सीमा के भीतर संपन्न हो सकें।
हालांकि, खंडपीठ ने कहा कि जब प्रथम दृष्टया (prima facie) ऐसी संभावना हो कि नामांकन में बाधा डालकर चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित किया जा रहा है, तो संवैधानिक न्यायालय चुप नहीं बैठ सकते।
खंडपीठ ने कहा,
"संवैधानिक मूल्यों के संरक्षक संवैधानिक न्यायालय ही हैं।"
खंडपीठ ने आगे कहा कि जब कोई प्रमुख विपक्षी दल अपनी आशंकाओं के समर्थन में सबूतों के साथ अदालत का दरवाजा खटखटाता है तो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए न्यायिक समीक्षा की शक्ति को पूरी तरह से दबाया नहीं जा सकता।
खंडपीठ ने गौर किया कि YSRCP ने चुनाव प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही, राज्य चुनाव आयोग के समक्ष भौतिक (Physical) और इलेक्ट्रॉनिक, दोनों रूपों में अपनी और अपने उम्मीदवारों की ओर से शिकायतें/अभ्यावेदन (Representations) दर्ज कराए। इन सबूतों में कथित बाधाओं को दर्शाने वाले वीडियो क्लिप भी शामिल थे।
अदालत ने कहा,
"संवैधानिक लोकतंत्र को बनाए रखने के लिए चुनाव प्रक्रिया में भरोसा जगाना बहुत ज़रूरी है।"
अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि उसके सामने रखे गए पक्षों और अन्य सामग्रियों को देखते हुए YSRCP ने निर्देश जारी करने के लिए प्रथम दृष्टया एक मज़बूत मामला पेश किया।
इसके अनुसार, अदालत ने आंध्र प्रदेश राज्य चुनाव आयोग से कहा कि वह नामांकन की समय-सीमा बढ़ाने की पार्टी की मांग पर विचार करे, और उम्मीदवारों की अंतिम सूची के प्रकाशन को 23 अक्टूबर तक के लिए टाल दिया।
अदालत ने कहा:
"स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान का एक बुनियादी ढांचा हैं। ऐसे चुनावों में नामांकन दाखिल करके भाग लेने का अधिकार, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया का ही एक हिस्सा है। हालांकि, संविधान के तहत राज्य चुनाव आयोग को ऐसे चुनाव कराने और उनकी निगरानी करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई - जिसमें उम्मीदवारों द्वारा नामांकन पत्र स्वतंत्र और पारदर्शी तरीके से दाखिल करना सुनिश्चित करने के सभी कदम शामिल हैं - लेकिन चुनाव प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए संवैधानिक अदालतों की 'न्यायिक समीक्षा' (जुडिशियल रिव्यू) करने की शक्ति को पूरी तरह से बेकार या अर्थहीन नहीं माना जा सकता..."
खंडपीठ ने कहा कि वह चुनाव कराने के मामले में राज्य चुनाव आयोग (SEC) की शक्तियों के प्रति न्यायिक सम्मान (जुडिशियल डेफरेंस) रखने की बात से पूरी तरह अवगत है।
खंडपीठ ने कहा,
"संयम की यह सोच इस जरूरत से उपजी है कि चुनाव प्रक्रिया एक स्वतंत्र संवैधानिक प्राधिकरण के हाथों में और एक तय समय-सीमा के भीतर होनी चाहिए, न कि न्यायिक हस्तक्षेप के जंजाल में फंसी रहे। लेकिन, साथ ही इस बात को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि संवैधानिक मूल्यों के संरक्षक संवैधानिक न्यायालय हैं। जब कोई मुख्य विपक्षी दल हमारे सामने आकर, चुनाव प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही, नामांकन पत्र दाखिल करने में बाधा आने की गंभीर आशंकाएं जताते हुए अपनी बात और सबूत पेश करता है तो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए 'न्यायिक समीक्षा' (Judicial Review) की शक्ति को पूरी तरह से दबाया नहीं जा सकता। संवैधानिक लोकतंत्र को बनाए रखने के लिए चुनाव प्रक्रिया में भरोसा जगाना बहुत जरूरी है। हालांकि संवैधानिक न्यायालय आमतौर पर चुनाव प्रक्रिया में दखल नहीं देते, लेकिन जब स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों को असंवैधानिक या गैर-कानूनी तरीकों से दूषित होने से बचाने के लिए हस्तक्षेप करना जरूरी हो तो उनके हाथ बंधे हुए नहीं होते। इन सिद्धांतों और हमारे सामने पेश किए गए सबूतों को ध्यान में रखते हुए—जिनमें याचिकाकर्ता दल और उम्मीदवारों द्वारा SEC (राज्य चुनाव आयोग) के समक्ष भौतिक और इलेक्ट्रॉनिक रूप में दिए गए आवेदन, और वीडियो क्लिपिंग जैसे इलेक्ट्रॉनिक सबूत शामिल हैं—हमारी राय है कि याचिकाकर्ता ने निर्देश जारी करने के लिए प्रथम दृष्टया (prima facie) एक मजबूत मामला पेश किया।"
Case Title : YUVAJANA SRAMIKA RYTHU CONGRESS PARTY Versus THE STATE OF ANDHRA PRADESH AND ORS