Consumer Protection Act | बैंक में जमा रखना 'व्यावसायिक उद्देश्य' नहीं, सिर्फ इसलिए कि उस पर ब्याज मिलता है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (19 मार्च) को कहा कि बैंक में जमा राशि पर सिर्फ ब्याज मिलने से ही कोई लेन-देन अपने-आप "व्यावसायिक" नहीं हो जाता, जिससे किसी व्यक्ति को "उपभोक्ता" की परिभाषा से बाहर रखा जा सके; बल्कि, यह जांचना ज़रूरी है कि क्या जमा राशि का किसी लाभ कमाने वाली गतिविधि से कोई करीबी और सीधा संबंध है।
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने साफ किया कि बैंक में अतिरिक्त पैसे जमा करना, सिर्फ इसलिए 'व्यावसायिक उद्देश्य' नहीं माना जाएगा, क्योंकि उस पर ब्याज मिलता है। बल्कि, जब जमा राशि का इस्तेमाल व्यावसायिक लेन-देन को बढ़ावा देने या क्रेडिट सुविधा और बैंकिंग सेवाओं का लाभ उठाने के लिए किया जाता है, तब ऐसी जमा राशि को 'व्यावसायिक उद्देश्य' के लिए इस्तेमाल किया गया माना जा सकता है।
कोर्ट ने कहा,
"सामान्य तौर पर किसी कॉर्पोरेट संस्था द्वारा बैंक में अतिरिक्त पैसे जमा करना—चाहे सुरक्षित रखने के लिए हो या कानूनी नियमों का पालन करने के लिए—व्यावसायिक उद्देश्य को नहीं दर्शाता है। खासकर इसलिए, क्योंकि आमतौर पर बैंक में सभी जमा राशियों पर ब्याज मिलता है। इसलिए यह मानना बहुत ही नासमझी होगी कि चूंकि जमा राशि पर ब्याज मिला, इसलिए बैंकिंग सेवा का लाभ व्यावसायिक उद्देश्य के लिए उठाया गया। हालांकि, स्थिति तब अलग होगी जब जमा राशि का इस्तेमाल किसी क्रेडिट सुविधा का लाभ उठाने के लिए, या व्यावसायिक उपयोग के लिए अन्य बैंकिंग सेवाओं का लाभ उठाने के लिए किया गया हो। बाद वाली तरह की जमा राशि को व्यावसायिक उद्देश्य के लिए बैंकिंग सेवाओं का लाभ उठाना माना जा सकता है।"
यह मामला एक सरकारी उपक्रम और विजया बैंक के बीच 2014 में की गई ₹9 करोड़ की फिक्स्ड डिपॉज़िट (FD) से जुड़े विवाद से शुरू हुआ था।
अपील करने वाले सरकारी उपक्रम ने आरोप लगाया कि बैंक ने धोखाधड़ी करके बिना किसी अधिकार के किसी तीसरे पक्ष को उसकी फिक्स्ड डिपॉज़िट रसीद (FDR) के बदले ओवरड्राफ्ट सुविधा का लाभ उठाने की अनुमति दी थी। बाद में बैंक ने ओवरड्राफ्ट को बंद करने के लिए FDR की मैच्योरिटी पर मिलने वाली राशि को समायोजित कर लिया और अपील करने वाले को सिर्फ़ लगभग ₹50 लाख ही वापस किए।
इससे नाराज़ होकर अपील करने वाला राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) के पास गया, जिसने इस शिकायत को यह कहते हुए खारिज किया कि यह लेन-देन व्यावसायिक उद्देश्य के लिए था। इस विवाद में धोखाधड़ी से जुड़े ऐसे जटिल सवाल शामिल थे जो उपभोक्ता मामलों की सुनवाई के लिए उपयुक्त नहीं थे।
जस्टिस मिश्रा द्वारा लिखे गए फैसले में NCDRC के इस व्यापक तर्क से असहमति जताई गई कि जमा राशि पर ब्याज मिलना अपने-आप में एक व्यावसायिक गतिविधि है। कोर्ट ने माना कि डिपॉज़िट सुरक्षित कस्टडी, कानूनी नियमों का पालन करने, या फंड को कुछ समय के लिए रखने के लिए किए जा सकते हैं; सिर्फ़ ब्याज मिलने से यह साबित नहीं होता कि इसका मकसद मुनाफ़ा कमाना था।
इसके बजाय कोर्ट ने "मुख्य मकसद की जांच" (Dominant Purpose Test) पर ज़ोर दिया, जिसके तहत किसी भी लेन-देन की प्रकृति का आकलन उसके प्राथमिक उद्देश्य के आधार पर किया जाना चाहिए।
कोर्ट ने कहा,
"यह देखना ज़रूरी है कि लेन-देन का मुख्य इरादा या मुख्य मकसद क्या है - यानी, क्या इसका मकसद खरीदार(रों) और/या उनके लाभार्थियों के लिए किसी तरह का मुनाफ़ा कमाना है। अगर यह पाया जाता है कि सामान या सेवाओं को खरीदने का मुख्य मकसद खरीदार द्वारा उनका निजी इस्तेमाल और उपभोग करना है। वे किसी भी तरह से किसी व्यावसायिक गतिविधि से जुड़े नहीं हैं तो यह सवाल उठाने की ज़रूरत नहीं है कि क्या ऐसी खरीद स्वरोज़गार के माध्यम से आजीविका कमाने के लिए की गई। हालांकि, जहां लेन-देन किसी व्यावसायिक मकसद के लिए किया गया हो, वहां यह विचार करना पड़ सकता है कि क्या यह स्वरोज़गार के माध्यम से आजीविका कमाने के लिए है या नहीं।"
हालांकि, कोर्ट ने NCDRC द्वारा शिकायत खारिज किए जाने के फ़ैसले को इस आधार पर सही ठहराया कि इसमें धोखाधड़ी से जुड़े जटिल आरोप शामिल थे। कोर्ट ने माना कि आरोपों की प्रकृति - जिसमें धोखाधड़ी, जालसाज़ी, और फिक्स्ड डिपॉज़िट को बिना अनुमति के गिरवी रखना शामिल था - के लिए सबूतों की विस्तृत जांच की ज़रूरत थी, जो उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत संक्षिप्त कार्यवाही में संभव नहीं है।
अपील खारिज करते हुए कोर्ट ने माना कि हालाँकि "व्यावसायिक मकसद" पर NCDRC का तर्क त्रुटिपूर्ण था, फिर भी विवाद की प्रकृति को देखते हुए शिकायत को सही ही खारिज किया गया।
Cause Title: SANT ROHIDAS LEATHER INDUSTRIES AND CHARMAKAR DEVELOPMENT CORPORATION LTD. VERSUS VIJAYA BANK