देरी की माफ़ी को अधिकार नहीं माना जा सकता, यह पूरी तरह कोर्ट का फ़ैसला: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-02-16 15:53 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि देरी की माफ़ी को अधिकार नहीं माना जा सकता और यह पूरी तरह से कोर्ट का फ़ैसला है।

कोर्ट ने यह बात ओडिशा राज्य की स्पेशल लीव पिटीशन को टाइम-बार खत्म होने के कारण खारिज करते हुए कही।

अपने फ़ैसले में कोर्ट ने ओडिशा राज्य की चार महीने की काफ़ी देरी से टाइम-बार खत्म हो चुकी अपील दायर करने में सुस्त रवैये के लिए खिंचाई की। साथ ही राज्य की माफ़ी की अर्ज़ी खारिज की, जो ऊपर के अधिकारियों से मंज़ूरी लेने में प्रोसेस में देरी के कमज़ोर और आम बहाने पर आधारित थी।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने कहा,

“हमने पाया कि ओडिशा राज्य न सिर्फ़ हाई कोर्ट के सामने बल्कि इस कोर्ट के सामने भी पूरी तरह से सुस्त, ढिलाई बरतने वाला और आलसी है। हाईकोर्ट ने उसकी अपील को टाइम-बार्ड बताकर खारिज किया था। फिर भी ओडिशा राज्य ने लिमिटेशन पीरियड खत्म होने के चार महीने बाद इस कोर्ट में अपील की।”

राज्य ने जब माफ़ी मांगने में देरी को सही ठहराने की यह कहते हुए कोशिश की कि अपील फाइल करने में देरी अनजाने में हुई और जानबूझकर नहीं, क्योंकि हायर अथॉरिटी से अप्रूवल लेने में प्रोसेस से जुड़ी देरी हुई, तो कोर्ट ने उनके कारणों को यह कहते हुए खारिज कर दिया, “हमारी साफ़ राय है कि ओडिशा राज्य द्वारा यहां दिखाया गया कारण कोई एक्सप्लेनेशन नहीं बल्कि एक बेकार बहाना है।”

बेंच उस केस की सुनवाई कर रही थी, जिसमें ओडिशा राज्य ने हाईकोर्ट के ऑर्डर को चुनौती देने की कोशिश की थी, जिसने स्टेट एजुकेशन ट्रिब्यूनल के उस ऑर्डर को कन्फर्म किया, जिसमें राज्य को स्कूल के टीचिंग और नॉन-टीचिंग स्टाफ के पक्ष में बताए गए तरीके से ग्रांट-इन-एड जारी करने का निर्देश दिया गया। ट्रिब्यूनल के 2013 के ऑर्डर को 2 साल की देरी से चैलेंज किया गया।

हाईकोर्ट के ऑर्डर के खिलाफ राज्य ने 123 दिनों की देरी से SLP दायर की और कमियों को ठीक करने के बाद इसे दोबारा फाइल करने में 96 दिनों की और देरी हुई।

लिमिटेशन एक्ट के अनुसार, हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील आम तौर पर 90 दिनों के अंदर सुप्रीम कोर्ट में फाइल करनी होती है, जब तक कि लिमिटेशन एक्ट, 1963 की धारा 5 के तहत अपील फाइल करने में देरी को माफ न कर दिया जाए।

हाईकोर्ट के फैसले को कन्फर्म करते हुए बेंच ने राज्य की सुस्ती और देरी को सही ठहराने के उसके बेकार बहानों का हवाला देते हुए देरी को माफ करने से इनकार किया।

पहले के उदाहरणों का ज़िक्र करते हुए कोर्ट ने राज्य की अपील खारिज करते हुए कहा:

“देरी की माफ़ी को अधिकार के तौर पर नहीं कहा जा सकता। देरी की माफ़ी देना या न देना पूरी तरह से कोर्ट की मर्ज़ी पर है।”

कोर्ट ने न्यायिक नज़रिए के विकास का भी पता लगाया, जो पहले तकनीकी बातों पर ज़्यादा न्याय दिलाने के लिए राज्य की अपीलों में देरी को माफ़ करने में एक उदार रुख अपनाता था, अब एक ज़्यादा सख़्त रुख अपनाता है, जो कानूनी लिमिटेशन पीरियड का सख्ती से पालन करने पर ज़ोर देता है, जिसका अक्सर उल्लंघन होता है।

बेंच ने कहा कि कलेक्टर, लैंड एक्विजिशन, अनंतनाग बनाम एमएसटी काटिजी, (1987) 2 SCC 107 और जी. रामेगौड़ा बनाम लैंड एक्विजिशन ऑफिसर, (1988) 2 SCC 142 जैसे फैसलों में 'राज्य' द्वारा देरी की माफ़ी मांगने के मामलों को 'प्राइवेट पार्टी' से अलग बताते हुए एक उदार और न्याय पर आधारित नज़रिया अपनाया गया।

साथ ही खंडपीठ ने पिछले डेढ़ दशक के दौरान देरी की माफी के आवेदनों से निपटने के दौरान उदार दृष्टिकोण से एक अलग और सख्त दृष्टिकोण की ओर बदलाव दर्ज किया, जो पोस्टमास्टर जनरल बनाम लिविंग मीडिया इंडिया लिमिटेड, (2012) 3 एससीसी 563 के फैसले से शुरू होकर स्पष्ट हुआ, जहां संबंधित विशेष अनुमति याचिका दायर करने में 427 दिनों की देरी को माफ नहीं किया गया। इसके अलावा, दिल्ली विश्वविद्यालय बनाम भारत संघ, (2020) 13 एससीसी 745 (इस न्यायालय की तीन-जजों की पीठ के) के अन्य मामले में न्यायालय ने दर्ज किया कि 916 दिनों की देरी को माफ नहीं किया गया।

खंडपीठ ने कमिश्नर ऑफ वेल्थ टैक्स, बॉम्बे बनाम एमेच्योर राइडर्स क्लब, बॉम्बे, 1994 सप (2) एससीसी 603 के फैसले का उल्लेख करते हुए इसे क्लासिक उदाहरण के रूप में वर्णित किया, जहां कोर्ट ने अपील दायर करने में राजस्व अधिकारियों की ओर से तत्परता की कमी की कड़ी निंदा की। पूर्व CJI एम. एन. वेंकटचलैया के लिखे ऑर्डर में रेवेन्यू डिपार्टमेंट को देर से अपील करने के लिए फटकार लगाई गई। साथ ही कहा गया कि ऐसी देरी से आखिरकार डिपार्टमेंट के अपने फायदे कम होते हैं। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि जब कोई सरकारी केस करने वाला खुद ब्यूरोक्रेटिक उदासीनता और बेपरवाही का दोषी हो तो कोर्ट उसकी मदद करने में नाकाम रहते हैं।

कोर्ट ने एमेच्योर राइडर्स क्लब (ऊपर) में कहा,

“कोर्ट भी केस करने वाले की मदद नहीं कर सकती, भले ही केस करने वाला सरकार ही क्यों न हो, जो खुद ब्यूरोक्रेटिक उदासीनता की बेड़ियों में जकड़ी हुई है।”

बेंच ने इस मामले में आगे लिखा,

“यह बिल्कुल साफ़ है कि कातिजी (सुप्रा) के बाद रामेगौड़ा (सुप्रा) में कानून इस उम्मीद के साथ बनाया गया कि हालात सुधरेंगे। हालांकि, लॉर्डशिप को ऐसी उम्मीद के लिए कोई साफ़ सपोर्ट नहीं मिला और कोर्ट के सब्र की आखिरी हद तक परीक्षा होने के बाद उन्होंने माना कि एक ऐसी बात है जिसके आगे कोर्ट भी किसी केस में मदद नहीं कर सकती, भले ही ब्यूरोक्रेटिक बेपरवाही की बेड़ियों में जकड़ा केस लड़ने वाला केस सरकार ही क्यों न हो।”

इसके साथ ही अपील खारिज कर दी गई।

Cause Title: STATE OF ODISHA & ORS. VERSUS MANAGING COMMITTEE OF NAMATARA GIRLS HIGH SCHOOL

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