'हाईकोर्ट कॉलेजियम को निर्देश नहीं दिया जा सकता': सुप्रीम कोर्ट ने प्रमोशन की मांग करने वाले न्यायिक अधिकारी की याचिका पर सुनवाई से इनकार किया

Update: 2026-06-22 07:15 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (22 जून) को हिमाचल प्रदेश के न्यायिक अधिकारी की रिट याचिका पर सुनवाई करने से इनकार किया। अधिकारी ने हाईकोर्ट में प्रमोशन के लिए अपने नाम पर विचार करने की मांग की थी। कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि हाई कोर्ट कॉलेजियम को कोई न्यायिक निर्देश नहीं दिया जा सकता।

याचिकाकर्ता अरविंद मल्होत्रा अभी धर्मशाला में फैमिली कोर्ट के प्रिंसिपल जज हैं। उनकी शिकायत थी कि हाई कोर्ट कॉलेजियम ने उनके जूनियर्स के नाम आगे बढ़ाए, जिन्हें बाद में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने मंज़ूरी दी।

याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट बलबीर सिंह ने तर्क दिया कि सितंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट कॉलेजियम को याचिकाकर्ता और एक अन्य जज के नामों पर फिर से विचार करने का निर्देश दिया था। हालामकि, याचिकाकर्ता के मामले में ऐसा नहीं किया गया।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने इस तर्क को मानने से इनकार किया। उन्होंने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कुछ नहीं है, जिससे पता चले कि हाईकोर्ट कॉलेजियम ने याचिकाकर्ता का नाम खारिज कर दिया। सिंह ने जवाब दिया कि सितंबर 2025 में याचिकाकर्ता को बातचीत के लिए बुलाया गया और कुछ दस्तावेज़ जमा करने को कहा गया। हालांकि, मई में हाईकोर्ट कॉलेजियम ने उनके जूनियर्स के नाम सुप्रीम कोर्ट को भेज दिए।

जब जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि याचिकाकर्ता का नाम अभी खारिज नहीं किया गया तो सिंह ने कहा कि प्रमोट होने वाले जजों की दो मौजूदा वैकेंसी के लिए जूनियर्स की सिफारिश की गई।

सिंह ने कहा,

"आप मुझे इंटरव्यू के लिए बुलाते हैं और दस्तावेज़ देने के लिए 7 दिन का समय देते हैं। उसका इंतज़ार किए बिना ही आप सिफारिश कर देते हैं और मेरे नाम पर बिना विचार किए उसे नज़रअंदाज़ कर देते हैं।"

जस्टिस नागरत्ना ने कहा,

"कृपया इंतज़ार करें, देखते हैं कि वहां का (हाईकोर्ट) कॉलेजियम क्या करता है। हो सकता है कि आपकी उम्मीदवारी खारिज न हो।"

उन्होंने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता की सेवा के अभी दस साल बाकी हैं और भविष्य में वैकेंसी आएंगी।

जस्टिस नागरत्ना ने आगे कहा कि ये मामले कॉलेजियम की अपनी समझ और संतुष्टि पर निर्भर करते हैं। साथ ही इन पर कोई न्यायिक समीक्षा नहीं हो सकती।

जस्टिस नागरत्ना ने कहा,

"वैसे भी, ये ऐसे मामले हैं, जिनमें आखिर में हाईकोर्ट के कॉलेजियम की अपनी समझ और संतुष्टि मायने रखती है। क्या सुप्रीम कोर्ट न्यायिक पक्ष से कॉलेजियम से कह सकता है कि आप यह करें, वह करें, या किसी का नाम चुनें? ऐसा नहीं किया जा सकता। यह अधिकार क्षेत्र से बाहर है।"

जज ने आगे कहा,

"हम इस चरण पर हाईकोर्ट कॉलेजियम और सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की कार्यवाही को लेकर कोई नई मुश्किल या विवाद (Pandora's box) शुरू नहीं करना चाहते।"

जब सिंह ने कहा कि याचिकाकर्ता राज्य में सबसे सीनियर अधिकारी हैं, तो जस्टिस नागरत्ना ने कहा,

"सिर्फ इसलिए कि आप सीनियरिटी में ऊपर हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि आपकी सिफारिश की ही जाएगी।"

जस्टिस बागची ने बताया कि हाईकोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश को अब सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने मंज़ूरी दी, इसलिए याचिकाकर्ता अब हाई कोर्ट कॉलेजियम के फ़ैसले को चुनौती नहीं दे सकते।

आगे कहा गया,

"हम समझ सकते हैं अगर हाईकोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश पहले दिए गए न्यायिक आदेश के मुताबिक नहीं होती। लेकिन अब उस पर सुप्रीम कोर्ट की सिफारिश लागू हो गई। इसलिए आज जो कार्रवाई हो सकती है, वह हाई कोर्ट की सिफारिश पर नहीं होगी।"

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि कॉलेजियम की चर्चाएं "गोपनीय" होती हैं और बैठकों में क्या हुआ, यह बताने के लिए कोई न्यायिक निर्देश नहीं दिया जा सकता।

जस्टिस नागरत्ना ने सिंह से कहा,

"ये सभी गोपनीयता के मामले हैं। कॉलेजियम से यह सरकार के पास जाता है और एक कॉपी इस कोर्ट के कॉलेजियम के पास आती है। हम न्यायिक पक्ष से कैसे दखल दे सकते हैं? हमें नहीं पता कि उनके नाम को टाला गया या उस पर फिर से विचार किया जा रहा है। आप थोड़ा सब्र रखें और इंतज़ार करें।"

बेंच ने दोहराया कि याचिकाकर्ता के पास कार्रवाई का कोई आधार (cause of action) नहीं है। कर्नाटक हाईकोर्ट में अपने अनुभव का ज़िक्र करते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि खाली पदों की संख्या से तीन गुना ज़्यादा जजों को बुलाया जाता है।

जस्टिस नागरत्ना ने कहा,

"अगर 3 खाली पद हैं और नौ लोगों को बुलाया जाता है तो जिन लोगों की सिफारिश नहीं होती, उनके पास कार्रवाई का कोई आधार नहीं होता।"

सिंह ने फिर से कहा कि मुद्दा यह था कि क्या हाई कोर्ट कॉलेजियम सुप्रीम कोर्ट के सितंबर 2024 के निर्देश का पालन कर रहा है या नहीं।

जस्टिस बागची ने फिर कहा कि अब इसमें कोई दखल नहीं दिया जा सकता क्योंकि हाईकोर्ट कॉलेजियम के प्रस्ताव को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की मंज़ूरी मिल चुकी है। इसलिए जस्टिस बागची ने कहा कि चुनौती सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के फ़ैसले को दी जानी चाहिए थी।

बेंच ने याचिकाकर्ता को याचिका वापस लेने की सलाह दी। इसके बाद सिंह ने अनुरोध किया कि याचिकाकर्ता के ख़िलाफ़ शुरू की गई किसी भी अनुशासनात्मक कार्रवाई को एक तय समय-सीमा के भीतर पूरा किया जाए। उन्होंने बताया कि याचिकाकर्ता ने जानकारी पाने के लिए RTI आवेदन दायर किया है। बेंच ने कहा कि वह याचिकाकर्ता के लिए कानूनी रास्ते खुले रखेगी, बिना इस पर कोई टिप्पणी किए।

इस मामले का निपटारा इन बातों के साथ किया गया:

"याचिकाकर्ता के सीनियर वकील की दलीलें विस्तार से सुनी गईं। हमने याचिकाकर्ता की दलीलों और उनके द्वारा मांगी गई राहत पर विचार किया। याचिकाकर्ता के सीनियर वकील ने कहा कि याचिकाकर्ता भारत के संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर रिट याचिका पर आगे नहीं बढ़ेंगे, लेकिन उन्हें हाईकोर्ट के सक्षम अधिकारी के सामने प्रशासनिक या न्यायिक पक्ष पर उचित राहत या उपाय मांगने की छूट दी जाए। याचिकाकर्ता के सीनियर वकील की बात रिकॉर्ड पर ले ली गई। इसी के साथ मामले का निपटारा किया जाता है।"

बता दें, 3 जून को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने हाई कोर्ट में पदोन्नति के लिए न्यायिक अधिकारियों चिराग भानु सिंह, भूपेश शर्मा और योगेश जसवाल के नामों की सिफारिश की थी।

2024 में दो जिला जजों (चिराग भानु सिंह और मौजूदा याचिकाकर्ता अरविंद मल्होत्रा) ने सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर की थी। उनका तर्क था कि हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट कॉलेजियम ने हाईकोर्ट में पदोन्नति के लिए नामों की सिफारिश करते समय उनकी योग्यता और वरिष्ठता को नजरअंदाज किया। सितंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका स्वीकार की और हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से उनके नामों पर फिर से विचार करने का अनुरोध किया।

Case : ARVIND MALHOTRA v. HIGH COURT OF HIMACHAL PRADESH | Diary no. 36875/2026

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