साक्ष्य अधिनियम की धारा 65 के सर्टिफिकेट के बिना कॉल डिटेल रिकॉर्ड मान्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-03-11 11:00 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के एक मामले में दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति को बरी किया। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) को सबूत के तौर पर तब तक नहीं माना जा सकता, जब तक उनके साथ भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act) की धारा 65-B के तहत अनिवार्य सर्टिफिकेट न हो।

जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने कहा,

"...साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-B [BSA की धारा 63] के तहत सर्टिफिकेट को अभियोजन पक्ष साबित नहीं कर पाया। साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-B [BSA की धारा 63] के तहत अनिवार्य रूप से ज़रूरी सर्टिफिकेट के अभाव में कॉल डिटेल रिकॉर्ड सबूत के तौर पर अमान्य हो जाते हैं और अभियोजन पक्ष के मामले का समर्थन करने के लिए उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता।"

इसके टिप्पणी के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट का वह फैसला रद्द किया, जिसमें दोषसिद्धि बरकरार रखी गई थी।

यह मामला 2010 में एक महिला की हत्या से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि पीड़िता के पति ने इस अपराध को अंजाम देने के लिए अपीलकर्ता के साथ साज़िश रची थी। इस कथित साज़िश को साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष ने कॉल डिटेल रिकॉर्ड पर भरोसा किया, जिसमें घटना के समय के आसपास दोनों आरोपियों के बीच बार-बार संपर्क होने की बात सामने आई।

हालांकि, अपीलकर्ता ने इन इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की स्वीकार्यता को चुनौती दी। उसने तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-B (4) के तहत अनिवार्य सर्टिफिकेट पेश करने में विफल रहा, जो इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को प्रमाणित करने के लिए ज़रूरी होता है।

अपीलकर्ता के तर्क में दम पाते हुए जस्टिस मेहता द्वारा लिखे गए फैसले में यह टिप्पणी की गई कि इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को साक्ष्य के तौर पर स्वीकार्य बनाने के लिए सर्टिफिकेट पेश करना अनिवार्य है।

कोर्ट ने कहा,

"...इस कोर्ट ने 'अर्जुन पंडितराव खोतकर बनाम कैलाश कुशनराव गोरंत्याल' मामले में 'अनवर P.V.' (उपरोक्त) मामले में तय की गई स्थिति की फिर से पुष्टि की और उसे स्पष्ट किया। कोर्ट ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक सबूतों की स्वीकार्यता के लिए साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-B [BSA की धारा 63] के तहत सर्टिफिकेट की ज़रूरत अनिवार्य है और इसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।"

राज्य के इस तर्क को खारिज करते हुए कि यह ज़रूरत पूरी हो गई थी क्योंकि टेलीकॉम कंपनियों के नोडल अधिकारियों से गवाह के तौर पर पूछताछ की गई, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मौखिक गवाही वैधानिक सर्टिफिकेट की जगह नहीं ले सकती।

कोर्ट ने अर्जुन पंडितराव खोतकर (उपरोक्त) मामले में कहा था,

“ऐसे सर्टिफ़िकेट की जगह मौखिक गवाही काफ़ी नहीं हो सकती, क्योंकि धारा 65-B(4) कानून की एक ज़रूरी शर्त है।”

कोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ता पूरनमल के ख़िलाफ़ मामला पूरी तरह से परिस्थितिजन्य सबूतों पर आधारित था, जैसे: कॉल डिटेल रिकॉर्ड, जिनसे आरोपियों के बीच संपर्क का पता चलता है; खून से सनी एक शर्ट की बरामदगी, जिसका ब्लड ग्रुप कथित तौर पर मृतक के ब्लड ग्रुप से मेल खाता था और 46,000 रुपये की बरामदगी, जो कथित तौर पर उसे हत्या करने के लिए दिए गए।

पैसे की बरामदगी पर संदेह

कोर्ट ने अपीलकर्ता के घर से कथित तौर पर बरामद हुए 46,000 रुपये के संबंध में भी गंभीर विसंगतियां पाईं।

हालांकि अभियोजन पक्ष ने दावा किया कि 46,000 रुपये आरोपी के बयान के आधार पर बरामद किए गए, लेकिन कोर्ट में गिने जाने पर यह रकम 46,145 रुपये निकली, जिससे बरामदगी की असलियत पर ही संदेह पैदा हो गया।

कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि वैसे भी सिर्फ़ नोटों की बरामदगी को, जब तक कि उन्हें अपराध से जोड़ने वाला कोई सबूत न हो, आरोपी के ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं माना जा सकता।

FSL रिपोर्ट को अविश्वसनीय माना गया

कोर्ट ने आरोपी से कथित तौर पर बरामद हुई खून से सनी शर्ट पर भरोसा करने से भी इनकार किया।

कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष ज़ब्त की गई चीज़ों को फ़ॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) भेजने से पहले, उनकी सुरक्षा और देखरेख की अटूट कड़ी (chain of custody) साबित करने में नाकाम रहा।

पुलिस गवाहों की गवाही और मालखाना रजिस्टर में दर्ज विवरणों में मिली विसंगतियों से पता चला कि सैंपल दोबारा भेजे जाने से पहले एक बार बाहर भेजे गए और फिर वापस आ गए। फिर इस वापसी का कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।

सुरक्षा और देखरेख की कड़ी टूटने के कारण कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि FSL रिपोर्ट अब “बेकार और कागज़ का एक टुकड़ा मात्र” रह गई।

शरद बिरदीचंद सारडा बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में परिस्थितिजन्य सबूतों पर आधारित मामलों के लिए तय किए गए सिद्धांतों को दोहराते हुए कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि अभियोजन पक्ष परिस्थितियों की ऐसी पूरी कड़ी साबित करने में नाकाम रहा, जो सिर्फ़ आरोपी के अपराध की ओर ही इशारा करती हो।

तदनुसार, कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और राजस्थान हाईकोर्ट के फ़ैसलों को रद्द किया, अपीलकर्ता को सभी आरोपों से बरी किया और निर्देश दिया कि यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो तो उसे तुरंत हिरासत से रिहा कर दिया जाए।

Cause Title: POORANMAL VERSUS THE STATE OF RAJASTHAN & ANR.

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