'JAO, IT री-असेसमेंट नोटिस जारी नहीं कर सकते': सुप्रीम कोर्ट ने Finance Act 2026 के आधार पर रद्द किए हाईकोर्ट के फ़ैसले
एक अहम घटनाक्रम में सुप्रीम कोर्ट ने Income-tax Act, 1961 के तहत री-असेसमेंट नोटिस जारी करने के अधिकार से जुड़े मुद्दे पर नए सिरे से विचार करने के लिए हज़ारों टैक्स अपीलों को संबंधित हाईकोर्ट्स को वापस भेज दिया। Finance Act, 2026 द्वारा किए गए संशोधन पर ध्यान देते हुए—जो यह साफ़ करता है कि ऐसे अधिकार Jurisdictional Assessing Officers (JAO) के पास होते हैं, न कि फ़ेसलेस यूनिट्स के पास—कोर्ट ने इस मामले पर मेरिट के आधार पर फ़ैसला न करने का फ़ैसला किया। इसके बजाय High Courts को निर्देश दिया कि वे बदली हुई कानूनी स्थिति की रोशनी में इस मुद्दे की दोबारा जांच करें।
यह विवाद पारंपरिक री-असेसमेंट ढांचे और 2021 के बाद शुरू की गई फ़ेसलेस असेसमेंट व्यवस्था के बीच के टकराव से पैदा हुआ था।
जहा कुछ हाईकोर्ट्स ने Jurisdictional Assessing Officers (JAO) के री-असेसमेंट नोटिस जारी करने के अधिकार को सही ठहराया, वहीं दूसरों ने यह माना कि फ़ेसलेस योजनाओं की शुरुआत के बाद केवल नामित फ़ेसलेस अधिकारी ही ऐसे अधिकारों का इस्तेमाल कर सकते हैं। इस मतभेद के कारण बड़े पैमाने पर मुक़दमेबाज़ी हुई और कई अधिकार क्षेत्रों में री-असेसमेंट नोटिस रद्द कर दिए गए।
इन अपीलों के लंबित रहने के दौरान, संसद ने Finance Act, 2026 पारित किया, जिसमें Income-tax Act में धारा 147A को 1 अप्रैल, 2021 से पिछली तारीख़ से (Retrospective Effect) लागू करते हुए जोड़ा गया।
यह नया प्रावधान साफ़ करता है कि री-असेसमेंट प्रावधानों के उद्देश्य से "Assessing Officer" शब्द का मतलब फ़ेसलेस असेसमेंट यूनिट्स—जैसे कि National Faceless Assessment Centre—के अलावा कोई अन्य अधिकारी है। इस संशोधन में एक व्यापक 'non-obstante clause' (अधिभावी खंड) भी शामिल है, जो पिछले न्यायिक फ़ैसलों और वैधानिक योजनाओं को अधिभावी (Override) करता है।
इस विधायी घटनाक्रम पर ध्यान देते हुए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस ज्योमाल्या बागची की पीठ ने इस चरण पर प्रतिस्पर्धी कानूनी स्थितियों की मेरिट या पिछली तारीख़ से किए गए संशोधन की वैधता पर फ़ैसला करने से इनकार किया।
इसके बजाय, इसने यह देखते हुए एक सीमित और प्रक्रियात्मक दृष्टिकोण अपनाया कि हाईकोर्ट्स के फ़ैसलों का मूल आधार—यानी, JAO के अधिकार क्षेत्र की कथित कमी—अब संसद द्वारा बदल दिया गया। तदनुसार, कोर्ट ने इस सीमित आधार पर हाईकोर्ट के विवादित फ़ैसलों को रद्द किया और मामलों को नए सिरे से विचार करने के लिए संबंधित हाईकोर्ट्स को वापस भेज दिया।
कोर्ट ने कहा,
“चूंकि हाईकोर्ट्स ने मुख्य रूप से री-असेसमेंट नोटिस को इस आधार पर रद्द किया था कि JAOs के पास ऐसी कार्यवाही शुरू करने की क्षमता नहीं थी। उस विचार की मूल नींव अब संशोधन कानून द्वारा बदल दी गई, इसलिए करदाताओं के पक्ष में दिए गए विवादित फ़ैसलों को इस सीमित आधार पर रद्द किया जाता है। तदनुसार, मामलों को नए सिरे से विचार करने के लिए संबंधित हाईकोर्ट्स को वापस भेजा जाता है। तदनुसार आदेश दिया गया।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने धारा 147A की वैधता या दायरे पर कोई राय व्यक्त नहीं की। करदाताओं को नए प्रावधान को चुनौती देने के लिए अपनी याचिकाओं में संशोधन करने की स्वतंत्रता दी गई।
कोर्ट ने स्पष्ट किया,
“हम यह स्पष्ट करते हैं कि हमने विवाद के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की, जिसमें संशोधित प्रावधानों की वैधता, दायरा, प्रभाव, पूर्वव्यापीता या प्रयोज्यता शामिल है। ऐसे सभी प्रश्न हाई कोर्ट्स द्वारा तय किए जाने के लिए खुले रखे गए हैं।”
Case : Asst Commissioner of Income Tax v. Aristo Pharmaceuticals Private Ltd