कर्मचारी को हटाने वाला अधिकारी नियुक्ति करने वाले अधिकारी के बराबर पद का है तो आर्टिकल 311 के तहत रोक लागू नहीं होती: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के आर्टिकल 311(1) के तहत संवैधानिक सुरक्षा तभी लागू होती है, जब हटाने वाला अधिकारी, नियुक्ति करने वाले अधिकारी से निचले पद का हो। कोर्ट ने यह भी कहा कि कानूनी नियमों के तहत किसी निचले अधिकारी को अनुशासनात्मक शक्तियां सौंपने (डेलिगेशन) से संवैधानिक रोक लागू नहीं होती।
बता दें, आर्टिकल 311(1) किसी सिविल सेवक को उस अधिकारी द्वारा बर्खास्त या हटाने से रोकता है, जो उसकी नियुक्ति करने वाले अधिकारी से निचले पद का हो।
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट और पहली अपीलीय अदालत के उन फैसलों को रद्द करते हुए यह बात कही, जिनमें रेलवे प्रोटेक्शन स्पेशल फोर्स (RPSF) के एक 'रक्षक' को हटाने को असंवैधानिक माना गया था।
प्रतिवादी को मई 1979 में RPSF (गोरखपुर) के कमांडेंट ने एक कॉल लेटर जारी किया, जिसमें उसे 'रक्षक' के पद के लिए शुरुआती ट्रेनिंग के लिए रिपोर्ट करने को कहा गया। कॉल लेटर में उसकी नियुक्ति को स्पष्ट रूप से ट्रेनिंग सफलतापूर्वक पूरी करने की शर्त पर रखा गया। ट्रेनिंग पूरी होने पर दिसंबर 1979 में असिस्टेंट कमांडेंट ने एक बटालियन ऑर्डर जारी किया, जिसमें उसे और अन्य रिक्रूट्स को उस तारीख से 'रक्षक' के तौर पर नियुक्त किया गया और उनकी संबंधित बटालियनों में तैनाती की गई। बाद में फरवरी 1980 में एक और बटालियन ऑर्डर जारी कर दिसंबर 1979 की नियुक्ति की पुष्टि की गई।
बाद में प्रतिवादी अपनी मंजूर छुट्टी से 72 दिन ज़्यादा समय तक अनुपस्थित रहा। रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स रूल्स, 1959 के नियम 44 के तहत उसे चार्जशीट जारी की गई और एकतरफा विभागीय जांच के बाद एडजुटेंट ने मार्च 1983 में उसे सेवा से हटाने का आदेश जारी किया। उनकी विभागीय अपील 1984 में खारिज कर दी गई।
प्रतिवादी ने एक सिविल मुकदमे में अपनी बर्खास्तगी को चुनौती दी। उनका तर्क था कि चूंकि उन्हें 1979 के कॉल लेटर के ज़रिए कमांडेंट/चीफ सिक्योरिटी ऑफिसर ने नियुक्त किया, इसलिए एडजुटेंट द्वारा उनकी बर्खास्तगी अनुच्छेद 311(1) का उल्लंघन है, क्योंकि एडजुटेंट एक अधीनस्थ अधिकारी होता है। हालांकि ट्रायल कोर्ट ने मुकदमा खारिज किया, लेकिन पहली अपीलीय अदालत ने फैसले को पलट दिया और बर्खास्तगी को असंवैधानिक करार दिया। बाद में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी 2023 में दूसरी अपील में इस फैसले को बरकरार रखा।
हाईकोर्ट के फैसले से असंतुष्ट होकर, केंद्र सरकार (अपीलकर्ता) सुप्रीम कोर्ट पहुंची।
Case: Union of India & Ors v Ramdhani Prasad