Article 227 | हाईकोर्ट ट्रायल कोर्ट द्वारा विचार किए गए सबूतों का दोबारा मूल्यांकन नहीं कर सकते: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट के लिए संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत अपने सुपरवाइजरी अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए निचली अदालतों के फैसलों में दखल देना गलत है।
जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए यह बात कही, जिसमें हाईकोर्ट ने अपील कोर्ट का फैसले में दखल दिया था, जिसमें अपीलकर्ता को बेदखली के मुकदमे में संशोधन करने की इजाज़त दी गई थी।
बेंच ने कहा,
"यह बात अच्छी तरह से तय है कि इस तरह के अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते समय हाईकोर्ट के लिए उन सबूतों की समीक्षा या दोबारा मूल्यांकन करना सही नहीं होगा, जिन पर ट्रायल कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते समय विचार किया था।"
बेदखली के मुकदमे में संशोधन की मांग अपीलकर्ता (मकान मालिक के बेटे) ने की थी। वह बेदखली का एक और आधार जोड़ना चाहता था - 'वास्तविक ज़रूरत' (bonafide need) का आधार। यह आधार उसके पिता की मृत्यु के बाद सामने आई एक घटना पर आधारित था। उसके पिता ने ही मूल रूप से बेदखली का मुकदमा दायर किया, जिसमें उन्होंने अपने और अपने परिवार के सदस्यों के लिए घर की 'वास्तविक ज़रूरत' को आधार बनाया।
जहां ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता को मुकदमे में संशोधन करने की इजाज़त देने से मना किया, वहीं अपील कोर्ट ने मुकदमे में संशोधन की इजाज़त दी। इसके बाद किरायेदार ने अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।
हाईकोर्ट ने अपील कोर्ट के फैसलों में दखल दिया। उसने खुद अपील कोर्ट की तरह काम करते हुए मामले के गुण-दोष (merits) की जांच की और अपील कोर्ट के फैसले का दोबारा मूल्यांकन और समीक्षा की। इसी वजह से यह मामला सुप्रीम कोर्ट में अपील के तौर पर पहुंचा।
अपील मंज़ूर करते हुए जस्टिस चंदुरकर द्वारा लिखे गए फैसले में ज़ोर देकर यह कहा गया कि हाईकोर्ट को अपने अधिकार क्षेत्र को सिर्फ़ इस बात तक सीमित रखना चाहिए कि क्या ट्रायल कोर्ट ने कोई फैसला सुनाते समय अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया। इसके बजाय, हाईकोर्ट ने अपनी सुपरवाइजरी शक्तियों का गलत इस्तेमाल करते हुए खुद एक अपील कोर्ट की तरह काम किया और ट्रायल कोर्ट के फैसले का गुण-दोष के आधार पर दोबारा मूल्यांकन किया।
चूंकि, CPC (दीवानी प्रक्रिया संहिता) के आदेश VI नियम XVII के तहत मुकदमे में संशोधन की इजाज़त देने का अपील कोर्ट का अधिकार विवादित नहीं है, इसलिए हाईकोर्ट के लिए अपनी सुपरवाइजरी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए खुद एक अपील कोर्ट की तरह काम करना और ट्रायल कोर्ट के फैसलों का गुण-दोष के आधार पर दोबारा मूल्यांकन करना सही नहीं था।
कोर्ट ने यह निर्णय दिया,
"...अपीलीय पीठ द्वारा संशोधन की अनुमति देते समय जिस विवेकाधिकार का प्रयोग किया गया, उसमें भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हस्तक्षेप करना उचित नहीं था; विशेष रूप से तब, जब न तो अधिकार क्षेत्र संबंधी कोई त्रुटि थी और न ही बाद की घटनाओं के आधार पर वाद-पत्र में संशोधन की अनुमति देने पर कोई वैधानिक रोक है।"
इस संदर्भ में 'राज कुमार भाटिया बनाम सुभाष चंद्र भाटिया 2017 INSC 1240' मामले का हवाला दिया गया, जिसमें यह निर्णय दिया गया,
"अनुच्छेद 227 का दायरा केवल यह देखने तक सीमित है कि क्या किसी अधीनस्थ न्यायालय या अधिकरण ने अपने अधिकार क्षेत्र की सीमाओं के भीतर कार्य किया... हाईकोर्ट अपीलीय कोर्ट या अधिकरण के रूप में कार्य नहीं करता है, और उसके लिए उन साक्ष्यों की समीक्षा या पुनर्मूल्यांकन करना उचित नहीं है, जिनके आधार पर अधीनस्थ न्यायालय या अधिकरण ने कोई आदेश पारित किया।"
उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर अपील स्वीकार की गई।
Cause Title: VINAY RAGHUNATH DESHMUKH VERSUS NATWARLAL SHAMJI GADA RESPONDENTS AND ANOTHER