पार्टियों के बीच हुए और लागू हो चुके समझौते को बदलने के लिए आर्टिकल 142 का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-07-22 14:24 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के आर्टिकल 142 के तहत अपनी खास शक्तियों (Inherent Jurisdiction) का इस्तेमाल पार्टियों के बीच आपसी सहमति से हुए समझौतों की शर्तों को बदलने या उनमें संशोधन करने के लिए नहीं किया जा सकता।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने एक पत्नी की याचिका खारिज की। पत्नी ने अपने और अपने पति के बीच हुए तलाक के समझौते को फिर से तय करने के लिए संविधान के आर्टिकल 142 का इस्तेमाल करने की मांग की। कोर्ट ने अपील करने वाली पत्नी की उस मांग को मानने से इनकार किया, जिसमें उसने बेटे की उच्च शिक्षा के लिए एक बार के उपाय के तौर पर लगभग 6 करोड़ से 6.50 करोड़ रुपये का अतिरिक्त फंड बनाने की बात कही थी।

कोर्ट ने कहा,

"इसके नतीजे के तौर पर भारत के संविधान के आर्टिकल 142 के तहत शक्तियों का इस्तेमाल करके बेटे की उच्च शिक्षा के लिए फंड बनाने की मांग को नहीं माना जा सकता। ऐसा निर्देश देने का मतलब असल में उस समझौते को फिर से बनाना होगा, जो पहले ही पूरा और लागू हो चुका है। साथ ही गुजारा-भत्ते (मेंटेनेंस) की रकम को नए सिरे से तय करना होगा - जो इस कार्यवाही में संभव नहीं है। भारत के संविधान के आर्टिकल 142 के तहत अधिकार क्षेत्र कितना भी व्यापक क्यों न हो, इसका इस्तेमाल पार्टियों के बीच आपसी सहमति से हुए और लागू हो चुके समझौते की शर्तों को बदलने के लिए नहीं किया जा सकता।"

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद एक पति और पत्नी के बीच हुए तलाक के समझौते को लागू करने से जुड़ा है। उनकी शादी 2015 में आपसी सहमति से खत्म हुई थी।

समझौते के तहत पति अपने नाबालिग बेटे के गुजारे-भत्ते के लिए एकमुश्त 2.20 करोड़ रुपये देने और बच्चे के गुजारे-भत्ते के लिए अपनी सालाना आय का 20% हिस्सा देने पर सहमत हुआ। हालांकि, एक और शर्त यह थी कि 1 करोड़ रुपये का भुगतान करने के बाद पति को आगे कोई गुजारा-भत्ता नहीं देना होगा, जबकि समझौते के तहत बाकी बचे 1.20 करोड़ रुपये का भुगतान भी किया जाना था।

पति द्वारा जुलाई 2017 तक पूरे 2.20 करोड़ रुपये का भुगतान करने के बाद पत्नी ने लगभग पांच साल बाद एक याचिका दायर की। इस याचिका में उसने उस शर्त को लागू करने की मांग की, जिसके तहत पति को अपनी सालाना आय का 20% हिस्सा देना था। फ़ैमिली कोर्ट और हाईकोर्ट ने उसकी याचिका यह कहते हुए खारिज की कि समझौते की शर्तें पूरी तरह से पूरी हो चुकी थीं।

इससे असंतुष्ट होकर पत्नी सुप्रीम कोर्ट गई और संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत बेटे की उच्च शिक्षा के लिए एक फंड बनाने की भी मांग की।

अदालत ने विवादित फैसलों में दखल देने से इनकार किया और समझौते को फिर से न खोलने के बारे में अपनी अनिच्छा जाहिर की, क्योंकि प्रतिवादी-पति द्वारा पूरा और अंतिम भुगतान किए जाने के बाद दोनों पक्षों के बीच समझौता पूरा हो चुका है।

Cause Title: VIJAYALAKSHMI R. VERSUS C. L. BALAJI

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