Arms Act | सिर्फ़ हथियार मिलने से ही अपराध साबित नहीं होता, अगर यह साबित न हो कि आरोपी को उसकी जानकारी थी और उसका उस पर कंट्रोल था: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-07-14 14:59 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (13 जुलाई) को कहा कि किसी के घर से हथियार मिलने मात्र से ही उसे आर्म्स एक्ट के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि यह साबित न हो जाए कि आरोपी को उन हथियारों के बारे में जानकारी थी और उन पर उसका कंट्रोल था।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने एक आदिवासी व्यक्ति को बरी करने के फैसले को सही ठहराते हुए कहा,

"हाईकोर्ट का यह कहना सही था कि प्रतिवादी/आरोपी के घर से हथियार समेत कुछ सामान मिलने मात्र से ही उसे अपराध का दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि अभियोजन पक्ष यह साबित न कर दे कि वे सामान आरोपी की जानकारी में थे और आरोपी का उन पर कंट्रोल था।"

उस आदिवासी व्यक्ति को ट्रायल कोर्ट ने आर्म्स एक्ट के तहत दोषी ठहराया, क्योंकि उसके घर से देसी स्टेन गन मिली।

अगस्त 2001 में पुलिस और CRPF के जवानों ने झारखंड के डोरा गांव में छापा मारा, क्योंकि उन्हें इलाके में उग्रवादियों के होने की खुफिया जानकारी मिली। सुबह 4:00 बजे प्रतिवादी जगदीश लकड़ा के घर में चार कथित उग्रवादी मौजूद थे। जब पुलिस सुबह 6:00 बजे पहुंची तो तीन भाग गए, जबकि एक को पकड़ लिया गया। घर की तलाशी लेने पर एक देसी स्टेन गन, कारतूस, दवाइयां और उग्रवादी साहित्य मिला।

ट्रायल कोर्ट और अपीलीय अदालत ने लकड़ा को आर्म्स एक्ट की धारा 25(1-B)(a) और 26 के तहत दोषी ठहराया और क्रमशः तीन साल और एक साल की कठोर कैद की सज़ा सुनाई। हालांकि, झारखंड हाईकोर्ट ने रिविज़न याचिका पर उसे बरी कर दिया, जिसके बाद राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

राज्य सरकार की अपील खारिज करते हुए जस्टिस वराले द्वारा लिखे गए फैसले में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि जब यह बात मानी गई कि प्रतिवादी ने जान के गंभीर डर या खतरे के कारण अपने घर में हथियार जैसी आपत्तिजनक सामग्री रखी थी, तो "यह नहीं कहा जा सकता कि ऐसा कब्ज़ा जान-बूझकर किया गया कब्ज़ा था, और ऐसे दबाव में या जान के खतरे के कारण रखे गए कब्ज़े को अभियोजन पक्ष के मामले को स्वीकार करने और प्रतिवादी को दोषी ठहराने का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता।"

कोर्ट ने 'फ्रांसिस ज़ेवियर सालेमाओ बनाम स्टेट थ्रू पब्लिक प्रॉसिक्यूटर (2007)' मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट के फ़ैसले को सही ठहराया, जिसमें यह कहा गया:

"हथियार रखने का मतलब है कि व्यक्ति को पता हो कि उसके पास हथियार है; और भले ही हथियार उसके पास शारीरिक रूप से न हो, फिर भी उस हथियार पर उसका नियंत्रण या अधिकार हो ताकि किसी और के पास शारीरिक रूप से होने के बावजूद वह हथियार उसी के कब्ज़े में माना जाए।"

हाईकोर्ट के प्रतिवादी (Respondent) को बरी करने के फ़ैसले को सही ठहराते हुए कोर्ट ने कहा,

"ऐसा लगता है कि ट्रायल कोर्ट सिर्फ़ चीज़ों की बरामदगी से प्रभावित हो गया था - खासकर देसी स्टेन गन (हथियार) से - और इस बात को नज़रअंदाज़ कर दिया कि ऐसा कोई कानूनी सबूत नहीं था जिससे यह साबित हो सके कि ये चीज़ें प्रतिवादी की जानकारी और सहमति (conscious possession) में थीं।"

ऊपर बताई गई बातों के आधार पर अपील खारिज कर दी गई।

Cause Title: THE STATE OF JHARKHAND VERSUS JAGDISH LAKRA

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